Friday, June 5, 2026
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वंदे मातरम्: गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने को पैदा कर दिया था जुनून

  • 28 दिसंबर 1896 को पहली बार कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था वंदे मातरम्

जनवाणी फीचर डेस्क |

वंदे मातरम्, दो ऐसे शब्द जो आजादी की लड़ाई का प्रतीक बन गए। स्वतंत्रता संग्राम में जहां एक ओर स्वतंत्रता सेनानी और क्रान्तिकारी वंदे मातरम से अभिवादन कर एक दूसरे को प्रेरणा देते थे वहीं अंग्रेजों को इस शब्द से इतना भय उत्पन्न हो गया था कि इन्हें बोलने वाला हर एक शख्स उन्हें अपने लिए खतरा लगने लगा।

ये दो शब्द जिस गीत से लिए गए वह आज हमारा राष्ट्रीय गीत है और इसके रचनाकार थे बंकिम चन्द्र चटर्जी जिन्होने संस्कृत व बंगला में इसे लिखा था। इस कालजयी और जन-जन को प्रेरित कर रहे गीत को बंकिम ने 1876 मे लिखा था और आज ही के दिन यानि 28 दिसम्बर 1896 को कांग्रेस अधिवेशन में इसे पहली बार गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने गाकर इसकी महत्ता सिद्ध की थी।

भारत माता की जय, जय हिन्द और भी न जाने कितने नारों और गीतों ने स्वतंत्रता संग्राम मे आहूति देने के लिए असंख्य लोगों को प्रेरित किया परन्तु वंदे मातरम् ने जो प्रभाव पैदा किया और स्वतंत्रता सेनानियों विशेष रूप से क्रान्तिकारियों को भारत मां के चरणों में अपना शीश चढ़ाने के लिए तैयार किया वैसा प्रभाव किसी और नारे ने शायद ही किया हो। वंदे मातरम जिसका शाब्दिक अर्थ है कि हे मां मैं तुझे नमन करता हूं, पर आजादी की लड़ाई में मां का अर्थ इस वाक्य में भारत माता से ही लिया जाता था।

इस गीत ने पूरे भारत में भारत को अपनी मां मानकर गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने का जो जुनून पैदा हुआ उसका प्रभाव पूरे स्वतंत्रता आंदोलन इतिहास पर इस कदर पड़ा कि न जाने कितने दीवाने इसी गीत को गाकर हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गये।

दरअसल, 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज भारतीय विचारधारा को परिवर्तित करने का हर संभव प्रयास कर रहे थे इसी के तहत उन्होंने ब्रिटेन की महारानी की शान मे पढ़े जाने वाले गीत गॉड सेव द क्वीन, को जोरो-शोरों से चारों ओर प्रचारित करा रखा था।

इससे आहत तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर बंकिम जी ने इस गीत की रचना की थी। इस गीत को उन्होंने 1876 में ही रच दिया था परन्तु अपने महान उपन्यास आनन्द मठ में जब उन्होंने इस गीत को स्थान दिया और 1882 मे यह उपन्यास प्रकाशित हुआ तो सबको इस गीत का पता चला।

यह उपन्यास मुस्लिम जागीरदारों द्वारा जनता के शोषण के विरोध में संन्यासियों द्वारा किये गये विद्रोह पर आधारित था। सो मुस्लिमों ने इस गीत पर अपनी असहमति दिखायी साथ में उन्होंने धार्मिक हवाला भी दिया। अंग्रेजों ने भी इस उपन्यास और गीत पर इसलिए ऐतराज किया क्योंकि सन्यासी विद्रोह गुलामी के भी विरुद्ध था। पर इस गीत का जितना विरोध हुआ यह आग मे कुंदन की तरह तपकर उतना ही जनता के दिलों के करीब पहुंचता गया।

यहां तक की लाला लाजपत राय ने वंदे मातरम के नाम से एक पत्रिका लाहौर से प्रकाशित की। वहीं हीरा लाल ने 1905 में इस पर एक फिल्म भी बनायी। 1905 मे ही बंग विभाजन के कारण जनता के मन में विद्रोह की आग भड़क उठी जिसमें इस गीत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और हर एक क्रांतिकारी की जबान पर यह गीत बस गया। इसकी महत्ता को समझकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1937 के अधिवेशन में मौलाना अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चन्द्रबोस और रविन्द्रनाथ टैगोर की उपस्थिति में इसे प्रथम बार राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया।

हालांकि इस गीत के प्रथम दो पदों को ही स्वीकार किया गया ताकि गैर हिंदुओं को भी इससे कोई आपत्ति न हो फिर भी मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना ने इसका कड़ा विरोध किया। परन्तु विद्वान रविन्द्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी के प्रयासों से यह राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया। 24 जनवरी 1950 को अंतिम रूप से संविधान सभा में राजेन्द्र प्रसाद ने इसे राष्ट्रीय गान के समान महत्व देने और सर्वसम्मति से राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। वर्तमान में केरल के राज्यपाल और पूर्व में अनेक मंत्रालयों मे मंत्री रहे मुस्लिम सुधारों के पैरोकार आरिफ मोहम्मद खान ने इसका उर्दू अनुवाद कुछ इस तरह किया कि इसे मुस्लिम भी अपनी धार्मिक भावनाओं को आहत किए बिना गा सके।

उन्होंने कहा कि तस्लीमात, मां तस्लीमात, तू भरी है मीठे पानी से फल फूलों की शादाबी से। कुल मिलाकर यह गीत आज भी जब राष्ट्रीय पर्वों पर सुनते हैं तो एक नयी उर्जा व राष्ट्रीयता की भावना से भर देता है और सिद्ध करता है कि यही राष्ट्रीय गीत होने के सर्वथा योग्य है। वंदे मातरम्।
प्रस्तुति- गुलशन गुप्ता, बिजनौर

आरिफ मोहम्मद खान द्वारा वंदे मातरम् का उर्दू अनुवाद

तस्लीमात, मां तस्लीमात,
तू भरी है मीठे पानी से, फल फूलों की शादाबी से।
दक्खिन की ठंडी हवाओं से, फसलों की सुहानी फिजाओं से।
तस्लीमात, मां तस्लीमात।
तेरी रातें रोशन चांद से, तेरी रौनक सब्ज-ए-फाम से।
तेरी प्यार भरी मुस्कान है, तेरी मीठी बहुत जुबान है।
तेरी बांहों में मेरी राहत है, तेरे कदमों मे मेरी जन्नत है।
तस्लीमात, मां तस्लीमात।

 

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