
एक बार अकबर ने बीरबल से पूछा, बीरबल यह अविद्या क्या है? बीरबल बोला, आप मुझे 4 दिनकी छुट्टी दे दो फिर मैं आपको बताऊंगा। बीरबल को चार दिनों की छुट्टी दे दी। बीरबल मोची के पास गया और बोला, भाई जूती बना दो। डेढ़ फुट लंबी और एक बित्ता चौड़ी बना दो। इसमें हीरे जवाहरात जड़ देना। सोने और चांदी के तारों से सिलाई कर देना। पैसे की चिंता मत करना।
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मोची ने भी कहा ठीक है भैया तीसरे दिन ले लेना। तीसरे दिन जूती मिली तब पारितोषिक देने के पहले बीरबल ने उस मोची से एक ठोस आश्वासन ले लिया कि वह किसी भी हालात में इस जूती का कभी भी जिक्र नहीं करेगा यानि हर हालात में अनजान बना रहेगा। अब बीरबल ने एक जूती अपने पास रख ली और दूसरी मस्जिद में फेंक दी।
जब सुबह मौलवी जी नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद गए तो मौलवी को वो जूती वहां पर मिली। मौलवी जी ने सोचा यह जूती किसी इंसान की तो हो ही नहीं सकती जरूर अल्लाह मियांनमाज पढ़ने आया होंगे और उसकी छूट गई होगी। उसने वह जूती अपने सर पर रखी, मत्थे में लगाई। क्योंकि वह जूती अल्लाह की थी ना। वहां मौजूद सभी लोगों को दिखाया सब लोग बोलने लगे कि हां भाई यह जूती तो अल्लाह की रह गई उन्होंने भी उसको सर पर रखा।
यह बात अकबर तक गई। अकबर ने बोला, मुझे भी दिखाओ। अकबर ने देखा और बोला यह तो अल्लाह की ही जूती है। उसने भी उसे सर पर रखा और बोला इसे मस्जिद में ही अच्छी तरह अच्छे स्थान पर रख दो।
बीरबल वापस आया और अकबर से बोला, मेरे पुरखों की एक जूती चोरी हो गई। यह रही दूसरी जूती। अकबर का माथा ठनका और उसने मस्जिद से दूसरी जूती मंगाई और बोला या अल्लाह मैंने तो सोचा कि यह जूती अल्लाह की है मैंने तो मस्जिद में रखवा दिया। बीरबल ने कहा राजा साहब यही है अविद्या।


