मोदी जी के विरोधियों की यही बात हमें अच्छी नहीं लगती। बताइए, अमेरिका के साथ डील पर दस्तखत तक नहीं हुए हैं और भाई लोगों ने सरेंडर…सरेंडर का शोर मचा दिया। माना कि डील अमरीका के साथ हुई है और अमरीका के साथ डील को सब ट्रेड डील, ट्रेड डील ही कह रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह थोड़े ही है कि मोदी जी के विरोधी भी इसे अंगरेजी में सरेंडर, सरेंडर कहने लगें। विपक्ष वालों को गुलामी की भाषा के शब्दों से तो बचना चाहिए। और विपक्ष वाले जो नरेंदर से तुक मिलाने के लिए, सरेंडर-सरेंडर कर रहे हैं, वह तो और भी गलत है। नरेंदर की तुक ही मिलानी थी तो कमांडर से भी तो मिला सकते थे–विश्व गुरु की तरह विश्व कमांडर। तुक भी मिल जाती और राष्टÑ का गौरव भी बढ़ जाता। पर इन विपक्ष वालों को राष्टद्द्र का गौरव बढ़ते देखना ही तो मंजूर नहीं है।
वर्ना जो डील हुई है, उसमें मोदी जी के सरेंडर-वरेंडर करने जैसी तो कोई बात ही नहीं है। यहां तक कि डील की रूपरेखा का जो समझौता हुआ है, उसके सैकड़ों शब्दों में एक बार भी सरेंडर शब्द खोजकर अगर कोई हमें दिखा दे, तो हम कायल हो जाएंगे। उल्टे नाम में ही डील है। अब इतनी अंगरेजी तो मोदी जी भी समझते हैं कि डील, डील होती है और सरेंडर, सरेंडर होता है। और जो खेती-किसानी समेत अमरीकी मालों की खरीद के लिए भारत के दरवाजे और चौपट खोले जाने को सरेंडर कह रहे हैं, वे संघ की पाठशाला की पढ़ाई से कोसों दूर ही रह गए लगते हैं।
और इस डील से कोरा राष्टÑ का गौरव ही थोड़े ही बढ़ेगा। पब्लिक की शान भी तो बढ़ेगी। जो अमरीकी फल, मेवे और दूसरे सामान, नेहरू जी की गलतियों की वजह से अब तक इस देश में किसी को भी हासिल ही नहीं थे या ज्यादा से ज्यादा सिर्फ रईसों को ही हासिल थे, अब गांव-गांव, गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले में पहुंचेंगे। कैलीफोर्निया के बादाम, अमरीका के किसी और राज्य के अखरोट और किसी और राज्य के सेब, इस देश में घुरहू-कुतहू तक खाएंगे। जिस ब्रांड का बादाम अडानी खा रहा होगा, उसी का सत्तू खा रहा होगा। पूरा समाजवाद आ जाएगा, समाजवाद! पहले मोदी जी ने हवाई चप्पल वालों को हवाई जहाज का सफर करा के दिखाया और कंगालों तक को अमरीकी मालों का खरीददार बनाकर दिखाएंगे। अमरीकी भी मानते हैं कि ग्राहक भगवान होता है। मोदी जी अमृतकाल में हमारे किसानों वगैरह को अमरीकियों का भगवान बनाने में लगे हुए हैं और ये विपक्षी इसी का रोना रो रहे हैं कि गरीब किसानों की खेती चौपट हो जाएगी, किसान भूखों मर जाएंगे। यही तो असली आत्मनिर्भरता है, जिसका वादा मोदी जी ने किया था!
और ये रूसी तेल का इतना शोर क्यों मचाया जा रहा है। माना कि ट्रंप ने कहा है कि रूसी तेल खरीदना बंद करना पड़ेगा। माना कि हमने भी रूसी तेल खरीदना बंद कर दिया है और अमरीका जिससे कहे बस उसी से तेल खरीदने का मन बना लिया है। लेकिन, इसका मतलब यह कहां है कि हम अमरीका के हुक्म पर ऐसा कर रहे हैं? हमारी अपनी नीति है, स्वतंत्र नीति।

