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…जब सइयां भए आरटीओ तो डर काहे का

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…जब सइयां भए आरटीओ तो डर काहे का
  • बेखौफ होकर अपने सारे गैर कानूनी कार्यों को दे सकता है अंजाम

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: डर के आगे जीत है… जी हां! जिले के आरटीओ और एआरटीओ साहबान की कृपा जिस किसी पर भी बरस जाए समझो उसे डरने की जरूरत नहीं है। वह बेखौफ होकर अपने सारे गैर कानूनी कार्यों को अंजाम दे सकता है। उसे रोकने वाला कोई नहीं है और ना उसके लिए कानून कोई मायने रखता है। ऐसा होना भी लाजिमी भी है। शहर में यह कहावत कि… जब सइयां! भए आरटीओ तो डर काहे का! चरितार्थ होते आप नंगी आंखों से देख सकते हैं। जनवाणी टीम सिटी वोकेशनल स्कूल पहुंची और गेट के बाहर का नजारा देखकर हतप्रभ रह गई। हालांकि सिटी वोकेशनल स्कूल के गेट पर दो तगड़े निजी सुरक्षा गार्ड काले यानि कमांडो ड्रेस में नजर आए।

जनवाणी टीम को देखते ही गार्डों में कानाफूसी आपस में हुई और यह समझने में देर नहीं लगी कि अब स्कूल के अंदर एंट्री तो संभव नहीं है। फिर भी कोशिश की गई मगर, हुआ वही जिसका शक था। फिलहाल टीम जनवाणी ने स्कूल गेट पर ही रुककर अपना काम जारी रखा। थोड़ी ही देर में एक एक करके इको गाड़ियां आने लगीं। इन इको गाड़ियों का नंबर प्लेट कामर्शियल नहीं, निजी है। यानि पीली पट्टी नहीं मगर, काम तो धड़ल्ले से किया कामर्शियल किया जा रहा है। यकीन मानिए इको गाड़ियों पर आरटीओ विभाग की इतनी बड़ी कृपा बरस रही होगी,

फिलहाल सपने में भी नहीं सोचा होगा। दर्जनों इको गाड़ियां प्रदेश के तेज तर्रार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूरे सिस्टम को धता बता रही हैं वो भी खुलेआम और तो और आरटीओ प्रवर्तन और एआरटीओ प्रवर्तन जिनकी जिम्मेदारी है कि ऐसे वाहनों की जांच की जाए जो सरकार के राजस्व की चोरी कर रहे हैं। मगर, यहां तो कुछ और ही खेल चल रहा है तो इनको सर्च कौन करे, इन्हें पकड़ें क्यों। मामला आज का नया नहीं है, आरटीओ कोई भी हो मगर खेल तो पुराना ही है। अब इस खेल के तिलिस्म को टीम जनवाणी एक एक करके तोड़ रही है।

आरटीओ विभाग के अफसरों की मिलीभगत से कई दर्जन इको वाहन शहर में फर्राटे से दौड़ रहे हैं। इतना ही नहीं सभी इको वाहन स्कूलों में लगे हुए हैं। आप समझिए कि देश के भविष्य नौनिहालों की जिंदगी से आरटीओ विभाग के अफसर कितना घिनौना खेल खेल रहे हैं। साथ ही चंद पैसों की लालच में इको वाहन स्वामी भी इन बच्चों को भूसे की तरह भरकर स्कूल पहुंचा रहे हैं। इन्हें किसी का खौफ नहीं। और इको वाहन मालिकों के लिए कायदे कानून कोई मायने भी नहीं रखता।

इस दर्द का जिम्मेदार कौन?

इस दौरान कई वाहन आए और निकलते गए। एक इको वाहन सुबह करीब सात बजे पहुंचा, थोड़ा देर हो चुका था। उस वाहन की हालत बेहद दयनीय थी। बच्चे पूरे भरे हुए थे। जनवाणी टीम फोटो खींचने के लिए आगे बढ़ रही थी इतने में इको का ड्राइवर दीनहीन अवस्था में हाथ जोड़े खड़ा हो गया। और उसकी आंखों से आंसू बह निकला। बकौल ड्राइवर विनती करने लगा साहब!

फोटो मत छापना मेरी नौकरी चली जाएगी, मेरा मालिक कसाई है। गाड़ी की हालत बेहद खराब है। क्या करूं बच्चे पालने हैं, किराए पर रहता हूं और आठ हजार महीने का मेहनताना मिलता है। पिछले साल एक अखबार में छप गया था, मालिक ने एक महीने की सेलरी नहीं दी थी। इतना कहकर रोने लगा। यह दर्द हमसे नहीं देखा गया। इसलिए ना तो उसका नाम पूछा और ना ही कोई तस्वीर ली।