- 11 मार्च दोपहर त्रयोदशी व चतुर्दशी का होगा मिलन
जनवाणी ब्यूरो |
बिजनौर: शिव और शक्ति के मिलन का पर्व महाशिवरात्रि प्रतिवर्ष फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी युक्त चर्तुदशी को मनाया जाता है। पंडित ललित शर्मा ने बताया कि इस वर्ष 11 मार्च को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाएगा। जलाभिषेक का श्रेष्ठ समय दो बजकर 40 मिनट दोपहर होगा।
सिविल लाइन स्थित धार्मिक संस्थान विष्णुलोक के ज्योतिषविद् पंडित ललित शर्मा ने बताया कि इस वर्ष 11 मार्च गुरुवार को त्रयोदशी और चर्तुदशी का मिलन हो रहा है इसलिए महाशिवरात्रि का पर्व 11 मार्च को मनाना श्रेष्ठ रहेगा। 11 मार्च को दोपहर दो बजकर 40 मिनट पर त्रयोदशी व चतुर्दशी का मिलन हो रहा है।
शिवलिंग पर जलाभिषेक का श्रेष्ठ समय दो बजकर 40 मिनट पर रहेगा। 10 मार्च बुधवार को दोपहर दो बजकर 41 मिनट पर त्रयोदशी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। इस साल महाशिवरात्रि कई शुभ संयोग में मनाई जाएगी। महाशिवरात्रि पर्व की पूजा विधि-विधान से करने से विशेष कल्याणकारी मानी जा रही है।
महाशिवरात्रि को वर्षभर में पड़ने वाली सिद्ध रात्रियों में से एक माना गया है। इस दिन ब्र्रहाण्ड में दिव्य ऊर्जाएं चरम पर होती है। इस लिए शिवरात्रि को की गई पूजा-अर्चना जय, दान आदि का फल कई गुना प्राप्त होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार 27 योग में से प्रतिदिन एक योग उपस्थित होता है।
इन 27 योग में से एक शिव योग भी है। जिसे परम कल्याणकारी और भगवान भोलेनाथ की पूजा के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस बार शिवरात्रि के दिन शिवयोग है। जो कि बहुत दुर्लभएवं शुभसंयोग है। शिव उपासना में बेल पत्र का भी विशेष महत्व होता है। तीन दलों से युक्त एक बेल पत्र जो भगवान शिव को अर्पित करता है उसके तीन जन्मों के पापों का नाश होता है।
भगवान शिव को पंचामृत से अभिषेक करने पर सुस्वास्थ्य व समृद्धि प्राप्त होती है। शिवरात्रि के दिन शिव स्तुति, शिव सहस्त्रनाम, शिव चालीसा, रूद्राष्टकम, शिव पुराण, शिव पंचाक्षर आदि का पाठ करना चाहिए। भगवान शिव की आधी परिक्रमा लगाई जाती है। शिवलिंग के बाई तरफ से परिक्रमा शुरू करनी चाहिए। महाशिवरात्रि की रात्रि बहुत महत्वपूर्ण होती है।
भगवान भोलेनाथ के विवाह में सिर्फ देव ही नही दानव, किन्नर , गंधर्व, भूत, पिशाच भी शामिल हुए थे। भगवान शिव की वेशभूषा भी अन्य देवी देवताओं से अलग होती है। महादेव अपने शरीर पर चिता की भस्म लगाते है, रूद्राक्ष के आभूषण धारण करते है और नंदी की सवारी करते है। भूत प्रेत निशाचर उनके अनुचर माने जाते है।
ऐसा वीभत्स रूप धारण करने के उपरांत भी उन्हें मंगलकारी माना जाता है जो अपने भक्त की पल भर की उपासना से ही प्रसन्न हो जाते है और उसकी मदद करने के लिए दौड़े चले आते है। इसलिए उन्हें आशुतोष भी कहा गया है। महाशिवरात्रि के शुभ दिन ही देवों के देव महादेव व माता पार्वती का विवाह हुआ था।

