- जान हथेली पर रख लोगों की जान बचाने वाला प्रवीण मायूस
- सांसद और मंत्री ने दिया पुरस्कार पर शासन से कुछ नहीं हासिल
वरिष्ठ संवाददाता |
सहारनपुर: जान हथेली पर रखकर एक नहीं, तीन-तीन बार दूसरों की जान बचाने वाले बहादुर नौजवान प्रवीण सैनी को जीवन रक्षक पदक (पुरस्कार) नहीं मिल सका। इस तरह एक और 26 जनवरी निकल गई और प्रवीण हाथ मलता रह गया। हां, इतना जरूर है कि हाकिम और हुकूमत के बीच लंबे समय तक पत्राचार होता रहा है। लेकिन, इसका नतीजा आज तक सिफर है।
बता दें कि बेरी बाग में रहने वाले प्रवीण सैनी मार्शल आर्ट में ब्लैक बेल्ट हैं। बचपन से ही प्रवीण में साहस कूट-कूट कर भरा है। हालांकि, उनका पारिवारिक पेशा दिल्ली रोड पर सब्जियों के कारोबार का है। इस काम में वह अपने पिता की हर संभव मदद करते हैं। एक घटना सन 2009 की है।
बड़ी नहर में छह साल का बच्चा डूब रहा था। प्रवीण सैनी बड़ी नहर पर किसी काम से गए थे। उन्होंने नहर में छलांग लगा दी और बच्चे को जान पर खेल कर बचा लिया। प्रवीण के इस साहस को हर किसी ने सराहा। एक और घटना 7 मई सन 2010 की है। यहां शहर के दिल्ली रोड पर एक टैंपो वाले ने साइकिल सवार को टक्कर मार दी और भाग निकला।
मौके पर मौजूद प्रवीण सैनी ने जब यह दृश्य देखा तो तेज दौड़ लगा दी और करीब एक किलोमीटर तक फराटा भरते हुए टैंपो वाले का रास्ता रोक लिया। टैंपो चालक को पुलिस के हवाले और घायल को तुरंत लेकर अस्पताल गए। उसका इलाज हुआ और जान बच गई।
इसी तरह सन 2011 में ही सब्जी मंडी में 11 हजार बोल्ट की लाइन टूट कर गिरी तो सैनी ने तुरंत साहस का परिचय देते हुए कुर्सियां लगाकर चौतरफा घेरा बना दिया और पब्लिक को आने से रोक दिया। अगर वह ऐसा नहीं करते तो कइयों को करंट लगता और जान भी चली जाती। ऐसे कई और मौके आए जब प्रवीण ने अपनी बहादुरी का परिचय दिया। उसकी बहादुरी मीडिया की सुर्खियां बनीं।
प्रवीण को सन 2010 में तत्कालीन सांसद जगदीश राणा ने घर बुलाकर पुरस्कृत किया। बसपा सरकार में बेसिक शिक्षा मंत्री रहे डाक्टर धर्म सिंह सैनी ने भी प्रवीण को पुरस्कृत किया। तत्कालीन सदर कोतवाल ने भी प्रवीण की बहादुरी से प्रभावित होकर उसे सम्मानित किया। यही नहीं, शासन स्तर से दिए जाने वाले जीवन रक्षक पदक के लिए जिलाधिकारी स्तर से संस्तुति की गई।
सन 2017 में तत्कालीन डीएम ने इस पदक के लिए प्रवीण को उपयुक्त मानते हुए शासन को पत्र भेजा। इसके पहले पूरी तरह जांच की गई। सब कुछ सही होने के बाद भी शासन स्तर पर उपसचिव के यहां मामला खटाई में पड़ा रहा और प्रवीण सैनी के हाथ मायूसी लगी।
उसे पुरस्कृत किया ही नहीं गया। अब प्रवीण की उम्मीदें लगभग टूट चुकी हैं। प्रवीण का कहना है कि पुरस्कार न मिलने का उसे बहुत अफसोस है। फिर भी वह मानवता और समाज के लिए आगे भी काम करता रहेगा। लेकिन, इस व्यवस्था और तंत्र की रुग्णता अखरने वाली है।

