Monday, June 15, 2026
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महाबली देश छोटे से देश से हार गया

NAZARIYA 3


NIRMAL KUMARबोतल का जिन्न बोतल से बाहर आकर अपने आका को ही खा गया! यह आमजन में प्रचलित एक लोकप्रिय मुहावरा है, परंतु आज अफगानिस्तान की सत्ता पर पुनर्वापसी कर आतंकवादी तालिबान ने उक्त बात को ही गंभीरता से परिपुष्ट किया है। याद करिए यही अमेरिका शीतयुद्ध के जमाने में तत्कालीन सोवियत संघ की सेनाओं से गुरिल्ला युद्ध करके और उसे परेशान करने के लिए जिन मुजाहिदीनों को तालिबान के रूप में खड़ा करने के लिए, उन्हें हथियारों, पैसों और प्रशिक्षण के जरिए खड़ा किया था, वे ही तालिबान अब उसी अमेरिका के साधन-संपन्न और आधुनिकतम कथित बड़ी सेना को नाकों चने चबाने को मजबूर करके अफगानिस्तान से हारकर, अपनी फजीहत कराकर और बेइज्जती व जगहंसाई कराकर भाग खड़े होने को मजबूर कर दिया! वियतनाम के बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी साम्राज्यवादियों के कर्णधारों के दंभ, आत्ममुग्धता और छद्म दर्प पर एक बार फिर अपमान की कालिख पुती है! कितनी विस्मय और हतप्रभ करने वाली बात है कि अस्सी के दशक में इसी अफगानी धरती से कथित महाबली सोवियत संघ की सेना बहुत ही बेआबरू होकर निकली थी और अब वही हश्र दुनिया के कथित सबसे सर्वश्रेष्ठ व आधुनिकतम अमेरिकी सेना का हुआ है!

अफगानिस्तान में अमेरिकी राष्ट्रपति का दावा एकदम खोखला, झूठा और भ्रामक साबित हुआ कि उसकी सेना के अनुभवी प्रशिक्षकों द्वारा तैयार लगभग तीन लाख अफगानी सेना के जवान अपने बेहतरीन प्रशिक्षण और आधुनिकतम हथियारों के बल पर 75 हजार के लगभग तालिबानी लड़ाकों पर भारी पड़ेंगे और उन्हें मार भगाएंगे, लेकिन जमीनी हकीकत इसके एकदम उलट साबित हुई है।

तालिबानी लड़ाकों के साधारण हथियारों के सामने कथित उच्च प्रशिक्षित और आधुनिक हथियारों के साथ अफगानी सेना के सैनिक मिट्टी के शेर साबित हुए हैं, क्योंकि वे तालिबानी लड़ाकों से बगैर किसी लड़ाई किए ही बहुत ही तेजी से कायरतापूर्ण ढंग से हथियार डालते चले गए। हालत यह रही है कि अफगानिस्तान के प्रांतीय राजधानियों के अलावा मजार-ए शरीफ, हेरात, कंधार और जलालाबाद जैसे प्रमुख शहरों तथा अब देश की राजधानी काबुल तक में अफगानी सेना पूर्णत: हथियार डाल चुकी है।

तालिबान लड़ाकों की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे मात्र दो दिनों में अफगानिस्तान के छ: प्रांतों पर बहुत ही आसानी और तेजी से कब्जा जमा लेने में कामयाब रहे हैं। करीब 25 वर्ष पूर्वतालिबानियों ने अपनी हिंसा और छापामार युद्ध के बल पर अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हुए थे, लेकिन अब की बार वे कुशल रणनीति के तहत सफल कूटनीति का सहारा लेते हुए अफगानी प्रशासन और उसकी सेना में अपनी वैचारिक पैठ बढ़ाकर काबुल पर सफलतापूर्वक कब्जा जमाने में पूर्णत: सफल रहे हैं।

सबसे बड़ी बात यह हुई है कि अफगानी सेना में अपने राष्ट्रपति अब्दुल गनी के प्रति वफादारी का पूर्णतया अभाव था। एक रक्षा विशेषज्ञ का कथन है कि ‘युद्ध हथियारों से नहीं अपितु हिम्मत और दृढ़ जज्बे से जीता है।’ अफगानिस्तान में यह सिद्धांत अक्षरत: सत्य साबित हुआ है। अफगानिस्तान का चुना हुआ राष्ट्रपति अब्दुल गनी दूसरे देश में शरण लेने को बाध्य हो गया है। कथित महाबली अमेरिका को अफगानिस्तान के तीन करोड़ तीस लाख बाशिंदों को बेसहारा छोड़कर केवल अपने दूतावास के कर्मचारियों की जान-माल की सुरक्षा के लिए पांच हजार की एक अमेरिकी सैन्य टुकड़ी को काबुल बुलानी पड़ी है।

पश्तो भाषा में तालिबान का अर्थ छात्र होता है, लेकिन व्यवहार में ये तालिबानी छात्र सामान्य छात्रों की तरह नहीं हैं, अपितु ये कट्टरपंथ में प्रशिक्षित दुर्दांत आतंकवादी हैं, जो अफगानिस्तान में कट्टरपंथी इस्लाम शरीया सरकार को स्थापित करना चाहते हैं, जो साहित्यकारों, कलाकारों की सरेआम हत्या कर देना चाहते हैं, लड़कियों और स्त्रियों को एक भोग-विलास की वस्तु समझकर उन्हें शिक्षा और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की पहुंच से एकदम अलग-थलग कर देना चाहते हैं।

इस दुनिया में नैतिकता, दया, करूणा, ऊंच-नीच के भेदभाव को पूर्णत: समाप्त कर समानता और भाई-चारा स्थापित करने वाले मानवता के अग्रदूत भगवान बुद्ध के बामियान स्थित 140-150 फुट दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति को तोप के गोलों से मटियामेट कर देनेवाले नरपिशाचों का एक समूह मात्र है।

भारत के संबंध में सबसे दु:खद बात यह हुई है कि दुनियाभर के देश यथा ईरान, रूस, चीन, यूरोपियन संघ और अमेरिका तक अफगानिस्तान की बदली हुई परिस्थिति का कयास लगाकर तालिबान नेताओं से खुलकर बात-चीत कर रहे थे, चीन तो कुछ तालिबान नेताओं को अपने यहां आमंत्रित करके उनसे ये आश्वासन लेने में कामयाब रहा है कि तालिबान चीन के उइगर मुसलमान उग्रवादियों को अफगानिस्तान में घुसकर अपने पैर पसारने नहीं देगा, लेकिन भारत के रणनीतिकार इस मामले में चूक गए हैं। अब भारत द्वारा अफगानिस्तान में अरबों रुपये के प्रोजेक्ट्स बंद करने और उसमें कार्यरत मजदूरों, टेक्नीशियनों और इंजीनियरों को वापस बुलाने के अलावा भारत के पास कोई विकल्प ही नहीं बचा है।

यह बहुत ही दुख और अफसोस की बात है कि इक्कीसवीं सदी में सामंती, लोकतांत्रिक और साम्यवादी शासन व्यवस्थाओं के बाद इस आधुनिक दुनिया में फिर से एक पुरातनकालीन, दकियानूसी, क्रूर, बर्बर, कबीलाई, आतंकवादी, धार्मिक उग्रवादियों द्वारा संचालित एक संगठन द्वारा एक देश की सत्ता पर अधिकार हो गया है।


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