Monday, April 6, 2026
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अहोई अष्टमी आज: चांद, तारे को अर्घ्य देंगी सुहागिनें

  • बन रहा शिव और सिद्धि योग, संतान के लिए माताएं रखेगी व्रत

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है। यह व्रत माताएं अपने बच्चों क दीर्घायु की कामना के लिए करती है। अष्टमी का पर्व आज मनाया जाएगा। इसी दिन को अहोई अष्टमी के रूप में मनाते है। ज्योतिषाचार्य अमित गुप्ता ने बताया कि इस व्रत के दिन सर्वार्थ सिद्धि और शिव योग बन रहा है। यह व्रत माता पार्वती को समर्पित है।

इस व्रत में माताएं निर्जला व्रत रखते हुए उदय होते तारों को देखकर व्रत का समापन करती है। अहोई अष्टमी सोमवार की सुबह 9 बजकर 29 मिनट से शुरू हो रही हैं, जो कि मंगलवार की सुबह 11 बजकर 57 मिनट तक रहेगी। पूजा का शुभ मुर्हूत सोमवार शाम 5 बजकर 57 मिनट से 7 बजकर 12 मिनट तक है। तारों को देखने का समय शाम 6 बजकर 20 मिनट तक का है। जबकि चंद्रोदय रात 11 बजकर 35 मिनट पर होगा।

व्रत कथा

एक समय की बात है किसी गांव में एक साहूकार रहता था. उसके सात बेटे थे। दीपावली से पहले साहूकार की पत्नी घर की पुताई करने के लिए मिट्टी लेने खदान गई। वहां वह कुदाल से मिट्टी खोदने लगी। उसी स्थान पर एक साही अपने बच्चों के साथ रहती थी। अचानक कुदाल साहूकार की पत्नी के हाथों साही के बच्चे को लग गई, जिससे उस बच्चे की मृत्यु हो गई।

साही के बच्चे की मौत का साहूकारनी को बहुत दुख हुआ। परंतु वह अब कर भी क्या सकती थी, वह पश्चाताप करती हुई अपने घर लौट आई। कुछ समय बाद साहूकारनी के एक बेटे की मृत्यु हो गई। इसके बाद लगातार उसके सातों बेटों की मौत हो गई। इससे वह बहुत दुखी रहने लगी। एक दिन उसने अपनी एक पड़ोसी को साही के बच्चे की मौत की घटना सुनाई और बताया कि उसने जानबूझ कर कभी कोई पाप नहीं किया।

यह हत्या उससे गलती से हुई थी जिसके परिणाम स्वरूप उसके सातों बेटों की मौत हो गई। यह बात जब सबको पता चली तो गांव की वृद्ध औरतों ने साहूकार की पत्नी को दिलासा दिया। वृद्ध औरतों ने साहूकार की पत्नी को चुप करवाया और कहने लगी आज जो बात तुमने सबको बताई है, इससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है। इसके साथ ही, उन्होंने साहूकारनी को अष्टमी के दिन अहोई माता की आराधना करने को कहा।

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इस प्रकार क्षमा याचना करने से तुम्हारे सारे पाप धुल जाएंगे और कष्ट दूर हो जाएंगे। साहूकार की पत्नी उनकी बात मानते हुए कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को व्रत रखा व विधि पूर्वक पूजा कर क्षमा याचना की। इसी प्रकार उसने प्रतिवर्ष नियमित रूप से इस व्रत का पालन किया, जिसके बाद उसे सात पुत्र रत्नों की फिर से प्राप्ति हुई तभी से अहोई व्रत की परंपरा चली आ रही है।

अहोई अष्टमी: बेटियों के लिए भी रखती है व्रत

हिंदू परंपराओं में प्राचीन काल से ही माताएं अहोई अष्टमी का व्रत करती है। इसे होई के नाम से भी जाना जाता है। वैसे तो यह व्रत पुत्र की लंबी उम्र की कामना के लिए माताएं करती हैं, लेकिन अब इस परंपरा में बदलाव आ गया है। माताएं अब अपनी पुत्री की लंबी उम्र की कामना के लिए भी यह उपवास करने लगी है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रहने वाले अधिकांश हिंदू वर्गों में अहोई अष्टमी का व्रत काफी प्रचलित है। दीवाली से आठ दिन पहले और करवाचौथ के चार दिन बाद आने वाले इस व्रत को महिलाएं पुत्र की दीर्घायु के लिए रखती है। इस दिन पूरी आस्था के साथ अहोई माता की पूजा की जाती है।

रीना सिंघल का कहना है कि मेरी बेटी बेटे से बड़ी हैं, लेकिन मैने उसके होने के बाद से ही अहोई का व्रत शुरु कर दिया था। क्योंकि बेटों की सुख समृद्धि ही क्यों बेटियां भी तो अपनी होती है। बेटा और बेटी एक समान होते है। इसलिए व्रत रखकर उनकी सुख समृद्धि की भी तो कामना करनी चाहिए।

कांता का कहना है कि वह अपनी बेटी के लिए अहोई अष्टमी का उपवास रखती है और यह व्रत चांद को देखकर खोला जाता है। यह व्रत बच्चों की सुख समृद्धि के लिए होता है। योगिता के तीन बच्चे हैं, जिसमें दो बेटियां और एक बेटा हैं, लेकिन वह बेटे के साथ ही अपनी बेटियों की लंबी उम्र की कामना के लिए यह उपवास रखती है। क्योंकि अब इस प्रथा में बदलाव आ चुका है। बेटियां भी बेटों के समान होती है।

अमिता शर्मा अपनी बेटियों की सुख समृद्धि के लिए लंबे समय से अहोई अष्टमी का उपवास कर रही है। उनका कहना है कि बेटियां भी बेटों की तरह माता-पिता के लिए एक समान होती है तो केवल बेटों के लिए ही व्रत क्यों। बेटियों के लिए भी तो करना चाहिए।

शकुंतला का कहना है कि बेटे और बेटियों में आज कोई फर्क नहीं है। बेटियों के लिए भी यह व्रत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए मैं यह व्रत करती हूं।

मीरा का कहना है कि वह अहोई अष्टमी का व्रत अपनी बेटी के लिए करती है। ताकि उसके जीवन में सुख समृद्धि बनी रहे। वह धूमधाम से इस पर्व को मनाती है।

रमा ने बताया कि आज के समय में बेटा और बेटी में फर्क करना गलत है। परंपराएं बदल गई है और बेटों की तरह बेटियां भी आगे बढ़ रही है तो उनके लिए मंगल कामना करना भी हमारा फर्ज है। इसलिए में अपने बेटे के साथ-साथ बेटी के लिए भी अहोई का व्रत करती हूं।

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