नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष गुरु पूर्णिमा का पर्व 10 जुलाई 2025, गुरुवार को मनाया जाएगा। यह पावन तिथि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को आती है और गुरु की महिमा, ज्ञान और उपदेशों को समर्पित मानी जाती है। भारत ही नहीं, बल्कि नेपाल, श्रीलंका, तिब्बत और थाईलैंड जैसे बौद्ध देशों में भी यह दिन अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा का महत्व केवल आध्यात्मिक नहीं है, बल्कि यह दिन सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है।
गुरु का स्थान भारतीय संस्कृति में सबसे ऊंचा माना गया है। ‘गु’ का अर्थ है अंधकार और ‘रु’ का अर्थ है उसे हटाने वाला। यानी गुरु वह होता है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश देता है। गुरु पूर्णिमा को मनाने का मूल उद्देश्य अपने गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करना होता है।
पौराणिक मान्यताएं
गुरु पूर्णिमा से जुड़ी कई धार्मिक कथाएं हैं। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था, जिन्होंने चारों वेदों का विभाजन कर उन्हें व्यवस्थित किया था। वेदव्यास जी को ‘आदि गुरु’ भी कहा जाता है, और उनके सम्मान में ही इस दिन को “व्यास पूर्णिमा” भी कहा जाता है।
बौद्ध धर्म के अनुयायियों के अनुसार, भगवान गौतम बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद पहली बार सारनाथ में अपने पांच शिष्यों को उपदेश इसी दिन दिया था। यही कारण है कि बौद्ध समुदाय में भी यह दिन विशेष पूजा और ध्यान के साथ मनाया जाता है।
पूजा विधि
गुरु पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पहले स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण किए जाते हैं। फिर घर या मंदिर में गुरु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है और उन्हें पुष्प, वस्त्र, अक्षत, धूप-दीप आदि से पूजन कर आरती की जाती है। गुरु को दक्षिणा, वस्त्र या अन्य श्रद्धा अनुसार भेंट दी जाती है।
यदि व्यक्ति के जीवन में कोई जीवित गुरु हैं, तो उन्हें जाकर साक्षात प्रणाम कर आशीर्वाद लेना अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है। कई स्थानों पर गुरु के चरण धोकर उन्हें स्नान कराकर पूजा की परंपरा भी निभाई जाती है। इसके अलावा, वेदपाठ, भजन, कीर्तन, ध्यान, और सत्संग का भी आयोजन होता है।
आध्यात्मिक महत्व
गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह आत्मबोध, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति का दिन भी है। यह दिन आत्मिक गुरु या ईश्वर के उस स्वरूप को समर्पित होता है जो जीवन को दिशा देता है। इस दिन व्रत रखने और गुरु मंत्र का जाप करने से विशेष फल मिलता है। यह दिन शिक्षकों, संतों, साधु-संतों और मार्गदर्शकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का श्रेष्ठ अवसर है।

