- इलाज न मिलने से कई कर्मचारियों की जा चुकी है जान, काफी दिनों से ख़राब है रेडियोथेरेपी मशीन
- स्टॉफ की सेलरी पर हर माह होता है पांच लाख से ज्यादा का खर्च
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: करीब 110 करोड़ से ज्यादा का खर्च सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल बनाने में कर दिया गया है, लेकिन एलएलआरएम मेडिकल के जो पुराने विभाग हैं। जहां गरीब व मध्यम वर्ग के मरीजों को कम खर्च पर अच्छा इलाज मिल जाता था, उनकी सुध लेने को न तो सरकार तैयार है न ही मेडिकल प्रशासन इसको लेकर हाथ हिलाने को तैयार दिखाई देता है।
ऐसे एक-दो नहीं बल्कि कैंसर सरीखे आधा दर्जन डिपार्टमेंट हैं जो किसी न किसी कारण से बंद हैं। वहां मरीजों को नहीं देखा जा रहा है। जबकि इनके नाम पर हर माह एक भारी भरकम रकम खर्च की जा रही है। यंू कहने को आए दिन मेडिकल में मंत्री, सांसद, विधायक व स्वास्थ्य विभाग के तमाम आला अधिकारियों का दौरा होता रहता है, लेकिन मेडिकल के जो विभाग खुद बीमार हैं उनका इलाज किसी के पास नहीं है।
मेडिकल का कैंसर विभाग खुद बीमार है, जिसके चलते यहां अब कैंसर पीड़ित मरीजों ने आना बंद कर दिया है। सबसे दु:खद पहलू तो यह है कि कैंसर वार्ड मेडिकल के कैंसर पीड़ित अपने कर्मचारियों तक की जान नहीं बचा सका। करीब आधा दर्जन ऐसे कर्मचारी बताए जाते हैं जिनको मेडिकल में इलाज नहीं मिला और उनकी मौत हो गई। ऐसा नहीं कि यहां डाक्टरों या अन्य स्टाफ की कमी हो।
डाक्टरों व स्टॉफ की स्टेÑथ पूरी होने के बाद भी यहां मरीजों के लिए नो एंट्री का बोर्ड लटका दिया गया है। मेडिकल के कैंसर विभाग में पिछले करीब पांच साल से किसी कैंसर पीड़ित का इलाज नहीं किया जा रहा है।
डिपार्टमेंट के स्टाफ ने नाम न छापे जाने की शर्त पर बताया कि करीब पांच साल से ज्यादा का अरसा होने को आया जब यहां किसी मरीज को भर्ती किया गया हो या उसका इलाज किया गया हो। अब तो हालत यह हो गई है कि कैंसर के मरीजों ने यहां आना ही बंद कर दिया है। यदि कोई इक्का-दुक्का आ भी जाता है तो उसको प्राइवेट के लिए रेफर कर दिया जाता है।
कर्मचारियों की मौत के बाद भी हालात जस के तस
कैंसर पीड़ित करीब आधा दर्जन कर्मचारियों की मौत इलाज न मिलने के कारण हो चुकी है। अपने कर्मचारियों की मौत के बाद भी मेडिकल प्रशासन कैंसर डिपार्टमेंट की बीमारी व कमियों को दूर करने के लिए गंभीर नजर नहीं आता। मेडिकल के जिन कर्मचारियों की मौत कैंसर के कारण इलाज न मिलने की वजह से हुई है उनमें डालचंद, दीपक रस्तोगी व गोपाल भी शामिल हैं। स्टॉफ ने बताया कि रेडियोथेरेपी मशीन के खराब होने की वजह से इनकी मौत हुई।
दो लाख का खर्च पहुंचा करोड़ों में
कैंसर डिपाटमेंट की जिस रेडियो थेरेपी मशीन की बात की जा रही है स्टॉफ ने बताया कि करीब पांच साल पहले जब वह खराब हुई थी तो मुश्किल से डेढ़ से दो लाख का कुल खर्च कर उसको बेहतरी हालत में चालू किया जा सकता था, लेकिन मेडिकल प्रशासन द्वारा सुध न लिए जाने की वजह से वह मशीन अब पूरी तरह से कंडम हो गई है। उसको यदि सही कराने की बात की जाए तो करीब डेढ़ से दो करोड़ का खर्च होगा। इसने खर्च में कुछ और रकम डालकर अत्याधुनिक नई मशीन आ जाएगी। रेडियोथेरेपी मशीन में सोर्स नाम का उपकरण डाला जाना था। यदि खराब होते ही यह उपकरण डाल दिया जाता तो यहां कैंसर मरीजों को इलाज मिल रहा होता।
स्टॉफ पर लाखों का खर्च
मेडिकल का कैंसर डिपार्टमेंट भले ही पांच साल से बीमार हो, लेकिन स्टॉफ के नाम पर हर माह लाखों का खर्च किया जा रहा है। डा. सुभाष व डा. अरविंद तिवारी के अलावा तीन कोबाल्ट टैक्निशियन, एक लिपिक, एक स्वीपर, वार्ड ब्वॉय व हेल्थ केयर वर्कर भी शामिल हैं।
इन सभी की सेलरी नियमित रूप रिलीज की जाती है। सेलरी की रकम भी लाखों में बैठती है। स्टॉफ की सेलरी के नाम पर लाखों का खर्च करने के बाद भी मेडिकल में पांच साल से ज्यादा का अरसा होने को आया, लेकिन किसी भी मरीज का इलाज यहां नहीं किया जा रहा है।
प्रमुख सचिव स्वास्थ्य को कराया अवगत
प्रदेश के प्रमुख सचिव स्वास्थ्य को मेडिकल के कैंसर डिपोर्टमेंट की बीमारी की जानकारी भी पूर्व में दर्जन भर कर्मचारी नेताओं द्वारा लखनऊ जाकर दी जा चुकी है। उनकी ओर से इसको लेकर भरोसा भी दिलाया गया था, लेकिन बात भरोसे से आगू नहीं बढ़ सकी।

