Sunday, February 8, 2026
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Dara Singh: पहलवानी, अभिनय और राजनीति, हर रंग में चमके दारा सिंह

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। दारा सिंह एक ऐसा नाम, जो सिर्फ पहलवानी तक सीमित नहीं रहा। वे उन विरले व्यक्तित्वों में से एक थे, जिन्होंने अपनी मेहनत, सादगी और बहुआयामी प्रतिभा से हर क्षेत्र में सफलता के शिखर को छुआ। अखाड़े में एक के बाद एक मुकाबले जीतकर वे भारतीय कुश्ती के प्रतीक बने। फिर जब उन्होंने सिनेमा में कदम रखा, तो उनकी मौजूदगी ने पर्दे पर भी गहरी छाप छोड़ी। इसके बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और यहां भी अपनी ईमानदारी, सरलता और जनसेवा की भावना से सबका सम्मान जीता। 19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर जिले के धरमूचक गांव में जन्मे दीदार सिंह रंधावा, जिन्हें दुनिया ने दारा सिंह के नाम से जाना, उन्होंने 12 जुलाई 2012 को इस दुनिया को अलविदा कहा। आज उनकी 13वीं पुण्यतिथि है।

दारा सिंह का बचपन

दारा सिंह का जन्म एक जाट सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सुरजीत सिंह रंधावा और माता का नाम बलवंत कौर था। उनका परिवार एक सामान्य किसान परिवार था और उनके माता-पिता खेती-बाड़ी करते थे। दारा सिंह का बचपन गांव के माहौल में ही बीता, जहां उन्होंने कम उम्र से ही मेहनत करना शुरू कर दिया। शिक्षा के मामले में उन्होंने स्कूल की पढ़ाई सिर्फ 6वीं कक्षा तक ही की थी। पारिवारिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते उन्हें आगे की पढ़ाई छोड़नी पड़ी और वो खेतों में काम करने लगे।

पहलवानी का सफर

बचपन से ही दारा सिंह को कुश्ती का शौक था। उनके शुरुआती दिन अखाड़ों में बीते। साल 1947 में वो सिंगापुर पहुंचे और वहां मलेशियाई चैंपियन को हराकर पहली बार अंतरराष्ट्रीय धरती पर छा गए। उन्होंने 500 से ज्यादा कुश्तियां लड़ीं और एक भी मुकाबला नहीं हारे। ये अपने आप में ही बड़े कमाल का रिकॉर्ड है।

इसके बाद वो 1954 में वो भारतीय कुश्ती चैंपियन बने और फिर कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप भी जीती। साल 1968 में उन्होंने अमेरिका के विश्व चैंपियन लाऊ थेज को हराकर विश्व फ्रीस्टाइल कुश्ती चैंपियन का खिताब अपने नाम किया। यही वो जीत थी जिसने उन्हें दुनिया का पहला भारतीय विश्व चैंपियन बना दिया।

किंग कॉन्ग से टक्कर

साल 1956 में ऑस्ट्रेलियाई पहलवान किंग कॉन्ग के साथ दारा सिंह की ऐतिहासिक लड़ाई हुई। 130 किलो वजनी दारा सिंह 200 किलो के किंग कॉन्ग को रिंग से बाहर फेंककर रातोंरात सुर्खियों में आ गए और वहीं से शुरू हुआ दारा सिंह के सुपरस्टार बनने का सफर। इस जीत ने उन्हें ‘रुस्तम-ए-हिंद’ और ‘रुस्तम-ए-पंजाब’ जैसे खिताब दिलाए।

फिल्मी सफर

साल 1952 में फिल्म ‘संगदिल’ से उन्होंने बॉलीवुड में एंट्री की। शुरुआत धीमी रही, लेकिन 1962 में आई ‘किंग कॉन्ग’ फिल्म ने उन्हें स्टार बना दिया। इसके बाद उन्होंने ‘फौलाद’, ‘शेर दिल’, ‘रुस्तम-ए-हिंद’, ‘बजरंगबली’, ‘मर्द’, ‘धर्मात्मा’, ‘राम भरोसे’, और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी हिट फिल्मों में अभिनय किया। उन्होंने करीब 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और 16 फिल्में मुमताज के साथ कीं, जिनमें से 10 सुपरहिट रहीं। इन दोनों के अफेयर की भी खूब चर्चा रही, लेकिन समय के साथ ये रिश्ता फीका पड़ गया।

‘हनुमान’ के रोल में दिखे दारा सिंह

दारा सिंह को रामानंद सागर के पौराणिक धारावाहिक ‘रामायण’ में हनुमान जी का किरदार निभाकर ऐसी लोकप्रियता मिली कि उन्हें लोग पूजने लगे। इस किरदार के लिए उन्होंने मांसाहार तक छोड़ दिया था। ये रोल भारतीय टेलीविजन इतिहास में अमर हो गया और हनुमान के रोल में हमेशा दारा सिंह को ही देखा जाने लगा।

निर्देशक और लेखक भी रहे दारा सिंह

बहुत कम लोग जानते हैं कि एक्टर होने के साथ-साथ दारा सिंह एक सफल निर्देशक और लेखक भी रहे। उन्होंने पंजाबी और हिंदी में कई फिल्मों का निर्देशन किया, जिनमें ‘नानक दुखिया सब संसार’, ‘मेरा देश मेरा धर्म’, ‘रुस्तम’, ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं’ जैसी फिल्में शामिल हैं। साल 1989 में उन्होंने ‘मेरी आत्मकथा’ नामक आत्मकथा लिखी, जो 1993 में हिंदी में प्रकाशित हुई।

जाट महासभा के अध्यक्ष

साल 1998 में दारा सिंह ने बीजेपी जॉइन की और 2003 से 2009 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। वो पहले खिलाड़ी थे, जिन्हें राज्यसभा के लिए नामांकित किया गया था। इसके अलावा वे जाट महासभा के अध्यक्ष भी रहे हैं।

दारा सिंह की शादी

दारा सिंह की पहली शादी महज 14 साल की उम्र में बचनो कौर से हुई थीं। वो 17 साल की उम्र में ही पिता बन गए थे। बचनो के साथ दारा सिंह के एक बेटे प्रद्युमन सिंह रंधावा ने जन्म लिया। उनके कुल 6 बच्चे थे- इनमें तीन बेटे और तीन बेटियां शामिल हैं।

दारा सिंह की दूसरी शादी साल 1961 में सुरजीत कौर से हुई थी। ये एक पारंपरिक अरेंज मैरिज थी। इसी शादी से उनके बेटे विंदू दारा सिंह भी हुए, जो कि एक मशहूर अभिनेता हैं और उन्होंने भी रेसलिंग और अभिनय की दुनिया में कदम रखा।

दुनिया को कहा अलविदा

7 जुलाई 2012 को दारा सिंह को दिल का दौरा पड़ा। उन्हें कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल, मुंबई में भर्ती कराया गया, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। परिवार उन्हें घर ले आया और 12 जुलाई 2012 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।

चारों क्षेत्रों में पाई सफलता

दारा सिंह एक ऐसे विरले व्यक्तित्व थे जिन्होंने खेल, सिनेमा, साहित्य और राजनीति- चारों क्षेत्रों में सफलता पाई। उनकी जीवनगाथा आज भी प्रेरणा देती है कि सच्ची मेहनत और लगन से कोई भी इंसान हर मुकाम हासिल कर सकता है

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