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प्रशासनिक सुस्ती के चलते हो रहे हादसे

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प्रशासनिक सुस्ती के चलते हो रहे हादसे

Nazariya 22


rajendra kumar sharmaआज प्रशासनिक तंत्र की मानसिकता सांप निकलने के बाद लकीर पीटने जैसी हो चली है। जब तक कुछ बड़ा घटित न हो, तब तक सरकारी तंत्र की आंख नहीं खुलती। पिछले कुछ समय में देश की भावी पीढ़ी कहे जाने वाले बच्चों के साथ जिस तरह की दुर्घटनाएं प्रशासन की सुस्ती के कारण देखने को मिलीं, उसको देखकर समझा जा सकता है कि हमारे सरकारी महकमे कितने सचेत और क्रियाशील हैं। इन दुर्घटनाओं के संदर्भ में प्रशासनिक तंत्र कहीं न कहीं कर्तव्य निर्वहन में असफल होता दिखा। किसी भी बड़ी दुर्घटनाओं के पश्चात होने वाली कार्यवाही में भी पारदर्शिता और निष्ठा का अभाव देखने को मिलता है, जिसके कारण दुर्घटना के मूल जिम्मेदार लोगों पर कार्यवाही नहीं हो पाती है और अगर होती भी है तो वो भी सस्पेंड होना और कुछ समय बाद पुन: नौकरी पर आ जाने तक सीमित रहता है। पिछले 5 वर्षों के अंदर बच्चों से संबंधित चार ऐसी बड़ी दुर्घटनाएं हमारे सामने आर्इं, जिन्हे देखकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति आहत और दुखी हुए बिना नहीं रह सकता। मई 2019 का सूरत अग्निकांड जिसमें एक कोचिंग सेंटर में आग लगने से 22 लोगों की मौत हो गई। समाचार बताते हैं कि बच्चों को चार मंजिला इमारत से अपनी जान बचाने के लिए नीचे कूदते देखा गया। कुछ बच्चे दम घुटने की वजह से मौत के ग्रास बन गए। इमारत की तीसरी और चौथी मंजिल पर शेड में कोचिंग क्लासेज चलाई जा रही थीं, जिन में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम का अभाव था। इमारत की सबसे ऊपर की मंजिल पर एसी के कंप्रेशर और टायर रखे गए थे। जिन्होंने आग में घी का काम किया और एक शॉर्ट सर्किट ने बड़ी त्रासदी का रूप ले लिया।

जनवरी 2024 में गुजरात के वड़ोदरा में नाव पलटने से बड़ा हादसा हो गया था। हरनी मोटनाथ झील में बच्चों को ले जा रही एक नाव पलट गई। झील में डूबने से 15 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में 12 बच्चे और दो टीचर भी शामिल थे। नाव में कुल 30 से ज्यादा लोग सवार थे। नाव में सवार सिर्फ 14-15 लोगों ने ही लाइफ जैकेट पहना हुआ था। नाव की कैपेसिटी 14 लोगों की थी, लेकिन नाव में 30 से ज्यादा लोग सवार थे। राज्य सरकार ने आरोपियों पर तुरंत कार्यवाही की तथा शिक्षा विभाग के माध्यम से कड़े निर्देश निकाले गए कि कोई भी शैक्षणिक संस्थान बिना जिला शिक्षा अधिकारी की आज्ञा के बच्चों को भ्रमण या प्रवास पर नही ले सकेगा। विशेषकर पानी वाले स्थानों के भ्रमण के नियम कड़े किए गए।
अप्रैल 2024 में हरियाणा के नारनौल में स्कूल बस पलटी, दुर्घटना में छह बच्चों की मौत और 37 बच्चे घायल हो गए। हाल ही में नारनौल में कनीना के गांव उन्हानी के पास एक दर्दनाक स्कूल बस हादसा हुआ । यहां ओवरटेक करने के कारण स्कूल बस पलट गई।दुर्घटना इतनी भयंकर थी कि बस पलटते ही स्कूली बच्चे, बस के शीशों में से बाहर निकल कर गिर गए। एक समाचार के अनुसार ईद की छुट्टी होने के बावजूद भी स्कूल लगाया गया। प्रशासन तुरंत सक्रिय हुआ तथा ट्रैफिक विभाग के मार्फत स्कूलों में चलने वाली बसों की व्यवस्था और उनमें पाई जाने वाली कमियों को लेकर तबातोड़ कार्यवाही की गई। शिक्षा विभाग ने भी स्कूलों की जन्मकुंडली खंगालनी शुरू की। एक समाचार के अनुसार लगभग 282 गैर मान्यता प्राप्त विद्यालयों पर विभाग ने अपनी कार्यवाही आरंभ कर दी। स्कूलों को सार्वजनिक अवकाशों पर स्कूल खोलने पर कड़ी कार्यवाही करने की चेतावनी दी गई। देश का कोचिंग हब कहे जाने वाले कोटा में कंपटीशन के तनाव में आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला समाप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या के बारे में क्या कहा जाए यह किसी से छुपा नहीं है। हाल ही में केंद्र सरकार ने कोचिंग सेंटर्स के लिए दिशा निर्देश जारी किए जिसके तहत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कोचिंग सेंटर में लेने पर पाबंदी लगा दी गई। परंतु यहां समस्या कुछ और है। बच्चों की योग्यता और क्षमता का आंकलन किए बिना उन्हे कोचिंग सेंटर्स में प्रवेश दिया जाना ही गलत है। इसमें दोषी अभिभावक हैं या फिर कोचिंग सेंटर संचालक।

उपरोक्त सभी दुर्घटनाओं में एक चीज समान है कि हमारे प्रशासन की नींद तभी खुलती है, जब कोई बड़ी दुर्घटना घटित होती है और कुछ दिन की कार्यवाही के बाद प्रशासनिक तंत्र फिर सुस्त हो जाता है और गहरी निद्रा की आगोश में चला जाता है, एक नई दुर्घटना होने के इंतजार में। इन घटनाओं के तुरंत बाद होने वाली कार्यवाही इंगित करती है कि प्रशासन की नजर से कुछ भी छुपा हुआ नहीं होता, सिर्फ कार्य करने की इच्छा शक्ति की कमी होती है। सोचिए यदि अग्नि शमन और शिक्षा विभाग सचेत होते तो क्या एक अग्नि की दृष्टि से असुरक्षित इमारत में कोचिंग सेंटर चल रहा होता? क्या आपदा प्रबंधन विभाग और शिक्षा विभाग ने समय रहते निरीक्षण और कड़े निर्देश पालन की शर्त लगाई होती तो क्या नाव पलटने से बच्चों और अध्यापकों का दुखद निधन होता? यदि स्थानीय ट्रैफिक विभाग ने समय समय पर स्कूल बसों का निरक्षण और कार्यवाही की होतीतथा शिक्षा विभाग ने गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों को बंद करने की पहल की होती या सार्वजनिक अवकाश के दिनों में लगने वाले विद्यालयों की मान्यता रद्द की होती या स्कूल बसों के लिए निर्धारित नियमावली का पालन करवाया होता तो क्या मासूम बच्चों की बस दुर्घटना में दुखद मृत्यु होती? इन सभी प्रश्नों का एक ही उतर है नहीं। उपरोक्त दुर्घटनाओं के लिए मात्र स्कूलों के संचालकों और मुखियाओं को जिम्मेदार मानकर कार्यवाही करना नाकाफी होगा।


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