
कुछ लोगों की प्रवृत्ति होती है कि वे अकारण ही चिंतित होते रहते हैं। मस्तिष्क यों तो विलक्षण क्षमताओं का केन्द्र है परंतु सर्वसाधारण न उन क्षमताओं का उपयोग कर पाते हैं और न उनके बारे में जानते ही हैं। ये क्षमताएं जागृत व विस्तृत हो सकें, इसके लिए अवसर स्वयं ही उपस्थित रहते हैं परंतु अपनी ही गलतियों के कारण हम उन क्षमताओं व शक्तियों को नष्ट करते रहते हैं।
इसका दुष्परिणाम यह होता है कि चिंता, तनाव और विविध मनोरोग होने लगते हैं।
यद्यपि चिंता एक कल्पना मात्र है, परंतु लोग उसे यथार्थ मानकर तनाव और भय से भर उठते हैं।
चिंता करके हम अनावश्यक ही अपने शरीर को श्रम में जुटाने तथा कष्ट में फंसा लेने की क्रि या करते हैं। चिंता से अपच, सिरदर्द, अनिद्रा, सर्दी जुकाम आदि का जो क्रम प्रारंभ होता है वह हृदय रोग पर जाकर ही रूकता है। चिंता से मनोबल नष्ट होता है। स्मरणशक्ति शिथिल होती है और जीवन में विषाद की छाया घिरी रहती है।
चिंता करने का अभ्यस्त मन सोते समय देखे गये सपनों का मुफ्त में सिनेमा की तरह आनंद लेने की अपेक्षा उनकी अजीबो गरीब व्याचयाएं पूछता एवं ढूंढता रहता है। वह हताश व परेशान रहता है तथा अपनी वास्तविक क्षमता का एक बहुत बड़ा अंश गंवा देता है।
चिंता आत्मविश्वास का हनन करती है और आत्मविश्वास के अभाव में व्यक्ति को अपनी सफलताओं तक का स्मरण नहीं रहता। वह किसी दिशा में तेजी से चल पड़ने का साहस नहीं जुटा पाता जबकि प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए आत्मविश्वास की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
चिंतन तो अनिवार्य है। किसी रास्ते या कार्य विशेष को चुनने के लिये पहले उसके सभी पहलुओं पर चिंतन व मनन आवश्यक है परंतु निर्णय लेने के बाद इच्छित कार्य में उत्साहपूर्वक जुट जाना चाहिए। चिंता करने हेतु तब समय ही नहीं रहना चाहिए क्योंकि चिंता निष्क्रि यता उत्पन्न करती है।
अधिकांश लोग प्रतिकूल परिस्थितियों में चिंताग्रस्त होकर निराशा के गहन अंधकार में फंसकर अपना सब कुछ गंवा बैठते हैं किन्तु मनस्वी विवेकी व्यक्ति ऐसी विषम स्थितियों में अत्यधिक साहस और सक्रि यता के साथ आगे बढ़ते हैं तथा विजय प्राप्त करते हैं।
आशा और उल्लास मनुष्य के जीवन को पुष्प के समान सुरभित कर देते हैं। ंिचंता की काली छाया न पड़ने पर ही यह पुष्प कुम्हलाये बिना रह सकता है।
खिन्नता एवं अप्रसन्नता की स्थिति हानिकारक है। अत: इससे शीघ्र छूट लेना अच्छा है। खिन्न रहकर मनुष्य को अपना जीवन नष्ट करने का अधिकार नहीं है।
चिंता की चिता से शरीर को झुलसने देना मानसिक दुर्बलता है। मानव जीवन एक सुरम्य उद्यान है। इसे चिंता रहित होकर कलापूर्ण ढंग से जीना हर किसी का कर्तव्य है।
व्यस्तताओं व विषमताओं भरे संसार में चिंता के झोंके यदा-कदा आते रहते हैं पर उनका कभी भी हृदय पर स्थायी प्रभाव नहीं पड़ने देना चाहिए। मानव जीवन एक सुंदर बगीचा है। उसमें आनंद व उल्लास के सुंदर, कोमल व रंग बिरंगे पुष्पों की कमी नहीं है। कहीं वे चिंता की ज्वाला से झुलस न जाएं, इस बात का प्रयास आवश्यक है।
अंजलि गंगल
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