संपादकीय
ऐसे बढ़ेगी डिमांड?
देश की अर्थव्यवस्था वास्तव में संकट में है। यह बात वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मान ली है। सीधे-सीधे नहीं, थोड़ा घुमा-फिरा कर मानी है। केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों को एलटीसी यानी लीव ट्रेवल कन्सेशन के बदले केश वाउचर्स देगी। लेकिन इसके साथ कुछ ऐसी शर्तें जोड़ दी हैं, जो सरकार और उद्योगपतियों को फायदा देती नजर आती हैं। केंद्र सरकार की यह स्कीम किसी कंपनी की उस स्कीम की तरह लगती है, जो अपनी सेल बढ़ाने के लिए उपभोक्ताओं को त्योहारी सीजन में देती है। इस कैश वाउचर्स से केंद्रीय कर्मचारी कोई भी सामान खरीद सकता है। लेकिन उसे एलटीसी की रकम का तीन गुना खर्च करना होगा। कर्मचारी को वो ही सामान खरीदने होंगे, जिन पर 12 परसेंट या इसके ऊपर जीएसटी लगता हो। सामान सिर्फ जीएसटी रजिस्टर्ड वेंडर्स से ही लेना होगा। ये सारे खर्चे उसे 31 मार्च 2021 तक करने होंगे। ये सभी खर्चे और खरीद का पेमेंट डिजिटल मोड में ही होना चाहिए। इस कवायद का मकसद यह है कि सरकारी कर्मचारी बाजार से कुछ खरीदेंगे तो वस्तुओं की डिमांड बढ़ेगी, जिससे अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा। इसका मतलब यह है कि बाजार में डिमांड इतनी कम हो चुकी है कि केंद्र सरकार को ‘स्कीम’ देकर सामान बिकवाना पड़ रहा है। केंद्रीय कर्मचारी जो सामान खरीदेंगे, उससे असंगठित क्षेत्र के लोगों को कोई फायदा नहीं होने वाला है। जीएसटी रजिस्टर्ड दुकान से सामान खरीदने का मतलब यह है कि केंद्रीय कर्मचारी रेहड़ी-पटरी वालों पर एलटीसी स्कीम का पैसा खर्च नहीं कर सकता। न ही वह किसी मजदूर से काम करा कर उसे उस स्कीम का पैसा दे सकता है। केंद्र सरकार चाहती है कि जो भी पैसा खर्च हो, उसका कुछ हिस्सा जीएसटी के रूप में उसके पास भी आए। क्या केंद्र सरकार इस तरह बाजार में डिमांड बढ़ा पाएगी? यह बाजार में डिमांड बढ़ाने की कवायद है या बड़े उद्योगपतियों का सामान बिकवाने की तरकीब? दरअसल, सरकार डिमांड बढ़ाने के लिए त्योहारों के सीजन को भुनाना चाहती है। सरकार स्पेशल फेस्टिवल एडवांस स्कीम भी लेकर आई है, जिसके तहत हर केंद्रीय कर्मचारी को 10,000 रुपये एडवांस दिए जाएंगे। ब्याजमुक्त इस रकम को 10 किश्तों में चुकाया जा सकेगा। देखना यह होगा कि केंद्र सरकार की इस स्कीम से अर्थव्यवस्था कितनी उबर पाएगी? सरकार यह तो मान ही चुकी है कि बाजार में डिमांड नहीं है।


