Thursday, February 12, 2026
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डेमोक्रेसी मिटाओ, प्रदूषण हटाओ

हम तो पहले ही कह रहे थे, अमृतकाल में भी भारत को प्रदूषण का जो संकट झेलना पड़ रहा है, जरूर उसके लिए जवाहरलाल नेहरू ही जिम्मेदार हैं। खैर! हमारी किसी ने नहीं मानी तो नहीं मानी, पर अब तो सुधीर चौधरी ने भी नेहरू जी के ही देश की राजधानी से लेकर, उत्तर प्रदेश की राजधानी तक छायी धुंध के लिए दोषी होने की पुष्टि कर दी है। अब तो सब को मानना ही पड़ेगा कि वाकई यह सब नेहरू जी का ही किया-धरा है। क्या कहा, कौन सुधीर चौधरी?

मोदी जी के खासमखास न सही सुधीर चौधरी, मोदी जी के खासमखास, हीरेन जोशी जी के खासमखास और मोदी जी के परम वफादार तो जरूर हैं। और क्यों न हों? सुना है पंद्रह करोड़ रुपये सालाना के पैकेज पर उस दूर-दर्शन में लाए गए हैं, जो सरकारी से स्वायत्त होते-होते, संघ-चालित हो गया है; दूर-दर्शन से मोदी-दर्शन बन गया है। माना कि पैसा सरकारी यानी पब्लिक का है यानी सरकार चलाने वालों के लिए मुफ्त का है। पंद्रह करोड़ पाने वाले में कुछ तो बात होगी ही। अगले जैसा एक्सपीरिएंस और किसी समाचार एंकर का क्या होगा? तिहाड़ से लेकर पीएमओ में जुगाड़ तक, अगले के पास हर तरह का अनुभव है। ऐसे सुधीर चौधरी कह रहे हैं, तब तो गलत तो नहीं ही होगा।

माना कि सुधीर चौधरी ने नाम लेकर नेहरू जी को उत्तरी भारत में छायी धुंध के लिए जिम्मेदार नहीं बताया है। लेकिन, नाम लेने से ही क्या होता है, इशारा एकदम स्पष्ट है। प्रदूषण की धुंध की जो चादर पूरे उत्तरी भारत पर पड़ी हुई है और हट ही नहीं रही है, उसके लिए क्या मोदी जी जिम्मेदार हैं? हर्गिज, हर्गिज नहीं। एक सौ चालीस करोड़ भारतवासियों ने मोदी जी को ऐसी चीजों की जिम्मेदारी लेने के लिए चुना है या राज करने के लिए? वैसे भी मोदी जी वायु प्रदूषण जैसी छोटी-छोटी चीजों की जिम्मेदारी लेने लग जाएंगे तो, भारत को विश्व गुरु कौन बनाएगा? चौधरी साहब की बात में और गहरा पेच है। नेहरू का नाम नहीं लेते हैं, फिर भी सब को बता देते हैं। भारत में प्रदूषण है क्योंकि डेमोक्रेसी है! मोदी जी को तानाशाह की गद्दी देकर देखो, फिर देखो कैसे चुटकियों में धुंंध की चादर गायब होती है। पर यहां तो डेमोक्रेसी है, इसीलिए तो मोदी जी के ग्यारह साल के राज के बाद भी धुंध ही धुंध है। और डेमोक्रेसी, सभी जानते हैं कि इसलिए है कि इस देश के नसीब में नेहरू जी थे। नेहरू जी इस देश पर डेमोक्रेसी लाद गए थे, उसी का बुरा नतीजा आज हमें प्रदूषण के रूप में भुगतना पड़ा रहा है।

चीन वालों ने अपनी राजधानी, बीजिंग को धुंध से छुट्ट दिला ली, पर कैसे? उनके यहां नेहरू जी जो नहीं थे। डेमोक्रेसी नहीं है, इसलिए धुंध भी नहीं है। बीच में आ भी गयी थी, पर अब मिट चुकी है। हमारे यहां भी जब तक डेमोक्रेसी नहीं मिटेगी, तब तक ये धुंध नहीं मिटेगी। पर सुधीर जी ने इशारे में तो हम भारत वालों को भी कुछ अच्छी खबर तो दी ही है। नेहरू जी की थोपी डेमोक्रेसी अब ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है। मोदी जी उसे मिटाने में लगे हुए हैं। बस जरा सा धीरज और। डेमोक्रेसी मिटी, प्रदूषण की धुंध हटी।

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