
अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हिंसा हमारे देश में आम हो गई है। उसका स्वरूप और तीव्रता बदलती रहती है पर मुसलमानों को डराने-धमकाने का सिलसिला कभी थमता नहीं है। दूसरे सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय, ईसाईयों, को भी बख्शा नहीं जाता हालांकि उनके खिलाफ हिंसा की खबरें यदाकदा ही सामने आती हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि हिंसा इतने छोटे स्तर पर होती है कि उसका पता ही नहीं चलता. मगर क्रिसमस के आसपास वह साफ नजर आने लगती है। हमें 1990 का दशक याद है जब ओडिशा और गुजरात में हिंसा हुई थी और लगभग उसी दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने टिप्पणी की थी कि धर्मपरिवर्तन के मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता है। धर्मपरिवर्तन ईसाई समुदाय से जुड़े विभिन्न आयोजनों पर हमले करने का मुख्य बहाना रहा है। उनकी प्रार्थना सभाओं, चर्चों में होने वाली बैठकों और समारोहों के दौरान हिंसा की अधिक घटनाएं होती हैं। इस साल भी क्रिसमस से जुड़े कार्यक्रमों के दौरान हिंसा हुई।
हिंदुत्व के मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए फुटपाथ पर क्रिसमस से संबंधित सामान जैसे टोपियां, कपड़े आदि बेच रहे दुकानदारों पर हमले करना एक जश्न मनाने जैसा था। कई जगहों पर उन्होंने सांता क्लाज की प्रतिकृतियां को तोड़ा, चर्चों को नुकसान पहुंचाया और क्रिसमस से जुड़ी सामग्री बेच रही दुकानों पर हमला किया। इन घटनाओं की खबरें अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भी प्रसारित और प्रकाशित हुईं। कुछ समाचारपत्रों ने उनके देशों में बदले की भावना से हिन्दुओं के साथ हिंसा होने की संभावना भी जताई। इन घटनाओं को लेकर भारत सरकार के रवैये का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि उसने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। यह कोई संयोग मात्र नहीं है कि हिंसा की ज्यादातर घटनाएँ भाजपा-शासित राज्यों में हो रही है।
सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (24 दिसंबर 2025) ने अपनी रपट में ईसाई विरोधी हिंसा में हुई जबरदस्त बढ़ोत्तरी का सारगर्भित विवरण किया है। वर्ष 2014 से 2024 के बीच ईसाई-विरोधी हिंसा की दस्तावेजीकृत घटनाओं की वार्षिक संख्या 139 से बढ़कर 834 हो गई, जो 500 प्रतिशत से भी अधिक की वृद्धि दर्शाता है। केवल 2025 में जनवरी से लेकर नवंबर तक ऐसी 700 से अधिक घटनाओं की सूचना प्राप्त हो चुकी है जो घरों, चर्चों, स्कूलों, अस्पतालों एवं अन्य संस्थाओं में घटित हुईं। इनसे दलित व आदिवासी ईसाई व महिलाएं सर्वाधिक प्रभावित हुई। यूएस कमीशन आॅन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम ने अपनी 2025 की रपट में धार्मिक स्वतंत्रता के बुरे हालातों का हवाला देते हुए एक बार फिर भारत को विशिष्ट चिंता वाला देश घोषित किए जाने की अनुशंसा की है। ह्यूमन राईट्स वॉच एवं अन्य संस्थाओं ने भी अल्पसंख्यकों को प्रभावित करने वाली घटनाओं का दस्तावेजी विवरण दिया है।
क्रिसमस के ठीक पूर्व हिंसा होना कोई नई बात नहीं है और एक बिशप ने रायपुर में चर्चों को हिंसा के प्रति आगाह किया था। रायपुर में कैथोलिक अर्चबिशप विक्टर हैनरी ठाकुर बहुत चिंतित थे। उन्होंने स्थानीय चर्चों, स्कूलों और अन्य संस्थानों को पत्र लिखकर उनसे सावधान रहने का अनुरोध किया था। 2007 और 2008 में ओडिशा में क्रिसमस के आसपास भारी हिंसा हुई थी। इस प्रायोजित हिंसा ने 2008 में भीषण रूप ग्रहण कर लिया था। लगभग 7,000 ईसाईयों को घर छोड़कर भागना पड़ा था और 400 चर्चों में तोड़फोड़ की गई थी।
इस पृष्ठभूमि में यह अपेक्षा थी कि चर्चों के विभिन्न स्तरों के कर्ताधर्ता ईसाईयों पर हुए हमलों को लेकर चिंता जाहिर करेंगे लेकिन इस गंभीर मुद्दे पर उनकी चुप्पी से यह जाहिर होता है कि या तो उन्हें अपने समुदाय के लोगों की फिक्र नहीं है या इसके पीछे उनका कोई गुप्त निहित स्वार्थ है। हमने देखा है कि एक बाद एक राज्य धर्मांतरण विरोधी कानून बनाते जा रहे हैं जिन्हें धर्म स्वतांत्रय अधिनियम का नाम दिया जाता है। इनसे ईसाई समुदाय की धार्मिक गतिविधियों में तरह-तरह की बाधाएं और कठिनाईयां खड़ी हो गई हैं। पॉस्टरों और पादरियों को धर्मपरिवर्तन कराने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है और वे सालों तक निरर्थक कानूनी झंझटों में उलझे रहते हैं।
ईसाईयों के विरूद्ध धर्मपरिवर्तन को लेकर जो प्रोपेगेंडा चलाया जाता है उस पर विचार किया जाना आवश्यक है। भारत में ईसाई धर्म बहुत प्राचीन समय से है और इसका आगमन मालाबार तट पर सन् 52 में सेंट थामस के माध्यम से हुआ था। समाज में व्याप्त यह धारणा आधारहीन है कि यह ब्रिटिश राज के साथ भारत में आया। सन् 52 से 2011 तक, जब अंतिम जनगणना हुई, तब तक ईसाईयों की जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का 2.3 प्रतिशत थी।
यह दावा कोई नहीं करता कि प्रयत्नपूर्वक धर्मपरिवर्तन की एक भी घटना नहीं हुई होगी। कहीं-कहीं ऐसा हुआ होगा। मगर जनगणना के आंकड़ों के आधार पर 1971 से 2011 के बीच ईसाइयों की जनसंख्या पर यदि नजर डाली जाए तो पता लगता है कि 1971 में वे कुल जनसंख्या का 2.60 प्रतिशत थे, 1981 में 2.44 प्रतिशत 1991 में 2.34 प्रतिशत और 2011 में 2.30 प्रतिशत। इन आंकड़ों से हमें दिलचस्प जानकारी मिलती है और हकीकत सामने आ जाती है।
पास्टर ग्राहम स्टेन्स पर धर्मपरिवर्तन में लिप्त होने के आरोप लगाए गए थे और जिन्हें उनके दो पुत्रों टिमोथी और फिलिप के साथ जिंदा जला दिया गया था। हत्या की इस भयावह घटना की जांच करने वाले वाधवा आयोग ने अपनी रपट में यह स्पष्टत: कहा था कि क्योंझर, जहां पास्टर स्टेन्स कुष्ठ रोगियों की सेवा का कार्य करते थे, में ईसाईयों की संख्या में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई थी।
ईसाई मिशनें कई शैक्षणिक संस्थाओं और अस्पतालों का संचालन कर रही हैं और ये अत्यंत लोकप्रिय हैं। धर्मपरिवर्तन की घटनाएं आदिवासी और दलित समुदायों में अधिक हुई हैं जो दूरदराज के इलाकों शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं हासिल करने की कशमकश में लगे हुए हैं। यह सच है कि धर्मपरिवर्तन की अधिकांश घटनाएं दूरदराज के इलाकों में इन सुविधाओं को हासिल करने की कोशिशों के दरम्यान हुई होंगी।
धर्मपरिवर्तन के आरोपों के माध्यम से जो नफरत का माहौल बनाया जा रहा है, वह व्यापक रूप धारण कर चुका है। क्रिसमस से जुड़े कार्यक्रमों पर हमले बहुत भयावह है।ऐसी मामलों में सरकार चुप्पी साध लेती है और कुछ नहीं करती।ईसाई-विरोधी हिंसा में बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारण हैं सरकारी तंत्र की मिलीभगत। इस साल हो रहे हमले, शासक दल के दोगलेपन को जाहिर करते हैं।
एक तरफ चर्च में प्रार्थना करने जाना और दूसरी तरफ गुंडों को चर्चों में तोड़फोड़ करने की छूट देना। हमें उम्मीद है कि ईसाई-विरोधी हिंसा का वैश्विक स्तर पर विरोध होगा। देश में धार्मिक स्वतंत्रता कायम रहनी चाहिए और इसके लिए अन्य देशों की सरकारों को भारत सरकार से बातचीत करनी चाहिए।

