
जीवन के अधेड़ उम्र में फेसबुक पर दिशा की मुलाकात संदीप नाम के एक अन्य अधेड़ से हो जाती है। संदीप दिशा की कविताओं को पसंद करता है और दिशा को बौद्धिक संबल प्रदान करता है। संदीप का अपना भी परिवार है। दिशा के परिवार में भी इस रिश्ते को गलत नजरों से देखा जाता है। लेकिन स्त्री जब एक बार निर्णय ले लेती है, तो उससे पीछे नहीं हटती। समाज दिशा पर लांछन लगाता है। कहता है जब पति घर में बैठा हो तो गैर मर्द से इश्क बढ़ाने का क्या अर्थ है। यही आरोप दिशा के परिवारवाले भी लगाते हैं। पिछले दिनों की एक घटना याद आ रही है। विवाहित जीवन के 28 साल पूरे करने के बाद एक दिन पत्नी ने यह फैसला किया कि उसे पति के साथ नहीं रहना है। पत्नी ने कहा कि इतने सालों से उसे लगता रहा मानो वह ‘जेल’ में रह रही है। और वह ‘जेल’ से बाहर आ गई। मन में सवाल उठा कि इतने सालों बाद स्त्री को इस बात का एहसास हुआ कि अब तक वह ‘जेल’ में रह रही है, पति को छोड़ने या उससे अलग होने का फैसला इतनी देर से क्यों किया गया? सवाल और भी बहुत से उठे।
मसलन क्या पत्नी 28 साल बच्चों के बड़ा होने का इंतजार करती रही? पहले कभी उसने इस तरह की बात पति या परिवार के अन्य सदस्यों से क्यों नहीं कही? सवाल और भी बहुत से हो सकते हैं। लेकिन सारे सवालों का जवाब यही है कि स्त्री जब चाहे फैसला कर सकती है,-बेड़ियों को तोड़ने का। अगर उसे लगा कि वह जेल में रही तो यह अकारण नहीं होगा। किसी ने उसकी मानसिकता को जानने की कोशिश नहीं की होगी।
वह भावनात्मक रूप से, आर्थिक रूप से या संवादहीनता से निरंतर पीड़ित रही होगी। उसने धैर्य से बच्चों को बड़ा किया और जब बच्चे कमाने लगे तो उसने पति से अलग रहने का फैसला किया। यह स्थिति समाज में बहुत देखने को मिल रही है। यह अकारण नहीं है कि नार्वे के नाटककार हेनरिक इब्सन का एक नाटक है ‘डॉल्स हाउस’। इब्सन 19वीं शताब्दी के नाटककार थे। 1906 में उनकी मृत्यु हो गई थी।
‘डॉल्स हाउस’ में पति अपनी पत्नी को हमेशा डॉल कहकर पुकारता है। नायिका नोरा को भी यह लगने लगता है कि उसका पति उसे एक गुड़िया की तरह ही मानता है। अंत में नोरा अपने पति को छोड़ने का फैसला करती है। वह घोषणा करती है, उसके आत्म और उसके आसपास की हर चीज का उसे बोध होना चाहिए। यह कहकर वह दरवाजा खोलती है और बाहर निकल जाती है।
भारतीय संदर्भों और परिवेश में इसी कथा का विस्तार लगता है कथाकार उर्मिला शिरीष का हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ‘चांद गवाह’ (सामयिक पेपरबैक्स)। उर्मिला शिरीष की कहानियां पत्रिकाओं में छपती रही हैं। उनके अनेक संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें निर्मल पुरस्कार और विजय वर्मा कथा सम्मान जैसे अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं। उपन्यास उनका पहला है। इस उपन्यास में घटनाएं घटती दिखाई नहीं देंगी।
न ही उपन्यास घटनाओं के सहारे आगे बढ़ता है। उपन्यास संवादों, दृश्यों, कथा (उपन्यास) की परिस्थितियों और भाषा के सहारे आगे बढ़ता। उर्मिला शिरीष के उपन्यास की नायिका दिशा एक विवाहित स्त्री ही नहीं है, बल्कि वह दो युवा होती बेटियों की मां भी है। पति है जो उसके साथ मारपीट करता है, शराब पीता है और पत्नी की भावनाओं या इच्छाओं से उसे कुछ लेना देना नहीं है। दिशा क्रिएटिव महिला है।
वह कविताएं लिखती है। प्रकृति से उसे प्रेम है। लेकिन वैवाहिक जीवन ने उसे कभी कुछ करने का मौका नहीं दिया। जीवन के अधेड़ उम्र में फेसबुक पर दिशा की मुलाकात संदीप नाम के एक अन्य अधेड़ से हो जाती है। संदीप दिशा की कविताओं को पसंद करता है और दिशा को बौद्धिक संबल प्रदान करता है। संदीप का अपना भी परिवार है। दिशा के परिवार में भी इस रिश्ते को गलत नजरों से देखा जाता है।
लेकिन स्त्री जब एक बार निर्णय ले लेती है, तो उससे पीछे नहीं हटती। समाज दिशा पर लांछन लगाता है। कहता है जब पति घर में बैठा हो तो गैर मर्द से इश्क बढ़ाने का क्या अर्थ है। यही आरोप दिशा के परिवारवाले भी लगाते हैं। दिशा की दोनों बेटियां भी इस रिश्ते को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। लेकिन यह नया रिश्ता दिशा के लिए प्रेम से भी ज्यादा मानसिक संबल काम करता है।
उसे लगता है कि संदीप उसकी मानसिकता को समझता है। उसकी रचनात्मकता को समझता है। लिहाजा दिशा संदीप के साथ आगे बढ़ती चली जाती है। जीवन में संदीप के आने से दिशा दिशा अपने रख-रखाव पर भी ध्यान देने लगती है। उर्मिला शिरीष ने इस उपन्यास में विवाह नामक संस्था पर भी सवालिया निशान लगाया है। बेटियों के विवाह को लेकर वह विचार करती हैं, शादी क्यों जरूरी है? क्या मिलता है शादी से? एक आदमी को पति के नाम पर जिÞन्दगी भर ढोना, चाहे वह पसन्द हो या नहीं, चाहे वह अच्छा लगता हो या नहीं, कितनी बड़ी सजा है।
दिशा की इस मन:स्थिति को केवल संदीप समझता है। वह दिशा से कहता है, तुम्हारे भीतर की औरत, एक खूबसूरत अद्वीतीय प्रतिभा की औरत मर चुकी है या तुमने उसे तिल-तिल कर मरने दिया है। संदीप अपने स्पर्श और बौद्धिकता से इस मरी हुई औरत को पुन: जीवित कर देता है। संदीप प्रेम को देह से ऊपर बताता है। वह दिशा के जीवन को एक मकसद देता है-पेड़ बचाओ आंदोलन में सक्रिय भागदीरी का।
दिशा की पर्यावरण को लेकर चिंताएं भी उजागर होती हैं। वह एक जगह कहती है, आज बदले हुए मौसम और पर्यावरण को हम नहीं समझ पाए तो पृथ्वी को बचाना मुश्किल हो जाएगा। पेड़ों की बेहिसाब कटाई ने मनुष्य जाति को कितने बड़े संकट में डाल दिया है। तो एक तरफ उपन्यास वैवाहिक जीवन की ऊब को चित्रित करता है तो दूसरी तरफ पर्यावरण से जुड़े जरूरी सवालों को उठाता है।
साथ ही यह भी कहता है स्त्री डॉल या गुड़िया बनने के लिए तैयार नहीं है। वह अपने लिए अपने अनुकूल परिस्थितियां खुद निर्मित कर सकती है और कर रही है। ऐसा लगता है उपन्यास में उर्मिला शिरीष ने केवल स्त्री पक्ष को ही उबारा है। कहीं यह पता नहीं चलता कि नायिका दिशा का पति से कब और किन मुद्दों पर विरोध शुरू हुआ?
मान लीजिए दिशा को संदीप नहीं मिलता तब भी क्या वह विरोध कर पाती, कविताएं लिख पाती या अपने जीवन का लक्ष्य पर्यावरण बचाना चुन पाती? इस सब सवालों के बावजूद यह वैचारिक और पठनीय उपन्यास है, जो स्त्री को समझने में मदद करेगा। यह बताता है कि स्त्री अपनी मुक्ति का निर्णय कभी भी किसी भी मोड़पर ले सकती है।
सुधांशु गुप्त


