Thursday, May 28, 2026
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समान नागरिक संहिता का विरोध राजनीतिक

Samvad


गौतम चौधरी |

इन दिनों समान नागरिक संहिता, यानी यूनिफार्म सिविल कोड पर बहस छिड़ी हुई है। इस बहस को अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों पर केन्द्रित करने की कोशिश की जा रही है। कुछ मौकापरस्त ताकतें मुसलमानों में यह डर पैदा करने की कोशिश कर रही है कि अगर समान नागरिक संहिता देश में लागू हो गया तो मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक घोषित कर दिया जाएगा। इस मामले में कुछ सकारात्मक कोशिशें भी होने लगी है।

विगत दिनों मैं सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो देख रहा था। मुस्लिम समाज के धर्मगुरु बेहद समझदारी से समान नागरिक संहिता की व्याख्या कर रहे थे। उनकी अपनी व्याख्या थी। वे कह रहे थे कि इस देश में अगर समान नागरिक संहिता लागू हो जाएगा तो कुछ भी खास बदलने वाला नहीं है। उनका कहना था कि भारत में जब तक संविधान जिंदा है, तब तक हिन्दू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग कानून नहीं हो सकते हैं। हत्या, अपराध आदि के लिए दोनों समुदायों को एक ही कानून से दंडित किया जाएगा। समान नागरिक संहिता से यदि कुछ बदलेगा तो एक-दूसरे से अलग करने वाली कुछ व्यवस्थाएं।

प्रत्येक धर्म अपने आदेशों में मानव कल्याण की शिक्षा देता है। इस्लामिक पवित्र गंथों में इंसानियत की भलाई के सैंकड़ों आदेश मौजूद हैं। यहां तक की किसी दूसरी इंसान को पीड़ा न पहुंचाने की बात कई बार दुहराई गयी है। इस मामले में सूफी खानकाह एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद कौसर हसन मजीदी का कहना है कि ‘‘पवित्र कुरान में इतरा कर चलने पर बेहद महत्वपूर्ण बात कही गयी है। मसलन, इतराने वालों को अल्लाह पसंद नहीं करता। जहां पवित्र कुरान में जमीन पर फसाद करने वालों की निंदा की गयी है, वहीं दूसरी तरफ किसी बेगुनाह का कत्ल करने वाले को सारी इंसानियत का कातिल बताया गया है। पवित्र कुरान के सारे आदेशों के पीछे जनकल्याण की भावना निहित है और यही वजह है कि सारी जिंदगी एहले मक्का का जुल्म सहने के बाद, मक्का फतह के अवसर पर बदला लेने के सर्वसम्मत कानून के मौजूद होने के बाद भी पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जुल्म करने वालों को आम माफी का ऐलान किया।’’

भारत एक पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। यहां का संविधान सभी धर्मों और जातियों के व्यक्तियों को समान अधिकार और अवसर देता है। समान नागरिक संहिता, भारत के संविधान निर्माताओं द्वारा उसे आने वाले समय में, लागू करने की बात की गयी थी। देश आजाद होने के 75 साल बाद, अब शायद यही उपयुक्त समय है कि देश में समान नागरिक संहिता को लागू किया जाए। सबसे पहले तो हमें इस बात को समझना होगा कि समान नागरिक संहिता किसी भी रूप में धर्म के सिद्धांतों के विपरीत नहीं है। तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर नियम और कानून बनाए जाने की इस्लाम इजाजत देता है। ऐसे कई कानून मुस्लिम देशों में भी बनाए गए हैं। सच पूछिए तो इस्लाम के इतिहास को साम्राज्यवादी नजरिए से देखना ठीक नहीं होगा। इसे धार्मिक और मानवता के नजरिए से देखना ही उचित है। भारत में लगभग 800 वर्षों तक मुस्लिम शासकों ने शासन किया लेकिन इस्लाम के साम्राज्यवादी स्वरूप को स्थापित करने की कोशिश की उन्हें न तो यहां के समाज ने स्वीकार किया और न ही मुस्लिम दरवेशों ने उन्हें मान्यता प्रदान की। भारतीय शासकों ने न तो कभी ओटोमन साम्राज्य का समर्थन किया और न ही अरब राष्ट्रवाद को स्वीकार किया। इसलिए वर्तमान दौर में भी वर्तमान परिस्थिति के आधार पर जो भारतीय गणतंत्र को मजबूत बनाए वैसे कानून लागू करने में देश के प्रत्येक नागरिक को सहयोग करना चाहिए। निःसंदेह ऐसे कानून होने चाहिए जिससे सब की हिफाजत हो और हुकूमत का इक़बाल बुलंद रहे।

समान नागरिक संहिता, नागरिकों को समान रूप से फौजदारी और दीवानी विधि के दायरे में लाना चाहती है। फिलहाल, आईपीसी और दूसरी दंड विधियों के द्वारा फौजदारी विधि समस्त भारत में, समान रूप से लागू है और बहुत से दीवानी मामलों में भी, समान नागरिक संहिता के तरह के नियम हैं, मसलन सरकारी नौकरी में, समान रूप से नियम लागू हैं। समान नागरिक संहिता के लागू होने से इसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा।

केन्द्र सरकार ने दावा किया है कि समान नागरिक संहिता के द्वारा धर्म के आंतरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा रहा है। यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध मात्र एक राजनीतिक स्टंट के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। संविधान की दुहाई देने वाले संविधान सभा के उस निर्णय को क्यों निकालते हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड की रचना की जाएगी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिस शाहबानो केस के निर्णय के बाद देशव्यापी बवाल के बाद न सिर्फ तत्कालीन सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय को बदलने के लिए कानून तक बना डाला, उसका लाभ क्या हुआ? जबकि 2010 में उच्चतम न्यायालय द्वारा एक व्यवस्था देते हुए तलाकशुदा महिला को उसके विवाह होने तक अथवा आजीवन गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित कर दिया गया। ऐसे बहुत से व्यक्तिगत विधियों के उदाहरण हैं, जिसमें नागरिकों को समान कानूनों के अधीन ही रहना होता है।

महत्वपूर्ण तथ्य है कि कुछ लागों के द्वारा समानता के अधिकार की प्रतीक समान नागरिक संहिता का विरोध किया जाना हास्यास्पद लगता है। जो लोग इसका विरोध धर्म और आस्था के नाम पर कर रहे हैं, उनके द्वारा कोरोना काल में सभी धर्मों के धार्मिक स्थल पर उपासना मर्यादित करने का इन कथित लोगों ने समर्थन किया था और तर्क दिया था, ‘‘मानव जीवन को बचाना परम आवश्यक है और सभी को लॉकडाउन का पालन करना चाहिए।’’ तो आज इन कथित लोगों द्वारा यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध क्यों? ऐसा मात्र राजनीति के चलते किसी खास दल को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। इस मामले में धर्म से कुछ भी लेनादेना नहीं है। समान नागरिक संहिता सभी धर्मों के लागों को समान अधिकार दिलाने वाली एक व्यवस्था होगी जिसे हम सभी को समर्थन करना चाहिए।


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