Friday, June 5, 2026
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श्रीकृष्ण प्रेम और भक्ति माधुर्य की साक्षात प्रतिमूर्ति सूरदास

Sanskar 5


सूरदास जयंती को मनाना एक तरह से भगवान कृष्ण का उत्सव है। साहित्यिक क्षेत्र में सूरदास का कार्य कृष्ण के लिए है। सूरदास जयंती के जन्मदिन के उपलक्ष्य में भगवान कृष्ण के जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाए जाते हैं, उनके द्वारा बनाई गई कविताएं और गीत अभी भी हिंदू भक्ति संगीत का एक अविश्वसनीय हिस्सा है, जो की सूरदास जयंती के दिन गाये जाते हैं।

कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवियों और लेखकों में सूरदास जी को एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण भक्त सूरदास जी का जन्म मथुरा के रुनकता गांव में हुआ था। यह गांव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूरदास का जन्म दिल्ली के पास सीही नामक स्थान पर एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह बहुत विद्वान थे, उनकी लोग आज भी चर्चा करते हैं।

वे मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे। सूरदास के पिता, रामदास बैरागी प्रसिद्ध गायक थे। प्रारंभ में सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया।उस दौरान उन्होंने वल्लभाचार्य द्वारा ‘श्रीमद् भागवत’ में वर्णित कृष्ण की लीला का ज्ञान प्राप्त किया तथा अपने कई पदों में उसका वर्णन भी किया।

उन्होंने ‘भागवत’ के द्वादश स्कन्धों पर पद-रचना की, ‘सहस्त्रावधि’ पद रचे, जो ‘सागर’ कहलाएं। सूरदास की पद-रचना और गान-विद्या की ख्याति सुनकर अकबर भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकें। अत: उन्होंने मथुरा आकर सूरदास से भेंट की।वे जन्म से ही दृष्टिहीन थे और भगवान श्रीकृष्ण में उनकी अगाध आस्था थी।मात्र छ: वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने अपने माता-पिता को अपनी सगुन बताने की विद्या से चकित कर दिया था।

सगुन बताने की विद्या के कारण शीघ्र ही उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। इस उपलब्धि के साथ ही वे गायन विद्या में भी शुरू से ही प्रवीण थे।उन्होंने जीवनपर्यंत भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति की और ब्रज भाषा में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया। वे भक्ति शाखा के कवियों में महत्वपूर्ण हैं।

सूरदास जयंती को मनाना एक तरह से भगवान कृष्ण का उत्सव है। साहित्यिक क्षेत्र में सूरदास का कार्य कृष्ण के लिए है। सूरदास जयंती के जन्मदिन के उपलक्ष्य में भगवान कृष्ण के जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाए जाते हैं, उनके द्वारा बनाई गई कविताएं और गीत अभी भी हिंदू भक्ति संगीत का एक अविश्वसनीय हिस्सा है, जो की सूरदास जयंती के दिन गाये जाते हैं।

सूरदास जयंती को एक महत्वपूर्ण दिन के रूप में मनाई जाती है। सूरदास जी जन्म से ही दृष्टिहीन थे, लेकिन फिर भी उन्होंने भगवान कृष्ण को समर्पित भजन एवं गीतों की उत्कृष्ट रचना की थी। ऐसा कहा जाता है कि सूरदास जी ने हजारों से अधिक रचनाओं का निर्माण किया है।

सूरसागर उनकी उत्कृष्ट कृति है, ‘समुद्री कार्य’ जैसा कि इसके नाम से संकेत मिलता है और उनके सभी कार्यों में सबसे प्रभावशाली और महत्वपूर्ण बना हुआ है। इसमें कृष्ण के जीवन का विस्तार से वर्णन किया गया है। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी, हालांकि उन्होंने अपनी जन्मभूमि को कभी नहीं छोड़ा, यहां तक कि मुगल बादशाह अकबर ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी।

माना जाता है कि बचपन में उन्हें एक बार भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हो गए थे। एक बार सूरदास भजन गुनगुना रहे थे और वल्लभाचार्य भगवान की मानसिक पूजा कर रहे थे। मानसिक पूजा में मन में ही पूजा की जाती है। जैसे भक्त मन में ही सोचता है कि अमुक सामग्री से और अमुक तरीके से हम भगवान की पूजा कर रहे हैं। मानसिक पूजा में वल्लाचार्य भगवान को पुष्पहार चढ़ा रहे थे, लेकिन पुष्पहार छोटा पड़ गया। हार श्रीकृष्ण के मुकुट में जाकर अटक रहा था। वल्लभाचार्य भगवान को हार पहनाने में असफल हो रहे थे।

इसी दौरान सूरदास बोले कि गुरुजी हार की गांठ खोल लें। भगवान को हार पहनाकर फिर से गांठ बांध लेना। वल्लभाचार्य ये सुनकर आश्चर्यचकित हो गए, क्योंकि वे तो मानसिक पूजा कर रहे थे। उनके मन की बात कोई भी नहीं जान सकता, लेकिन सूरदास ने अपनी भक्ति की शक्ति से यह बात जान ली थी।सूरदास श्रीकृष्ण प्रेम और माधुर्य की प्रतिमूर्ति है।जिसकी अभिव्यक्ति बड़ी ही स्वाभाविक और सजीव रूप में हुई।वे कहते हैं कि अगर उन्होंने ईश्वर-भक्ति नहीं की तो उनका इस संसार में जन्म लेना ही व्यर्थ है-‘सूरदास भगवंत भजन बिनु धरनी जननी बोझ कत मारी’

सूरदास जी हमें सिखाते हैं कि जब भक्ति दिल से होती है, तो हमें आंखों की जरूरत नहीं होती, बस एक दयालु हृदय ही काफी होता है।


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