
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान, कितना बदल गया इंसान-सरीखी अमर पंक्तियों के रचनाकार कवि प्रदीप ऐसे राष्ट्रभक्त कवि थे जिन्होंने आजादी के पूर्व और बाद में भी देशभक्तिपूर्ण गीतों की रचना कर राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। रचनाकार, संगीतकार और गीतकार की त्रिवेणी से समाहित उनका व्यक्तित्व जीते जी एक मिथक बन गया। ऐसी प्रतिभाशाली और बहुमुखी प्रतिभा की कमी बॉलीवुड में बहुत दिनों तक महसूस होती रहेगी।
आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है-दूर हटो ए दुनियावालो, हिन्दुस्तान हमारा है जैसे गीतों ने ब्रिटिश साम्राज्य की बुनियाद हिलाकर रख दी और सामान्य जनता में स्वतंत्रता के प्रति जो चेतना जगायी, वह बापू के अंग्रेजों भारत छोड़ो का ही प्रतिरूप था और कवि प्रदीप दूसरे बापू कहलाये। आज से सत्तर साल पहले ही उन्होंने चित्रपट माध्यम की क्षमता का मूल्यांकन कर उसका प्रयोग स्वतंत्रता आन्दोलन और ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ने वालों के समर्थन में किया और स्वतंत्रता की चेतना जगायी।
कवि प्रदीप का असली नाम रामचन्द्र द्विवेदी था। इनका जन्म 6 फरवरी 1915 की बाडगर, मध्यप्रदेश में हुआ था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। कवितायें पढ़ने और लिखने में उनकी अभिरूचि बचपन से ही थी। कवि स?मेलनों में वे बढ़ चढकर हिस्सा लिया करते थे। इलाहाबाद और बंबई के कवि सम्मेलनों में उनकी काव्य प्रतिभा ने ऐसी धूम मचायी कि वे फिल्म जगत में आ गये।
उनकी काव्य प्रतिभा से प्रभावित होकर बाम्बे टाकीज के हिमांशु राय ने अपनी फिल्म कंगन के लिये 1939 में अनुबन्धित किया। इस फिल्म के लिये उन्होंने चार गीत लिखे और तीन गीत स्वयं गाये। फिल्म में उनके गीतों को काफी सराहा गया और इसके बाद उन्होंने पीछे मुडकर कभी नहीं देखा। उसके बाद बंधन, पुनर्मिलन, झूला, नया संसार, अंजान, किस्मत, जागृति आदि फिल्मों के गीतों ने उनको सफलता की बुलंदियों पर पहुंचाया और एक नया इतिहास रच डाला।
बंधन का गीत चल चल ऐ नौजवान इतना लोकप्रिय हुआ कि प्रभात फेरियों में भी गाया जाने लगा। उस समय स्वतंत्रता आन्दोलन जोरों पर था और इस गीत ने उस चेतना को चरम पर पहुंचाने में जो योगदान दिया, वह अद्वितीय है। किस्मत फिल्म के गीत दूर हटो ए दुनियांवालो से अंग्रेज इतने बौखला गये कि गिर?तारी से बचने हेतु उन्हे भूमिगत होना पड़ा। यह इस गीत का ही कमाल था कि किस्मत ने एक ही टाकीज में लगातार साढ़े तीन साल चलने का अभूतपूर्व रिकार्ड बनाया।
स्वतंत्रता के बाद सामाजिक मूल्यों का हृास देखकर कवि प्रदीप की संवेदना काफी आहत हुई। कितना बदल गया इंसान इसी का परिणाम है जो भारत पाकिस्तान विभाजन पर बनी फिल्म नास्तिक में उनके द्वारा गाया गया। महात्मा गांधी के जीवन पर आधारित फिल्म जागृति एक ऐसी फिल्म है जो इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी अपने देशभक्तिपूर्ण गीतों के लिये जानी जाती है। आओ बच्चो तु?हें दिखायें, झांकी हिन्दुस्तान की और साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल आज भी सबकी जुबान पर हैं।
ऐ मेरे वतन के लोगो, जरा आंख में भर लो पानी, जिसे सुनकर पंडित नेहरू भी रो पड़े थे, देशभक्ति से पूर्ण ऐसा गीत है जो गैर फिल्मी गीत होते हुए भी काफी लोकप्रिय हुआ, आज भी लोकप्रिय है और सदियों तक रहेगा। कवि प्रदीप के ही शब्दों में यह मेरा सबसे प्यारा गीत है।
उन्होंने अपने गीत लेखन की प्रतिभा द्वारा पारंपरिक हिन्दी लेखन शैली को पुनर्जीवित किया। छ: दशकों के अपने ल?बे कैरियर में उन्होंने फिल्म जगत की सभी बड़ी हस्तियों के साथ काम किया। 1996 में अपना अंतिम गीत दूरदर्शन के लिये लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में लिखकर फिल्म जगत को अलविदा कहा।
जीवन के आखिरी लम्हों में भारत सरकार ने उनको फिल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फालके सम्मान से प्रतिष्ठित किया। सारे जगत में जागृति का संचार करके 11 दिसंबर 1998 को वे चिरनिद्रा में सो गये पर उनके गीत सदियों तक भारतवासियों के दिलों में जिन्दा रहकर उनका एहसास कराते रहेंगे और स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व की प्रेरणा देते रहेंगे।
आमोद कुमार ओझा


