
सम्राटों की एक परम्परा में एक बेटा भिखारी है…कई पीढ़ियों से भीख मांगी जा रही है लेकिन परम्परा सम्राटों की है। घर में कथा है कि बाप-दादे किसी पीढ़ी में बड़े सम्राट थे, बड़े खजाने थे उनके पास पर यह पता नहीं चलता कि वे खजाने कहां खो गए। पीढ़ियों तक पता नहीं चला। फिर एक पीढ़ी में एक दिन अचानक एक फकीर घर पर आया और उसने उस घर के जवान लड़के से कहा कि अब तुम वह आदमी हो जिसको खजानों की खबर दी जा सकती है। हमारे पास तुम्हारे बाप दादे छोड़ गए हैं। हमारे पास मतलब हमारे गुरु के पास, उनके गुरु के पास, फकीरों के पास छोड़ गए हैं कि जब हमारे घर में ऐसा आदमी पैदा हो जो धन को प्रदर्शन करने में उत्सुक न हो, तब यह खजाना वापस सौंप देना, तो तुम वह आदमी हो। मैं तुम्हें खजाना सौंपने आया हूं। उस युवक ने कहा लेकिन मुझे कुछ सोचने का मौका दें।
उस फकीर ने कहा कि बिल्कुल ठीक, तुम्हीं वह आदमी हो, जिसकी तलाश थी। उस फकीर ने कहा उठो क्योंकि हम भी कब तक संभालते रहें। और तुम ही वह आदमी हो, लक्षण पूरे हो गए, क्योंकि हमारे पास जो दस्तावेज हैं, उसमें कहा गया है कि जब भी परिवार का हमारा आदमी कहे, सोचने का मौका दो उसे तुम दे आना। हम हर पीढ़ी में आते रहे लेकिन जिससे भी हमने पूछा वह उठ कर खड़ा हो गया। वह धन उसे सौंप दिया गया। धन वापस मिल गया लेकिन भीख मांगनी जारी रही। सम्राट ने बुलाया उस युवक को और कहा कि पागल तो नहीं हो, हमने सुना है कि तुम्हें पुश्तैनी धन वापस मिल गया है फिर यह भीख क्यों मांग रहे हो। उस युवक ने कहा कि पहले भीख मांगना एक मजबूरी थी, अब एक कर्त्तव्य है क्योंकि इसी शर्त पर वह धन मुझे सौंपा गया है कि उसका प्रदर्शन न हो। और आज मैं घर बैठ जाऊं और भीख मांगने न जाऊं तो इससे बड़ा प्रदर्शन और क्या होगा!
-सुभाष बुडावन वाला


