Wednesday, February 11, 2026
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फुटकर दुकानदार खो रहे अपना कारोबार

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खरीदारी भारतीय समाज की जीवनशैली का अहम हिस्सा रही है। परंपरागत रूप से लोग बाजारों में जाकर दुकानदारों से सामान खरीदते रहे हैं। लेकिन बदलते समय और तकनीक की तेज रफ़्तार ने उपभोक्ताओं की सोच और आदतों को बदल दिया है। अब ग्राहक सिर्फ अच्छे सामान या उचित दाम की तलाश में नहीं रहते, बल्कि बेहतर व्यवहार और सुखद अनुभव भी चाहते हैं। ऐसे में बदमिजाज दुकानदारों का रवैया ग्राहकों को आनलाइन शॉपिंग की ओर तेजी से खींच रहा है। आॅनलाइन शॉपिंग ने ग्राहक को यह आजादी दी है कि वह बिना किसी झंझट के, सुविधाजनक और किफायती तरीके से खरीदारी कर सके। यही कारण है कि आज आॅनलाइन शॉपिंग, परंपरागत बाजारों पर भारी पड़ रही है। विपरीत, आॅनलाइन प्लेटफॉर्म उपभोक्ताओं को बिना किसी दबाव और झंझट के खरीदारी का अवसर देते हैं। घर बैठे ग्राहक हजारों उत्पादों की तुलना कर सकते हैं, कीमतें देख सकते हैं और अन्य ग्राहकों की राय पढ़ सकते हैं। यही पारदर्शिता और विकल्पों की भरमार उन्हें आकर्षित करती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आनलाइन कंपनियां समय-समय पर आॅफर और डिस्काउंट देकर ग्राहकों को राहत देती हैं। वहीं, 24 घंटे उपलब्ध रहने वाली यह सेवा उपभोक्ताओं को समय बचाने का भी मौका देती हैं। रिटेल एक्सपर्ट्स का मानना है कि आज के उपभोक्ता सिर्फ सामान नहीं खरीदते, बल्कि खरीदारी का अनुभव भी खरीदते हैं। यदि दुकानदार ग्राहकों से सलीके से पेश न आए तो वे दोबारा वहां जाना पसंद नहीं करते। भारत में आॅनलाइन शॉपिंग, जिसे ई-कॉमर्स भी कहा जाता है, तेजी से बढ़ता हुआ क्षेत्र है। स्मार्टफोन की बढ़ती संख्या, इंटरनेट की पहुंच (2024 तक लगभग 95 करोड़ इंटरनेट यूजर्स), और डिजिटल पेमेंट्स जैसे यूपीआई के कारण यह बाजार तेज गति से विकसित हो रहा है। 2025 की शुरूआत में (सितंबर 2025 तक), ई-कॉमर्स बाजार का आकार विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार लगभग 10-12.5 लाख करोड़ रुपये के बीच अनुमानित है। यह आंकड़े जीएमवी पर आधारित हैं, जो कुल बिक्री मूल्य को दर्शाते हैं। ई-कॉमर्स में ‘कारोबार’ से तात्पर्य जीएमवी से है, जो कुल लेन-देन का मूल्य है। 2024 में यह 10-12 लाख करोड़ रुपये का था, और 2025 में यह 19-23 प्रतिशत की ग्रोथ के साथ बढ़कर 11-12.5 लाख करोड़ रुपये हो सकता है। 2024 में यूपीआई ट्रांजेक्शन्स का मूल्य मई तक ही 25.14 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया था, जो ई-कॉमर्स का एक बड़ा हिस्सा है। वहीं सब्सक्रिप्शन ई-कॉमर्स का कारोबार 2024 में 88,479 करोड़ रुपये था, जो एक अनुमान के अनुसार साल 2025-2033 में 45 प्रतिशत की वृद्धि दर से बढ़ेगा। क्विक कॉमर्स का बाजार 2025 तक लगभग 45,000 करोड़ रुपये पहुंच सकता है।

ये आंकड़े दिखाते हैं कि सालाना कारोबार लाखों करोड़ रुपये में है, और यह ग्रामीण क्षेत्रों (टियर-2/3 शहरों) से 60 प्रतिशत योगदान दे रहा है। लेकिन यह विकास फुटकर दुकानदारों, खासकर किराना स्टोर्स के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। ये छोटी दुकानें, जो देश की रिटेल अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं (कुल 1.3 करोड़ किराना स्टोर्स, जो 88 प्रतिशत एफएमसीजी सेल्स को हैंडल करती हैं), अब अपनी बाजार हिस्सेदारी खो रही हैं। आॅनलाइन प्लेटफॉर्म्स की सुविधा, डिस्काउंट और तेज डिलीवरी के कारण ग्राहक दैनिक जरूरतों की खरीदारी के लिए इनसे रुख कर रहे हैं, जिससे फुटकर दुकानदारों को भारी नुकसान हो रहा है। आॅनलाइन शॉपिंग ने फुटकर दुकानों का ग्रॉसरी और दैनिक सामान का बाजार छीन लिया है। क्विक कॉमर्स ने किराना स्टोर्स के 25-30 प्रतिशत बाजार पर कब्जा कर लिया है, जिससे कई दुकानों का राजस्व 40-50 प्रतिशत तक गिर गया है। आॅल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन के अनुसार, पिछले एक वर्ष में लगभग 2 लाख किराना स्टोर्स बंद हो चुके हैं, जो मुख्य रूप से मेट्रो क्षेत्रों में हैं।

कुल मिलाकर, 30 मिलियन किराना स्टोर्स में से कई अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। इससे न केवल दुकानदारों की आजीविका खतरे में है, बल्कि स्थानीय स्तर पर नौकरियां भी कम हो रही हैं। ईलारा कैपिटल की रिपोर्ट के अनुसार, डिस्ट्रीब्यूटर्स किराना स्टोर्स से ड्यूज रिकवर नहीं कर पा रहे, क्योंकि दुकानदारों के पास पैसे की कमी है। यह समस्या विशेष रूप से छोटे शहरों में बढ़ रही है, जहां क्विक कॉमर्स अब फैल रहा है। कुल मिलाकर, आॅनलाइन शॉपिंग ने सुविधा दी है, लेकिन छोटे दुकानदारों की आजीविका को खतरा पैदा कर दिया है। स्पष्ट है कि तकनीक ने ग्राहकों को विकल्प की आजादी और व्यवहार की स्वतंत्रता दी है। यही वजह है कि आने वाले वर्षों में उपभोक्ताओं का रुझान परंपरागत बाजार से हटकर और अधिक आॅनलाइन प्लेटफॉर्म्स की ओर बढ़ने की संभावना है।

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