Thursday, February 12, 2026
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…और बेचैन दिल को करार आ गया

कल तक मेरी मानसिकता विपक्षी राजनीतिक दलों की विचारधारा के अनुरूप थी। अत्र-तत्र-सर्वत्र मुझे देश-प्रदेश के राजनीतिक भविष्य के प्रति नकारात्मक से नकारात्मक विचार आते रहा करते थे। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, भाई-भतीजावाद इत्यादि तमाम समस्याओं को लेकर हताशा और निराशा के घोर अंधकार में अपने आप को पाता था। अब यह अलग बात है कि मैं अपने घर के टूटे ओटले से कहीं अधिक चिंता देश-प्रदेश की एकता और अखंडता को लेकर किया करता था। इस नाते मैं एक जागरूक नागरिक का दर्जा प्राप्त करते हुए बुद्धिजीवी के रूप में जाना जाता था।

एकाएक मुझे अपने भविष्य को लेकर चिंता होने लगी। मैं भी औरों की भांति अपने स्वर्णिम भविष्य की परिकल्पना में हिलोरे लिया करता था। जब चारों और नकारात्मक वातावरण पाता था, तो चिंता ही चिंता में असमय ही वृद्धावस्था के लक्षण नजर आने लगे थे। खैर, सोचते-विचारते इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मुझे नकारात्मक सोच से बाहर आना होगा। इस दिशा में मैंने गहन वैचारिक मंथन किया। अंतत: एक लंबी शोध प्रक्रिया के उपरांत आखिरकार मैं निश्चित निष्कर्ष पर पहुंच गया। जी हां, मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि यदि मैं अपनी राजनीतिक विचारधारा में आमूलचूल परिवर्तन कर लेता हूं, तो बहुत संभव है कि मुझे अपेक्षित परिणाम मिल जाए।

… और मैंने तय कर लिया कि अपनी दृष्टि को सकारात्मक ही रखूंगा – इस नाते मैंने अपनी राजनीतिक विचारधारा को बदल दिया। जी हां, रातोरात मेरी राजनीतिक मानसिकता सत्तापक्ष के साथ हो गई। अब आप विश्वास नहीं करेंगे कि मेरे मन की निराशा जाने कहां विलुप्ति की कगार पर जाकर दफन हो गई। कल तक जो समस्याएं सताती थी, वे भी रातों-रात गायब ही हो गई। मेरे चंचल मन में सकारात्मक ही सकारात्मक विचारों का सैलाब उमड़ आया। चारों ओर मुझे हरा ही हरा नजर आने लगा। यही नहीं , मैं देश प्रदेश के स्वर्णिम राजनीतिक सामाजिक और सांस्कृतिक भविष्य के प्रति पूर्ण रूप से निश्चिंतता का अनुभव करने लगा।

मुझे लगा कि हम सही दिशा में जा रहे हैं। कल तक मैंने अपना खून नाहक ही जलाया। जैसे कठोर तपोसाधना के उपरांत सिद्धत्व की प्राप्ति होती है, ठीक उसी प्रकार का अनुभव मुझे होने लगा। महंगाई को मैं देश-प्रदेश के आर्थिक विकास के सूचक के रूप में लेने लगा। भ्रष्टाचार को एक शिष्टाचार के रूप में, बेरोजगारी को तकनीकी विकास का द्योतक मानने लगा और भाई-भतीजावाद को अपनों की चिंता की जाने की पारिवारिक संवेदनशीलता का संकेत मानने लगा। देखते ही देखते मेरी दृष्टि बदल गई, ज्ञानी कहते हैं कि दृष्टि बदलने से सृष्टि बदल जाया करती है। जी हां, आप बिल्कुल ठीक समझे! ‘जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि’ सचमुच देखते ही देखते अंतर्मन में दिव्य सुकून की सुखद अनुभूति होने लगी। क्या आप ही हताश, निराश और परेशान हैं ? यदि हां, तो समझ लीजिए मैंने यह गुरुमंत्र व्यापक जनहित में ही प्रसारित किया है।

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