Sunday, October 24, 2021
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Homeसंवादये तालिबान की हार है

ये तालिबान की हार है

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कई तरह की खबरें अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से लेकर कतर की राजधानी दोहा तक से आ रही हैं। तालिबान के कब्जे और अशरफ गनी सरकार के पतन के बाद अब अफगानिस्तान की आगे की किस्मत तय करने के लिए दोहा में बैठक हो रही है, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई, डा. अब्दुल्ला, गुलबदीन हेकमतियार और तालिबानी नेता मुल्ला बरादर के भाग लेने की जानकारी मिल रही है। ये लोग तालिबान की छत्र छाया में बनने और चलने वाली सरकार का स्वरूप तय करने के लिए माथा पच्ची कर रहे हैं। यह अगले कुछ दिनों में हो भी जाएगा। बीस साल बाद तालिबान के हाथों में इस बदनसीब देश की बागडोर आ भी जाएगी परंतु जो लोग इसे मुक्ति संग्राम और तालिबान की जीत बताकर महिमामंडित कर रहे हैं, उन्हें बहुत जल्दी अपनी गलती का अहसास होने वाला है। बस, दो तस्वीरें ही पूरे घटनाक्रम की हकीकत बताने को काफी हैं। दोनों काबुल एयरपोर्ट की हैं। अमेरिकी विमान उड़ान भरने के लिए रनवे पर दौड़ रहा है। उसके साथ-साथ हजारों की भीड़ दौड़ रही है। कुछ उस पर चढ़ने की कोशिश भी कर रहे हैं। टेकआफ बाद में तीन लोगों के गिरने और उनकी मौत की खबर आती है। एक दूसरे जहाज के फर्श पर तिल रखने तक की जगह है। स्त्री-पुरुष-बच्चे ठसाठस भरे हुए हैं। यह उड़ान कतर जाने वाली थी। ये दो चित्र बताते हैं कि तालिबान की जीत नहीं हार हुई है। लोग उनके खौफ से अफगानिस्तान छोड़कर भाग जाना जाते हैं। ऐसा क्यों है, सोचिए।

तालिबान ने जिस हिंसक रास्ते पर चलते हुए एक चुनी हुई सरकार को अपदस्त कर अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा किया है, उसे चीन, ईरान और पाकिस्तान भले ही मान्यता दे दें दुनिया के बाकी देश ऐसा करेंगे, इसकी संभावना न के बराबर है। इसलिए दोहा में बैठक करके वो ऐसी सरकार के गठन की संभावना तलाशने की कोशिश की जा रही है, जिसे अमेरिका, रूस और दूसरे देश भी स्वीकृति देने के लिए तैयार हो जाएँ। उसका नेतृत्व कौन करे, यह सबसे बड़ी चुनौती है।

अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र संघ कह चुके हैं कि तालिबान ने जो वादे किए थे, वह उसके विपरीत आचरण कर रहा है। वह अपने विरोधियों को निशाना बनाना शुरू कर चुका है। तीन लोगों की यह कहकर उसने हत्या कर दी कि वो चोरी करके भाग रहे थे। यह सूचनाएँ भी आ रही हैं कि तालिबान ने पंद्रह वर्ष से अधिक और पैंतालीस वर्ष की आयु से कम युवतियों व विधवा महिलाओं की सूची बनाने के आदेश दिए हैं ताकि तालिबानी लड़ाकों से उनके निकाह करवा सकें। निकाह शब्द फिर भी सही है परंतु अतीत की खौफनाक घटनाएँ बताती हैं कि जबरन उठाई गई ऐसी युवतियों और औरतों की ज़िन्दगी नरक से भी बदतर कर दी जाती हैं। और यही वजह है कि लोग खौफ में मुल्क छोड़कर भाग रहे हैं। वो वहाँ रहकर किसी भी तरह के खतरे नहीं उठाना चाहते। जिस दिन तालिबान ने काबुल के दरवाजे पर दस्तक दी थी, उस दिन राजधानी की सड़कों पर वाहनों का भारी जाम पूरे हालात को बयान कर रहा था। जो लोग अपने घरों से निकल पड़े थे, वो कहीं दूर भाग जाना चाहते थे। तालिबान ने दोहा में अमेरिका के साथ जो समझौता किया था, उसमें क्या वादे किए थे। अगर तालिबानी प्रवक्ताओं के बयानों पर गौर फरमाएँ तो आप भी भ्रम के शिकार हो सकते हैं।

वह ऐसा जाहिर कर रहे हैं जैसे, नब्बे के दशक के तालिबान और इस तालिबान की सोच में बड़ा बदलाव आ गया है। जैसे, वो अब औरतों का सम्मान करना सीख गए हैं परंतु उनका आचरण कुछ और ही संकेत दे रहा है वरना वो औरतों की सूची बनाने को नहीं कहते। पिछले बीस वर्ष की अवधि में नौजवान अफगान पीढ़ी ने न केवल बाहरी दुनिया देखी है, बल्कि वो नई आजाद ख़्याल सोच के साथ पूरे विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के हामी हैं। वो खुली हवा में साँस लेना सीख गए हैं। वो दकियानूसी, रूढ़िवादी सोच और तौर तरीकों के मकड़जाल में नहीं बंधना चाहते जबकि अपना नाम तालिबानी रखने वाले ये लोग अफगानिस्तान के नागरिकों को अठारहवीं सदी में धकेलने पर आमादा हैं।

आज सबसे झगड़ा ही है ये बन गया है कि कबीलों की संस्कृति, सभ्यता, परंपराओं के नाम पर आधुनिक सोच का विरोध किया जा रहा है। न केवल अफगानिस्तान में बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, कई अरब और अफ्रीकन  देशों में बल्कि भारत के भी कई हिस्सों में। समय के साथ बदलाव प्रकृति का हिस्सा हैं परंतु एक बड़ा वर्ग है, जो सदैव इसमें अड़ंगा लगाता रहा है। ये ही वो वर्ग है, जो अमेरिका और पश्चिमी देशों पर अपनी संस्कृति थोपने का आरोप लगाता रहा है और हर सुधार के विरोध में कम पढ़े लिखे लोगों को एकजुट करके ऐसे हालात पैदा करता रहा है।

दुनिया बहुत आगे बढ़ गई है। हर क्षेत्र में विकास और प्रगति के द्वार खुले हैं परंतु भारत सहित बहुत से देशों में तालिबानी सोच के लोगों की कोई कमी नहीं है। ये हर जगह मिल जाते हैं, जो अपनी विचारधारा थोपना चाहते हैं। जो उनकी नहीं मानते, उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाने लगता है। तालिबान शरिया लागू करके आधुनिक सोच की पीढ़ी को भी उस पर अमल करने को मजबूर करते हैं। जो उन बंदिशों को नहीं मानना चाहते, उन पर कई तरह से जुल्मो-सितम किए जाते हैं।

उन जुल्मों से बचने के लिए ही लोग अफगानिस्तान छोड़कर कहीं दूर भाग जाना चाहते हैं। और इनमें अधिकांश मुसलिम ही हैं, अन्य धर्मों के लोग तो न के बराबर हैं। सबसे अहम बात यही है कि जो तालिबान के द्वारा थोपे जाने वाली बंदिशों को मानने को तैयार नहीं हैं और उससे बचने के लिए अपनी मातृभूमि, जन्मभूमि, अपनी जमीन जायदाद, घर आदि को भी छोड़ने के लिए तैयार हैं, वो क्या संदेश दे रहे हैं। जो लोग शरिया व्यवस्था की वकालत करते हैं, ये लोग उन्हें भी बता रहे हैं कि वो अब रुढ़िवादी परंपराओं से बाहर निकलना चाहते हैं। उनमें बंधकर जीना उन्हें कतई स्वीकार नहीं है।

तालिबान को इसका अच्छे तरीके से पता है कि वो चुनाव में भाग लेकर कभी नहीं जीत पाएंगे। कभी सत्ता में नहीं आ पाएंगे, क्योंकि अफगानिस्तान की अधिकांश जनता अब सुधारों में, खुली हवा में, विकास में विश्वास करने लगी है। वो दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहती है। इस हकीकत को जानने वाले तालिबान जबरन, हथियारों के बल पर, दहशत फैलाकर सत्ता पर काबिज होने के रास्ते तलाशता रहता है। यही उसने इस बार भी किया है। अफगानिस्तान छोड़कर भागते लोग बता रहे हैं कि तालिबान की जीत नहीं हुई है वह बुरी तरह हारा है। लोग यदि आपसे खौफजदा हैं तो आप जीते नहीं, हारे हैं।


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