Wednesday, February 11, 2026
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वो गाली क्या जो दिल तक न पहुंचे

गाली भारतीय जीवन की सार्वभौमिक भाषा है। यह वही भाषा है जो संसद से लेकर सब्जी मंडी तक समान अधिकार से बोली जाती है। मजा यह कि इसमें किसी अनुवादक की जरूरत नहीं पड़ती। चाहे आप बिहारी हों या पंजाबी, तमिल हों या मराठी—गाली का अर्थ सब समझते हैं। यह इतनी लोकतांत्रिक है कि बच्चे खेलते-खेलते सीख जाते हैं, और बुजुर्ग मरणासन्न होते हुए भी अंतिम सांस तक गाली निकाल सकते हैं। गाली न जाति देखती है, न धर्म, न भाषा—यह समता का सच्चा सिद्धांत है। हमारे संविधान निर्माताओं ने अगर सचमुच समानता का आधार ढूंढा होता तो संविधान की पहली पंक्ति होती—‘भारत गाली प्रधान गणराज्य है।’ गाली वह पुल है जो अमीर-गरीब, पढ़े-लिखे और अनपढ़, शहर और गांव, नेता और जनता—सबको जोड़ता है।

गाली का सबसे बड़ा मंच राजनीति है। नेता जब मंच पर खड़े होते हैं तो शेर-ओ-शायरी से जनता नहीं जागती। लेकिन जैसे ही गाली की बौछार होती है, भीड़ में बिजली दौड़ जाती है। गाली सुनकर जनता ऐसा पुरजोर ताली बजाती है मानो कोई पाँच सौ का नोट हवा में लहराया गया हो। और मजेदार यह कि गाली जितनी असभ्य होती है, उसका स्वागत उतना ही सभ्य तरीके से होता है—लोग तालियाँ, सीटियाँ, जयकारा करते हैं। राजनीति में गाली एक रणनीति है। गाली के बल पर वोट खींचे जाते हैं, सरकारें गिरती हैं और गठबंधन बनते हैं। नेताओं के लिए गाली तलवार की धार है। बिना गाली के भाषण वैसा ही है जैसे बिना घी का हलवा—स्वाद तो है, लेकिन ठसक नहीं।

अब आप कहेंगे—गाली बुरी चीज है। मैं कहता हूं—नहीं, गाली तो आत्मा की शुद्धि है। सोचिए, आदमी आफिस में बॉस की डांट खाकर घर आता है। पत्नी ने नमक ज्यादा डाल दिया। अब बेचारा क्या करे? अगर गाली न हो तो वह या तो हार्ट अटैक से मर जाएगा या अखबार में कविता लिखने लगेगा। गाली उसे बचाती है। गाली निकालकर आदमी का गुबार बाहर आ जाता है। गाली, मन का वेंटिलेशन है। यह भावनाओं का सेफ्टी वाल्व है। गाली इसलिए अमर है, क्योंकि यह मानसिक स्वास्थ्य की टैबलेट है। डॉक्टर न लिखें, किंतु गाली दिल का ब्लड प्रेशर नियंत्रित करती है। देखिए, कितने ‘हेल्थ बेनिफिट्स’ हैं गाली के—सोसायटी उसके बिना कब की पागलखाने में पहुंच चुकी होती।

गाली कोई मात्र अपशब्द नहीं, यह भारतीय जीवन का रस है। गाली हमें हंसाती है, आराम देती है, सत्ता चलाती है और समाज को जोड़ती है। गाली के बिना हमारी भाषा ऐसी हो जाएगी जैसे बिना नमक की दाल—खाई तो जा सकती है, पर स्वाद नहीं आएगा। और जरा सोचिए, जब इस देश में गाली ही सबसे प्रिय और सर्वमान्य अभिव्यक्ति है, तो क्यों न गाली का महिमामंडन किया जाए? इसलिए भाइयो-बहनो, अगली बार जब कोई आपको गाली दे तो बुरा मत मानिए। यह समझिए कि उसने आपको राष्ट्र की सबसे सजीव परंपरा में शामिल कर लिया है।

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