
हाल में अपनी सरकारों, सेठों और समाज में बहुतायत से व्याप्त पाखंड को देखना हो तो पतित पावनी मानी गईं गंगा के प्रति पिछले कुछ दशकों से किए जा रहे अपने व्यवहार को देखा जा सकता है। स्वर्ग-नसेनी के दर्जे की मानी जाने वाली उत्तर भारत की यह जीवनदायिनी हम इंसानों के बर्ताव के चलते लगातार बदहाल होती जा रही हैं। अब 2027 में हरिद्वार में भरने वाला महाकुंभ भी शायद हमें अपने पाखंड को समाप्त करने की कोई शक्ति दे पाए?
उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में 10 मार्च को विधानसभा में ‘नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक’ (कैग) की रिपोर्ट पटल पर रखी गई जिसमें गंगा-सफाई के विषय पर कहा गया कि देवप्रयाग के बाद गंगाजल आचमन योग्य नहीं है और इससे आगे ऋषिकेश और हरिद्वार तक लगभग 93 किलोमीटर में गंगा का पानी नहाने लायक भी नहीं है। शहरों से सीवेज का गंदा पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। ‘कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया’ की मात्रा तय सीमा से 32 गुना अधिक बढ गयी है। ‘उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ और ‘राज्य गंगा मिशन’ की कार्यशैली को लेकर भी चिंता जाहिर की गयी है।
राज्य ने गंगा तट पर स्थित नगरों में पूरक सीवेज सुविधाओं को बढ़ाने के लिए धन उपलब्ध नहीं कराया, जबकि इस पर राज्य की योजना के अंतर्गत 55.08 करोड़ खर्च हुये हैं। इसके बावजूद 16 नगरों में ‘नमामि गंगे’ की निधि से बने ‘सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट’ (एसटीपी) से घरों को जोड़ने के लिए राज्य निधि भी उपलब्ध नहीं कराई गई। ‘कैग’ की रिपोर्ट कहती है कि राज्य ने अपने संसाधनों से गंगा के तटवर्ती नगरों में सीवरेज सुविधाओं में सुधार करने में जो योगदान देना चाहिए था, वह नहीं दिया है।
विधानसभा में रखी गई ‘कैग’ की यह रिपोर्ट वर्ष 2018-23 की अवधि के दौरान की है जिसमें गौमुख से लेकर हरिद्वार तक 16 शहरों को शामिल किया गया है। ‘एसटीपी’ निर्माण व गंदे नालों की टैपिंग और इससे जुड़ी 42 परियोजनाओं में से 23 की जांच का खुलासा किया गया है जिसमें सीवेज ट्रीटमेंट, रिवर फ्रंट डेवलपमेंट, घाटों की सफाई, वृक्षारोपण आदि की जांच की गई है। ‘उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ की देहरादून, रुड़की, काशीपुर में संचालित प्रयोगशालाओं के लिए ‘राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन’ से 2018 में 16.21 करोड़ रुपयों की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी जिसके लिए ‘एनएबीएल’ से मान्यता लेनी थी, ताकि प्रशिक्षण और मापांकन रिपोर्ट में सटीकता व विश्वसनीयता की परख हो सके, लेकिन 6 वर्ष बीत जाने के बाद भी मान्यता नहीं ली गई।
इससे राज्य और केंद्र के ‘प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों’ की प्रयोगशालाओं के परिणामों के बीच अंतर देखा गया है। यह अंतर हरिद्वार के जगजीतपुर ‘एसटीपी’ के परीक्षण परिणाम से सामने आया है। इसे अन्य ‘एसटीपी’ में भी देखा गया है। ऐसी स्थिति में ‘उत्तराखंड जल संस्थान’ ने भी 18 ‘एसटीपी’ के निर्माण और प्रचालन में कमियों के कारण उन्हें नियंत्रण में नहीं लिया है। निर्धारित समय पर इनका सुरक्षा आडिट करवाने में भी लापरवाही बरती गई है। जिसके बारे में बताया गया कि ‘मानव जीवन’ और ‘नमामि गंगे’ की परिसंपत्तियों को नुकसान झेलना पड़ा है।
‘चारधाम यात्रा’ के मुख्य पड़ाव जोशीमठ, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कीर्तिनगर, चमोली, श्रीनगर में सीवर ट्रीटमेंट के कार्य में बहुत लापरवाही सामने आई है। जोशीमठ में हुए ऐतिहासिक भू-धंसाव का कारण भी सीवर प्रणाली में की गई लापरवाही को माना गया है। मौजूदा ‘एसटीपी’ के सीवेज ट्रीटमेंट की गुणवत्ता भी बेहद खराब पाई गई। ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ (एनजीटी) ने गंगा सफाई पर जो आदेश दिए थे उसका पालन नहीं किया गया। जो ‘एसटीपी’ बने भी है उनमें पर्याप्त ट्रीटमेंट की क्षमता ही नहीं है। ‘राज्य स्वच्छ गंगा मिशन’ द्वारा निर्मित श्मशान घाट ज्यादातर अनुपयोगी हैं। नदी के किनारों पर फेंका गया अथवा जलाया गया अपशिष्ट नदी में जाकर बह रहा है।
गंगा के उद्गम की हालत भी बहुत चिंताजनक है जहां पर ग्लेशियर पहले से अधिक प्रतिवर्ष 38 मीटर पीछे हट रहे हैं। स्पष्ट है कि भविष्य में पानी की बहुत कमी होगी और नदियों में जमा हो रहे कूड़े – कचरे और अनियंत्रित सीवर से प्रदूषण की समस्या कम होने का नाम नहीं ले रही है। चिंताजनक है कि इस अवधि में 985.17 करोड़ रुपयों की धनराशि में से 873.17 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी गंगा में गंदे नालों का पानी जाने से नहीं रोका जा सका है। गंगोत्री से उत्तरकाशी के बीच दर्जन भर से अधिक स्थानों पर गंदा पानी गंगा में जा रहा है। जिस पर विधानसभा सत्र के दौरान गंगोत्री के विधायक सुरेश चौहान ने भी चिंता जाहिर की है। यहां बहुत लंबे समय से भागीरथी में कूडा डालने का विरोध चल रहा है। इसके बाद यहां के जिलाधिकारी प्रशांत आर्य की कोशिशों के बाद शहर में एकत्रित कूड़े को दूसरे स्थान पर पहुंचाया गया है।
हर वर्ष उत्तराखंड से पश्चिम बंगाल तक गंगा जल की गुणवत्ता को लेकर हो रहे सर्वेक्षणों से यही संकेत मिल रहे हैं कि दिनों-दिन गंगा की सेहत में जो सुधार दिखाई देना था, उसमें निर्माण कार्यों में की जा रही लापरवाही और निरंतर फेंका जा रहा कूड़ा-कचरा गंगा की निर्मलता को आघात पहुंचा रहा है। वर्ष 2027 में हरिद्वार में होने वाले महाकुंभ से पहले गंगा की स्वच्छता सुनिश्चित करना एक बडी चुनौती होगी।
प्रधानमंत्री के इस ड्रीम प्रोजेक्ट को संबंधित राज्य सरकारें और विभाग पटरी पर लाने के लिए जितनी भी कोशिशें कर रहे हैं, वह पर्याप्त नहीं है। काबिले-गौर है कि देश में गंगा की निर्मलता और अविरलता के विषय पर एक जोरदार बहस तो हुई है, लेकिन 2014 में प्रारंभिक लागत 20 हजार करोड़ से 22 हजार 5 सौ करोड़ तक ले जाने के बाद भी गंगा जल की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है। ‘कैग’ ने गंगा की स्वच्छता के लिए कुछ सुझाव दिए हैं जिसमें ‘सीवेज शोधन संयंत्रों’ का सुरक्षा आॅडिट, विभागीय हस्तांतरण से पहले संयंत्रों की कमियां दूर करने, पर्याप्त घरेलू सीवर नेटवर्क बनाने, तटवर्ती नगरों में पर्याप्त संशोधन सुविधाओं की योजना बनाने, अशोधित सीवर के नदी में गिरने पर जिम्मेदारी तय करना शामिल हैं। कूड़े-कचरे का प्रबंधन और प्रदूषण नियंत्रण की प्रयोगशालाएं मान्यता प्राप्त हों। आॅनलाइन जनसुनवाई हो, ताकि लोग गंगा की निर्मलता से जुड़ सकें।



