Wednesday, March 4, 2026
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बिहार का जटिल सियासी समीकरण

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लगभग महीने भर बाद से बिहार में विधानसभा चुनावों की सरगर्मियां आरंभ हो जाएंगी। इसकी पृष्ठभूमि में चुनावी समर का घोष- वादन वहां मतदाता सूचियों के विशेष गहन परीक्षण पर मचे हल्ले से हो चुका है, जिसमें पहला राउंड चुनाव आयोग के जीतने के बाद वोटर बचाओ यात्रा के माध्यम से दूसरा राउंड विपक्ष की विजय के साथ समाप्त हुआ। अभी तक का द्वंद्व आश्चर्यजनक रूप से सत्ता पक्ष और विपक्ष के मध्य न होकर विपक्ष और चुनाव आयोग के मध्य रहा और सत्ता पक्ष उस दौरान चुनाव आयोग के लिए चीयरगर्ल का काम करता रहा।

अब जब चुनाव सन्निकट है तो राजनीतिक दलों ने भी अपनी अपनी व्यूह रचना बना ली है और प्रमुख प्रमुख चुनावी मुद्दे सोच लिए हैं। बिहार जहां गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी से हर समय जूझता एक राज्य रहा है वहीं यह राजनीतिक रूप से सर्वाधिक जागृत प्रदेश भी माना जाता है जहां का मतदाता बहुत जल्दी अपनी राय नहीं बदलता है और ना ही भावनात्मक या धार्मिक मुद्दों से जल्दी से प्रभावित ही होता है। इस नाते इसकी प्रकृति उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात से अलग है और यही बात भारतीय जनता पार्टी के लिए सदा से ही चिंता का विषय रही है। बिहार आज भी जाति और वर्ग के आधार पर वोट करता है और ये जातियां विभिन्न दलों में स्थायी रूप से बंटी हुई हैं।

बिहार दलित एवं पिछड़ी जातियों के बाहुल्य वाला प्रदेश है जहां का लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा ये वर्ग शेयर करते हैं। इनके अलावा लगभग 12 प्रतिशत मुस्लिम अल्पसंख्यक भी हैं। यहां केवल 20 प्रतिशत उच्च जातियां हैं जो यहां के प्रशासन, मीडिया, न्यायपालिका, चिकित्सा क्षेत्र में प्रभावी भूमिका में हैं और यहां का एजेंडा सैट करती हैं। ये बीस प्रतिशत जातियां ही भारतीय जनता पार्टी का कोर वोट समूह है, लेकिन इस वोट बैंक के बल पर वह अपने दम पर सत्ता में नहीं आ सकती इसलिए गत दस वर्षों में उसने गैर दलित पिछड़े और महादलित वर्ग में पैठ बनाने की कोशिश की है। उल्लेखनीय है कि यही गैर यादव और महादलित नितीश कुमार का भी वोट बैंक रहा है। इन दोनों के इस वोटबैंक को सहारा मिलता है पासवान के उच्च दलित वोटों से और मांझी के मध्यम दलित वोटों से। इस प्रकार इन चारों दलों के गठबंधन से एक विजयी समीकरण बन जाता है जिसके कारण लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में यह गठबंधन अजेय रहा है।

अब बात की जाए राजद, कांग्रेस और वामदलों के गठबंधन की तो इस गठबंधन का कोर वोट 12 प्रतिशत यादव और बारह प्रतिशत मुस्लिम हैं, जिनके साथ लगभग 6 प्रतिशत वामदलों के वोट आते हैं। कुल मिलाकर इनका आधार तीस प्रतिशत मतदाता हैं और सीधी लड़ाई में यह गठबंधन एनडीए गठबंधन से पार नहीं पा सकता इसीलिए अपनी वोट बचाओ यात्रा के द्वारा इस गठबंधन ने महादलित जातियों को जो कि बिहार में लगभग 13 प्रतिशत हैं को अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास किया है। कांग्रेस ने अपना प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार को भी इसी उद्देश्य से नियुक्त किया है। उल्लेखनीय है कि राजेश कुमार रविदासी वर्ग से संबंधित हैं जो बिहार की आबादी का लगभग 5 प्रतिशत है। मुकेश सहनी के रूप में उसे मल्लाह निषाद मछुआरों का भी समर्थन मिलेगा। पुराने समय में जब कांग्रेस बिहार में सत्ता में होती थी तो उसका कोर वोट बैंक ब्राह्मण, दलित और अल्पसंख्यक हुआ करते थे जिसमें से ब्राह्मण भाजपा के पास चले गये और दलित तथा अल्पसंख्यक नीतीश और लालू में बंट गये। कांग्रेस वहां लगभग खाली हाथ रह गई थी।

आगामी चुनावों में एक विशेष बात यह होने वाली है कि अब वहां नीतीश कुमार एक फैक्टर नहीं होंगे। उनकी कथित बीमारी, शासन में अरुचि तथा शासन प्रशासन को पूर्णरूपेण भाजपा के तंत्र को सौंपने के आरोपों के चलते इस बार जनता दल यूनाइटेड को मतदाताओं के बीच जाने में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है और यह भी एक संभावना है कि जनता दल यूनाइटेड के वोटर्स का एक हिस्सा इंडिया गठबंधन की तरफ चला जाए। गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण के नाम पर लोगों के नाम जानबूझकर काटने के आरोपों के चलते वैसे भी बिहार में मतदाताओं में कुछ रोष है जिसका फायदा निश्चित रूप से विपक्ष को मिलेगा। जहां तक भाजपा की बात है तो कोर वोटर समूह के रूप में उच्च जातियों का उसे शत-प्रतिशत समर्थन हासिल है और जनता दल यूनाइटेड के कुर्मी आदि गैर यादव पिछड़े और महादलित तथा पासवान और मांझी के उच्च दलित वोटों का उसे समर्थन मिल जाता है तो यह गठबंधन एक बार फिर से सत्ता का स्वाद चख सकता है।

यहां यह भी महत्वपूर्ण रहेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बूथ लेवल कार्यकर्ता चुनावी मशीनरी को कैसे नियंत्रित करते हैं और मतदाता को पोलिंग बूथ तक कितनी तादाद में लाते हैं। बिहार में गत कुछ वर्षों से प्रशांत किशोर भी अपनी जन सुराज पार्टी का गठन करके वहां तीसरी शक्ति के तौर पर अपने को स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। आरंभ में ऐसे आरोप भी लगे कि इन्हें भाजपा ने विपक्षी गठबंधन के मतों में सेंध लगाने के लिए बढ़ाया है किंतु अब जैसे जैसे प्रशांत किशोर का शोर बढ़ रहा है वैसे-वैसे यह आशंका प्रबल होती जा रही है कि कहीं ये भाजपा के बुद्धिजीवी वोटबैंक में सेंधमारी ना कर दें। आम आदमी पार्टी ने भी सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है लेकिन अभी आम आदमी पार्टी का यहां कोई विशेष जनाधार नहीं है। असदुद्दीन ओवैसी का दल सीमांत क्षेत्र की कुछ सीटों पर उम्मीदवार उतार कर यकीनन विपक्षी उम्मीदवारों को नुक्सान पहुंचायेगा।

बिहार के इन चुनावों में भाजपा का परंपरागत राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का मुद्दा कतई काम नहीं करने वाला है। आपरेशन सिंदूर की सफलता असफलता की यहां कोई चर्चा नहीं है। विदेश नीति, रक्षा नीति आदि की चर्चा केवल बौद्धिक वर्ग और समाचार चैनलों तक ही सीमित है। प्रधानमंत्री की मां को गाली जैसे भावनात्मक मुद्दे केवल मीडिया में ही उभरते हैं। मतदाता सूची में कथित वोट कटिंग, बेरोजगारी, अपराध , मुफ़्त राशन, महिलाओं को पेंशन और जातिवाद जैसे मुद्दे चुनाव में हावी रहेंगे और राजनीतिक दलों को इनके इर्द-गिर्द ही अपने चुनाव अभियान को केंद्रित रखना होगा। जीएसटी दरों में कमी से यदि वास्तविक रूप से उपभोक्ता सामग्रियों की कीमतों में कमी आ जाती है तो अवश्य सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए यह एक प्लस पॉइंट होगा।

बिहार ऐसा प्रदेश रहा है जहां के चुनावों पर देश विदेश के चुनाव विश्लेषकों की नजर रही है। एक समय वह था जब चुनाव मतपत्रों के जरिए होते थे और बिहार में बूथ कब्जे होना आम था। गुंडे गिरोहों को राजनीतिक दल कब्जा करने हेतु ठेका दिया करते थे। जिस दल या जाती का जिस इलाके में प्रभुत्व होता था वहां वो अपने हिसाब से थोक में वोट डाल देता था। इलेक्ट्रॉनिक मशीन आने के बाद से इस तरह से मतपत्रों की लूट या स्थानीय भाषा में कहें तो वोट छापना तो बंद हो गया किन्तु हैकिंग , फाल्स प्रोग्रामिंग आदि के नये आरोप लगने लगे।

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