
समाज में दो धाराएं हमेशा रही हैं। एक राजसत्ता की दूसरी लोकसत्ता की। लोकसत्ता का मूलधार लोक है, जन है, नागरिक है। राज सत्ता का लक्ष्य और आधार ही सत्ता है। राजतंत्र हो या प्रजातंत्र, तंत्र की लोक पर हावी होने की हमेशा कोशिश रही है। अधिनायकवादी ताकतों ने ही नहींं प्रजातात्रिंक व निर्वाचित सरकारों ने भी नए तरीके ईजाद कर नागरिक स्वतंत्रता व आधिकारों के हनन के प्रयास किए हैं। आधुनिक तकनीक तो और भी नए-नए हथियार उपलब्ध करा देती है। लोकतंत्र, न्याय और बंधुता की दिशा में नागरिक समाज भी तरतीब और तकनीक से लैस हो समय के साथ काफी आगे आ गया है। पर राज हमेशा ज्यादा संगठित सुसज्जित होता है। नागरिक विभाजित भी हो जाते हैं।