
न्याय तो न्याय होता है फिर वो अपनों के लिए हो या गैरों के लिए। लेकिन ट्रम्प को यह भी नागवार गुजरा जब वहां के सुप्रीम कोर्ट ने कानून की हद और जद में वो फैसला सुनाया, जो उनके खिलाफ था। दरअसल अमरीका में सुप्रीम कोर्ट में अदालतों की नियुक्ति वहां के राष्ट्रपति करते हैं जो आजीवन या जब तक जज सक्षम, स्वस्थ और सक्रिय रहें तब तक के लिए होती है। अमरीकी सुप्रीम कोर्ट में ट्रम्प के पहले कार्यकाल के नियुक्त तीन जज थे, जिनसे ट्रम्प पूरे भरोसे में थे इतने कि उन्हें अपनी जागीर समझ बैठे। फैसला उनके खिलाफ भला कैसे जाएगा? लेकिन वो ये भूल गए कि जजों ने न्याय करने की शपथ ली थी न ट्रम्प के हितों की रक्षा की। फैसला आते ही उन्होंने जिन शब्दों में सुप्रीम कोर्ट और खिलाफ फैसला देने वाले जजों पर आरोप लगाए तो निश्चित रूप से अमेरिका की पूरी न्याय प्रणाली पर कटाक्ष था जो बेहद निंदनीय है। इसी तरह हालिया भारत-पाक युद्ध को रोकने को लेकर अनगिनत बार एकतरफा बोलने वाले ट्रम्प इस बार तो इतना कह गए यदि वो दोनों का परमाणु युद्ध नहीं रुकवाते तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की हत्या हो जाती। वाकई ट्रम्प, ट्रम्प ही हैं और वो अमरीका के राष्ट्रपति कम कई बार राष्ट्रविद्रोही की भूमिका में नजर आने लगते हैं।
दुनिया भर में इस फैसले की चर्चा इसलिए भी हो रही है कि वहां के सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से इसे असंवैधानिक करार दिया। इसमेंट्रम्प के नियुक्त जजों ने भी अहम भूमिका निभाई। 6-3 के बहुमत से ट्रम्प टैरिफ को असंवैधानिक करार देते हुए 1977 केआईईईपीए कानून यानीअंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (इंटरनेशनल इमरजेंसी इकॉनामिक पॉवर ऐक्ट)का हवाला दिया। यह वो अमेरिकी कानून है जो राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान विदेशी खतरों से निपटने के लिए आर्थिक लेनदेन, आयात-निर्यात और संपत्ति को विनियमित करने का अधिकार देता है। जबकि अमरीका में ऐसी स्थिति नहीं है। बिना कांग्रेस की सहमति लिए जिद्दी ट्रम्प ने दुनिया भर में मनमाने टैरिफ ठोंक दिया, भारत भी अछूता नहीं रहा। फैसलाआते ही कुछ देर में ट्रम्प ने प्रेस कांफ्रेंस की जिसमें फैसले की न केवल आलोचना की बल्कि विरोध में फैसला देने वाले खुद के नियुक्त जजों को जमकर कोसा, लताड़ा भी। ऐसा लगता है कि कुछ जज इससे डर गए और सही काम नहीं करना चाहते।
मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स के साथ बहुमत में न्यायाधीश नील गोरसच और एमी कोनी बैरेट भी शामिल थे। इनकी नियुक्ति ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में की थी। सहमति जताने वालों में न्यायाधीश क्लेरेंस थामस, सैमुअल एलिटो और ब्रेट कैवना थे जिनमें कैवना को ट्रंप ने नियुक्त किया था। इन्होंने असहमति मत में लिखा कि वास्तव में टैरिफ आयात को नियंत्रित करने का पारंपरिक और सामान्य उपकरण है तथा आइईईपीए का पाठ, इतिहास तथा पूर्व की तमाम मिसालें प्रशासन के पक्ष का समर्थन करती हैं। जज कैवना ने चेतावनी दी कि इस निर्णय से चीन, ब्रिटेन और जापान जैसे देशों के साथ हुए व्यापार समझौतों पर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।हालांकि फैसले में यह साफ नहीं है कि कंपनियों को उन अरबों डॉलर का रिफंड मिलेगा या नहीं, जो दिसंबर 2025 तक ही अमरीकी खजाने मेंकरीब 133 अरब डॉलर से अधिक जमा हो चुके हैं। इनमें कुछ कंपनियां पहले ही निचली अदालतों में रिफंड का दावा पेश कर चुकी हैं।
निश्चित रूप से ट्रम्प की स्थिति बहुत मजाक वाली हो गई है। कहीं न कहीं वो हाशिए पर भी हैं। ट्रम्प की खिसियाहट इसी से समझ आती है कि एक तो उन्होंने अदालत को भला बुरा कह कर दुनिया को चौंकाया और यहां तक कि उनके द्वारा नियुक्त विरोध में फैसले देने वाले न्यायाधीशों को देश द्रोही और परिवार में कैसे मुंह दिखाएंगे तक कह दिया।
लगता है कि ट्रम्प को न्याय में विश्वास नहीं है और देर-सबेर अमरीका में यह मांग भी उठेगी कि भारत सहित तमाम देशों की न्याय पालिका के सम्मान वाली साफ और निष्पक्ष व्यवस्था अमरीका में भी हो जिससे नियुक्त न्यायाधीश बिना किसी के दबाव में न्याय हित में काम कर सकें। हां, ट्रम्प का एक और सुन्दर सपना टूट जरूर गया है लेकिन ट्रम्प और विवादों का चोली-दामन का रिश्ता कब क्या, कैसा कुछ नया कर दे, कोई नहीं जानता। फिलहाल ट्रम्प ने ग्लोबल टैरिफ लगाकर, जब चाहें तब बदलकर अपने ही देश की सर्वोच्च अदालत को एक तरह से चुनौती दे डाली। इससे पहले शांति के नोबल पुरस्कार न मिलने पर उनकी हरकतों को दुनिया ने देखा। यह सब उनके पद और गरिमा को देखकर अनुकूल नहीं था। लगता है वो अमेरिका के ऐसे राष्ट्रपति जरूर बनने की ओर हैं जो सबसे विवादित, सनकी, नासमझ और तानाशाह कहलाएंगे। बहरहाल ऐसे खिसियाए ट्रम्प को देखकर लोग यही कह रहे हैं ‘जिन्हें हम हार समझे थे गले अपने लगाने को वही काले नाग बन बैठे हमें ही काट खाने को।’



