Friday, February 6, 2026
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अब मां के दूध में यूरेनियम

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बिहार के छह जिलों—भोजपुर, बेगूसराय, समस्तीपुर, खगड़िया, नालंदा और कटिहार—में माताओं के स्तनदूध में यूरोनियम की उपस्थिति एक साधारण ‘रिपोर्टेड फैक्ट’ नहीं है; यह ऐसे संकट का संकेत है जिसकी जड़ें जमीन के भीतर भी हैं और व्यवस्था के भीतर भी। यह मामला जितना वैज्ञानिक है, उतना ही सामाजिक और राजनीतिक भी—और इसका विश्लेषण करने के लिए हमें उन परतों में उतरना पड़ता है जहां भू-विज्ञान, मातृ-स्वास्थ्य, प्रशासनिक जवाबदेही और पर्यावरण न्याय एक-दूसरे से टकराते हैं। यूरोनियम, एक रेडियोधर्मी धातु, पृथ्वी की सतह पर प्राकृतिक रूप से मौजूद होती है। भू-जल में इसका जाना असामान्य नहीं, लेकिन इसकी मात्रा कई क्षेत्रों में ‘पैथोलॉजिकल’ स्तर तक पहुंच जाती है—यानि वह स्तर जहां से मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव शुरू हो सकता है। भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों—पंजाब, हरियाणा, राजस्थान—में यह समस्या पहले से दर्ज है। बिहार नया जुड़ा हुआ प्रदेश है।

नई रिपोर्ट के अनुसार, 17-35 वर्ष की 40 स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध के नमूने लिये गए और हर नमूने में यूरोनियम पाया गया। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि दूध एक ‘बायो-इंडिकेटर’ की तरह काम करता है—मां के शरीर में जो भी खनिज, विष, प्रदूषक जाते हैं, उनका प्रतिफल दूध में मिलता है। अर्थात यह सिर्फ एक जैविक तथ्य नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतावनी है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यूरोनियम के दो प्रमुख जोखिम हैं। पहला रासायनिक—यह गुर्दों पर प्रभाव डालता है और बच्चों में वृद्धि व तंत्रिका-विकास को प्रभावित कर सकता है। दूसरा जोखिम रेडियोधर्मी नहीं, बल्कि लंबे समय तक सूक्ष्म खुराक के संपर्क में बने रहने से जुड़ा ‘सबक्लिनिकल’ प्रभाव है—जैसे स्मृति, ध्यान, प्रतिरोधक-क्षमता का प्रभावित होना। यह दोनों जोखिम शिशुओं में अधिक गंभीर इसलिए हैं क्योंकि उनका शरीर अभी निर्माण अवस्था में होता है। यह कैंसर पैदा करने वाली स्थिति की तुलना में, विकास और अंगों पर असर डालने वाली स्थिति है। यहां यह भी जरूरी है कि स्तनदूध में यूरोनियम की ‘सुरक्षित सीमा’ दुनिया में तय नहीं हुई है; ऐसे में किसी निष्कर्ष पर कूदना ठोस वैज्ञानिक आधार के बिना संभव नहीं।

बिहार के इन जिलों में भू-जल की गुणवत्ता का संकट नया नहीं है—आर्सेनिक, फ्लोराइड, आयरन, लेड जैसी धातुओं के उच्च स्तर पहले से रिपोर्ट हो चुके हैं। गंगा के मैदानी क्षेत्र में नदियों के साथ-साथ तलछट में कई प्रकार के रेडियो-धात्विक खनिज जमा रहते हैं, जो भू-जल में घुलकर हानिकारक हो जाते हैं। लेकिन समस्या केवल प्राकृतिक नहीं। कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ मानवजनित कारण भू-जल को अधिक विषाक्त बनाते हैं—जैसे अत्यधिक भू-जल दोहन, खनन गतिविधियां, औद्योगिक कचरा और अनुपयुक्त जल-संचयन तरीके। वैज्ञानिक समुदाय अब इस संभावना की ओर उंगली उठा रहा है कि बिहार में यूरोनियम की मात्रा बढ़ने का एक कारण भू-जल का गहरा दोहन हो सकता है। जब जल-स्तर नीचे जाता है तो पानी पुराने, गाढ़े तलछट वाले भू-तलों से गुजरता है और रेडियोधर्मी धात्विक तत्व अधिक मात्रा में घुलकर ऊपर आते हैं। इसलिए यह समस्या केवल ‘एक अध्ययन की खोज’ नहीं, बल्कि जलविज्ञान में गहरी संरचनात्मक गड़बड़ी का संकेत है।

मां के शरीर में जाने वाला हर अंश शिशु के शरीर का हिस्सा बन जाता है। ग्रामीण महिलाओं का पानी और भोजन अधिकतर स्थानीय भू-जल पर आधारित होता है। बिहार के अनेक जिलों में नल-जल योजनाएं कागज पर मौजूद हैं, लेकिन गांवों में लोग अब भी हैंडपंपों पर निर्भर हैं—और कई हैंडपंप ऐसे हैं जिनकी जल-परीक्षण रिपोर्टें न वर्षों से सुधरीं, न बदलीं। स्तनपान कराने वाली महिलाएं एक संवेदनशील समूह हैं क्योंकि उनका पोषण अक्सर औसत से कम होता है, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच सीमित होती है और पानी का विकल्प चुनने की आर्थिक-सामाजिक क्षमता भी कम होती है। ऐसे में भू-जल के प्रदूषण का असर सबसे पहले उन्हीं पर दिखता है।

यह प्रश्न भी उठता है कि माताओं के दूध की जांच एक वैज्ञानिक लाइफ-लाइन है या एक नैतिक चेतावनी? दोनों हैं। दूध में यूरोनियम का मिलना इस बात का संकेत है कि प्रदूषण सतही नहीं, बल्कि शरीर और अगली पीढ़ी की जैविक संरचना तक पहुंच चुका है। इस अध्ययन ने एक असहज सत्य को सामने रखा है—हमारे यहां पानी की गुणवत्ता को लेकर न तो पर्याप्त निगरानी है और न ही पारदर्शिता। सरकारें अक्सर नल-जल योजनाओं के निर्माण का दावा करती हैं, लेकिन जल-गुणवत्ता परीक्षण का डेटा या तो सार्वजनिक नहीं होता, या नियमित रूप से अपडेट नहीं किया जाता।

ऐसी खबरें अक्सर एक दिशा में ले जाती हैं—भय। और भय से पैदा होता है भ्रम। कई मीडिया रिपोर्टें ऐसे हेडलाइन बनाती हैं कि लोगों में यह भ्रम फैल जाता है कि स्तनपान करवाना असुरक्षित है। वैज्ञानिक समुदाय ने साफ कहा है कि स्तनपान कभी भी बंद नहीं किया जाना चाहिए। दूध में यूरेनियम की उपस्थिति जोखिम का संकेत है, लेकिन स्तनपान उसके लाभों की तुलना में कहीं कम हानिकारक है। स्तनदूध में एंटीबोडीज होती हैं, पोषण अत्यंत संतुलित होता है और शिशु की रोग-प्रतिरोधक शक्ति विकसित करती है। इसलिए दुनियाभर के डॉक्टर इस पर सहमति रखते हैं कि यूरोनियम की मौजूदगी चिंताजनक है, लेकिन स्तनपान बंद करना कोई समाधान नहीं—समाधान है प्रदूषण रोकना। इस घटना में एक पैटर्न दिखाई देता है: पर्यावरणीय प्रदूषण सबसे पहले गरीब समुदायों पर असर डालता है। यह एक वैश्विक पैटर्न है—अफ्रीका से लेकर एशिया तक, उत्तर-अमेरिका के ‘ब्लैक बेल्ट’ से लेकर भारत के ‘बेल्ट आॅफ टॉक्सिसिटी’ तक। बिहार के ये जिले वही हैं जहां स्वास्थ्य ढांचा कमजोर है, शिक्षा-स्तर औसत से कम है और स्थानीय प्रशासन संसाधनहीन। यहां के लोग अपने पानी को जांचने या बदलने की क्षमता नहीं रखते। ऐसी परिस्थितियों में पर्यावरण प्रदूषण एक सामाजिक अन्याय बन जाता है—जहां एक वर्ग प्रदूषण पैदा करता है, और दूसरा वर्ग उसे झेलता है।

बिहार के स्तनदूध में यूरोनियम की मौजूदगी एक चिंता है, लेकिन सत्य को उजागर करना हमेशा पहला कदम होता है। अब यह समाज, सरकार और वैज्ञानिक समुदाय पर निर्भर है कि इस सत्य के साथ कैसे व्यवहार किया जाए। अगर इसे केवल ‘अजीब घटना’ समझकर छोड़ दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इसका दंश झेलेंगी। अगर इसे ‘आंकड़ों की जागरूक चेतावनी’ मान लिया गया, तो यह देश के जल-प्रबंधन और पर्यावरण नीति में उस सुधार को जन्म दे सकता है जिसकी भारत को दशकों से जरूरत है। संप्रति आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान का यह संकेत केवल भय पैदा न करे, बल्कि बदलाव की दिशा में एक वास्तविक कदम बने—क्योंकि विषाक्त भू-जल केवल रासायनिक समस्या नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व का प्रश्न है। यह मुद्दा आज की माताओं से नहीं, आने वाली पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है, और वहीं इसकी गंभीरता भी निहित है।

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