Friday, February 13, 2026
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जब हर पल बदलता है इंसान का व्यवहार

  • बाइपोलर डिसआर्डर: यह एक ऐसी मानसिक बीमारी है जिसका इलाज संभव ही नहीं
  • ज्यादा खुश रहना मिनिया कहलाता है, जबकि दुखी रहना डिप्रेशन

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: इंसान का मूड उसके व्यवहार को प्रभावित करता है, लेकिन यदि मूड एक ही रहे जैसे उदास रहना या खुश रहना तो इसे बाईपोलर डिसआॅर्डर का नाम दिया जाता है। किसी भी व्यक्ति का मूड समय के साथ बदलता रहना चाहिए ऐसा नहीं होन पर वह इंसान मानसिक रोगी कहलाता है। मेडिकल के मानसिक रोग विभाग में में रोजाना सौ में से चालीस मरीज बाईपोलर डिसआॅर्डर बीमारी से ग्रस्त पाए जा रहें है।

इस बीमारी का इलाज संभव नहीं है लेकिन दवा लेकर इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। युवाओं के मुकाबले अधेड़ आयु के लोगो में इस बीमारी के ज्यादा मरीज है, इनमें भी महिलाओं की संख्या अधिक होती है। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान के पास अपने लिए समय नहीं है। मानसिक रूप से तनाव ज्यादा रहता है जिसका असर इंसान के व्यवहार पर भी पड़ रहा है।

इंसानों में तीन तरह का व्यवहार पाया जाता है एक ज्यादा खुश रहना जिसे मिनिया कहा जाता है। जबकि दूसरा उदास रहना जिसे डिप्रेशन कहा जाता है। इनसे अलग नार्मल व्यवहार होता है जिसमें हालातों के मुताबिक इंसान का व्यवहार बदलता है। जैसे कोई भी मनपसंद चीज मिलने के बाद खुश होना। जबकि अचानक किसी भी वजह से उदास होना।

यह दोनों प्रक्रियाएं आपकों मानसिक रूप से स्वस्थ्य होने का इशारा करती है, कह सकते है समय के साथ मूड बदलने को नार्मल माना जाता है, लेकिन यदि किसी भी इंसान में मूड न बदले तो उसे मानसिक रोगी माना जाता है। बीस से चालीस साल तक की उम्र में बाईपोलर डिसआॅर्डर के मामले कम पाए जाते है। जबकि चालीस साल के बाद इनकी संख्या बढ़ जाती है। इनमें भी महिलाओं की संख्या ज्यादा होती है।

यह ऐसे जाना जा सकता है कि यदि चालीस साल की उम्र वालों में दस लोग इस बीमारी से ग्रस्त होते है तो उनमें पांच महिला व पांच ही पुरूष होते है। लेकिन चालीस साल की उम्र के बाद मिलने वाले मरीजों में दस में से सात महिला मरीज होती हैं। यह बीमारी अनुवांशिक होती है, लेकिन इसका पता देर से चलता है। यदि किसी दंपत्ति में से किसी एक को भी यह बीमारी है तो उनकी संतान को भी यह बीमारी होने की संभावना 99 प्रतिशत रहती है।

हालांकि इसका पता जांच के बाद ही चलता है लेकिन आमतौर पर इसकी जानकारी रखने के लिए सभी को अपने व्यवाहर को लेकर जागरूक रहना चाहिए। इस बीमारी के हर साल भारत में एक करोड़ मामले सामनें आते है। इस बीमारी के एक पहलू मिनिया में उन्मादी होने पर मरीज में अत्याधिक ऊर्जा, नींद न आना, सच्चाई को स्वीकार न करना जैसे लक्षण रहते है।

जबकि डिप्रेशन होने पर मरीज में ऊर्जा की कमी, खुद को किसी काम के लायक न समझना व रोजाना की गतिविधियों में रूचि न रहना लक्षण रहते है। इंसान का व्यवहार न बदलते रहने की प्रक्रिया कई दिनों से लेकर महिनों तक रह सकती है। यह बीमारी वैसे तो आनुवांशिक है लेकिन कई बार यह ऐसे इंसानों में भी पैदा हो जाती है जो अपने को किसी भी समस्या या तनाव से बचानें के लिए नशे का इस्तेमाल करते है।

नशा इंसान में तनाव सहने की क्षमता को प्रभावित करता है, इसकी वजह से इंसान खुद कोई फैसला या अच्छा व बुरे के बारे में नहीं सोच पाता। जिसके बाद वह नशे का आदि हो जाता है और कई बार नशा न करने पर हालात बेकाबू हो जाते है। यहां तक की इंसान के मन में आत्महत्या करने के विचार आने लगते है। इसलिए तनाव से बचाव या ज्यादा खुश होने पर नशे का सेवन करने से बचना चाहिए।

इससे बचने के लिए यदि आपको लगे कि आपके व्यवहार में किसी एक शारीरिक प्रक्रिया ज्यादा होती है तो तुरंत मनोचिकित्सक से संपर्क करें। उसे अपने मन की हर बात बताएं जिससे वह जान सके कि आपके शरीर में कौन से रसायन की कमी या अधिकता है। इंसान के मूड को प्रभावित करने में सेरोटॉलिन व डोपामीन रयायनों का योगदान रहता है।

यह दोनों रसायन ही इंसान को खुश व उदास रहने के लिए प्रेरित करते है। मनोचिकित्सक को अपने व्यवहार के बारे में सही जानकारी देनें पर वह पता कर सकते है कि शरीर में किस रसायन की मात्रा ज्यादा व कम है। इसी के मुताबिक वह दवाएं देतें है।

बाईपोलर डिसआर्डर एक मानसिक बीमारी है जिसका इलाज संभव नहीं है। लेकिन दवाओं से इसे कंट्रोल किया जा सकता है,

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बस समय रहते सही जानकारी होनी चाहिए कि मरीज में कौन से लक्षण ज्यादा हैं।
-डा. तरूण पाल, एचओडी, मानसिक रोग विभाग मेडिकल, मेरठ।

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