आज हम उस गुप्त गलियारे में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ इतिहास पन्नों पर नहीं, बल्कि पतीले के पेंदे में चिपक कर लिखा गया है। आज का विषय है—खिचड़ी। अगर आप समझते हैं कि खिचड़ी सिर्फ बीमार का आहार है, तो आप उसी मुगालते में हैं जिसमें एक नेता अपनी जीत के दावों में होता है। खिचड़ी भारतीय लोकतंत्र का खाद्य संस्करण है—सब कुछ मिला दो, पर अंत में क्या बना, यह चखने वाले की किस्मत पर निर्भर है। दुनिया भर की असंख्य भाषाओं में इस चावल-दाल के वैवाहिक विच्छेद को अलग-अलग नामों से पुकारा गया है, लेकिन इसकी फितरत वही है: ‘खिचड़ी के चार यार—दही, पापड़, घी और अचार।’ यह महज भोजन नहीं, एक कूटनीतिक समझौता है जहां अनाज और दलहन एक-दूसरे की टांग खींचते हुए भी एक ही बर्तन में साथ रहने को मजबूर हैं।
मिस्र के पिरामिडों के साये में जब आप टहलेंगे, तो वहां इसे कुशरी के नाम से पुकारा जाता है। अब इसे संयोग कहें या विडंबना, कि जो देश कभी मरे हुए बादशाहों को ममी बनाकर सहेजता था, वही आज चावल, दाल और पास्ता को एक साथ उबालकर एक प्लेट में दफन कर देता है। इसे कैमरे की नजर से देखें तो यह कोई साधारण डिश नहीं, बल्कि रोम और अरब का वह कॉन्ट्रैक्ट है जिसे इतिहासकार भूल गए।
लेबनान में इसे मुजदरा कहा गया, जो शायद दुनिया का पहला प्रजातांत्रिक गठबंधन था—प्याज ऊपर से डालो ताकि नीचे की बदइंतजामी छिप जाए। इराक में इसे जादाह, सीरिया में मखलूत और फिलिस्तीन में मुजदरा-ए-बिर्गुल कहते हैं। ‘खिचड़ी पकना’ हमारे यहाँ षड्यंत्र का प्रतीक है, और सच तो यह है कि जब दुनिया भर की शब्दावली खंगाली जाती है, तो समझ आता है कि खिचड़ी के हाथ पाँव नहीं होते, वह तो बस भूख और लाचारी के बीच का एक मध्यम मार्ग है। चाहे इसे स्पेनिश में अरोज को पोलो की आड़ में मांस के साथ परोसा जाए या वियतनामी चो के रूप में, मूल भाव वही है—सबका साथ, सबका सत्यानाश।
कहावत है – ‘अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग’, पर रसोइया कहता है—’अपनी-अपनी हांडी, अपनी-अपनी खिचड़ी’। दक्षिण कोरिया में इसे जुक कहते हैं, जापान में ओकायु, चीन में कोंजी और थाईलैंड में जोक। ये नाम सुनकर ऐसा लगता है जैसे कोई छोटा बच्चा जिÞद कर रहा हो, पर असल में ये बीमार अर्थव्यवस्थाओं और खाली पेटों के लिए वही सांत्वना पुरस्कार हैं जो एक क्लर्क को रिटायरमेंट पर मिलता है। म्यांमार में इसे ‘ह्सान मयू’, इंडोनेशिया में ‘बुबुर’ और फिलीपींस में ‘लुगाओ’ कहा जाता है। यह वह डिश है जिसने सभ्यताओं को जोड़ा, क्योंकि इसे बनाने के लिए दिमाग से ज्यादा धैर्य और जमीर से ज्यादा पानी की जरूरत होती है।
मुहावरा है ‘डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग पकाना’, जो आज के सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स पर सटीक बैठता है—सबको अपनी अलग पहचान चाहिए, भले ही स्वाद में सब एक जैसे ही फीके हों। अपनी खिचड़ी संभाल के रखिएगा, क्योंकि इतिहास कभी भी पलट सकता है—या पतीले में चिपक सकता है!

