
प्रमोद साह |
पूरी दुनिया में माह जून और जुलाई में तेजी से घटे आर्थिक घटना चक्र, जिसमें श्रीलंका के डिफॉल्ट हो जाने, राष्ट्रपति गोट बाया के भाग जाने तथा चीन के चार हजार बैंकों के द्वारा भुगतान रोके जाने, जिस कारण 86 अरब डॉलर एनपीए हो जाने का खतरा है। अमेरिका और इंग्लैंड में खुदरा मूल्य सूचकांक अर्थात महंगाई के दहाई के अंक में रहने तथा पूरे यूरोप में औसत कर्ज जीडीपी के अनुपात में 350 प्रतिशत तक बढेÞ रहने से अब यह विश्वास बढ़ गया है की दुनिया बहुत शीघ्र गहरी मंदी की चपेट में होगी। यह मंदी दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग प्रकार से प्रभाव डालेगी।
भारत में भी मंदी का असर तो देखा ही जाएगा, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी से पहले ही कई ऐसे बिंदु हैं, जिनके जतन न होने पर भारत की अर्थव्यवस्था पर मंदी की चोट और गहरी होगी। भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरियों के इन विभिन्न क्षेत्रों को अर्थव्यवस्था के ब्लैक होल्स के नाम से भी जाना जा रहा है। इन होल्स को जतनपूर्वक भरने में ही हमारा आर्थिक कौशल दिखाई देगा जो मंदी के प्रभाव को कम और ज्यादा करेगा। आइए भारतीय अर्थव्यवस्था के इन ब्लैक होल्स पर नजर डालें।
बढ़ता एनपीए, लड़खड़ाते बैंक
सबसे पहले नीरव मोदी, विजय माल्या के बैंकों के भारी कर्ज को दबाकर विदेश भाग जाने की घटना के बाद एनपीए शब्द चलन में सुनाई दिया। तब जानकारी आई कि 2014 में यूपीए सरकार की विदाई के वक्त बैंकों का कुल एनपीए 2 लाख 25 हजार करोड़ था, जो लगातार बढ़ता हुआ 2019 में 10 लाख 92 हजार 86 करोड़ हो गया। अब बैंकों की बैलेंस शीट सुधारने के लिए इस एनपीए को राइट आॅफ अर्थात बट्टे खाते में डालने का प्रयोग प्रारंभ हुआ, जिसमें 100 करोड़ से अधिक के बड़े कर्जदारो के सौ खातों में 4 लाख 96 हजार 158 करोड की राशि राइट आॅफ करने के साथ ही बैड बैंक का विचार अस्तित्व में आया। उसके बाद से एनपीए को फिर बट्टे खाते में डाला गया, जो बढ़ कर अब बढ़कर 7 लाख करोड़ हो गया, जबकि एनपीए के अकाउंट में बड़ी कमी दर्ज नहीं हुई, वह आज भी लगभग 9 लाख करोड़ के आसपास बना हुआ है।
इस प्रकार भारत के बैंकों का लगभग 130 लाख करोड़ की जमा पूंजी का लगभग साढेÞ तेरह प्रतिशत और निजी बैंकों के जमा का 4 प्रतिशत एनपीए के रूप में खतरे में है। इस बीमारी के उपचार के लिए गठित ‘बेड बैंक’ जिसने स्विट्जरलैंड लैंड में 87 प्रतिशत, मलेशिया में 57 प्रतिशत तथा दुनिया के और कई देशों में लगभग 50 प्रतिशत से अधिक डूबे हुए कर्ज को वापस निकाल लिया, वह भी भारत में 8 प्रतिशत से अधिक कर्ज की वसूली की स्थिति में नहीं दिखता। इस पूरे एनपीए के दुष्चक्र ने भारतीय सार्वजनिक बैंकिंग के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। इसी के चलते विशेषज्ञों के दल ने बैंकों के निजीकरण की संस्तुति की है, जिसके लिए मानसून सत्र में बिल आने की संभावना है।
टूटता रुपया, घटता विदेशी मुद्रा भंडार
चूंकि विश्व व्यापार का 85 प्रतिशत अमेरिकी डॉलर के माध्यम से ही होता है, इसलिए किसी भी राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख बचाने के लिए डॉलर के मुकाबले अपनी कीमत को बरकरार रखना जरूरी है, इस दृष्टि से 2022 का वर्ष भारत के लिए शुभ नहीं रहा। 1 जनवरी को $1 डालर की कीमत भारतीय रुपए में 74.42 रुपये थी, जो इस वर्ष 14 जुलाई को 8 प्रतिशत कम होकर 80 रुपये के आंकड़े को पार कर गई। यह भारतीय रुपए तथा विदेशी मुद्रा भंडार पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव है। इस वर्ष के प्रारंभ में विदेशी मुद्रा भंडार जो 633 बिलियन डॉलर की सुखद स्थिति में था, अब घटकर 580 बिलियन डॉलर रह गया है। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर न केवल बढ़ते आयात का दबाव है, बल्कि अगले वर्ष विदेशी कर्ज के लगभग 275 बिलियन डॉलर की वापसी के दबाव में विदेशी मुद्रा भंडार पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया है । हमारा भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार रुपए में लगभग 47 लाख करोड़ का है। एक अनुमान के अनुसार जब रुपये के मुकाबले डॉलर महंगा होता है, वह साल भर में विदेशी मुद्रा भंडार में 10 लाख करोड़ का दबाव उत्पन्न कर देता है। इस प्रकार कमजोर रुपए और विदेशी ऋण की अदायगी ने विदेशी मुद्रा भंडार पर बड़ा संकट पैदा कर दिया है। मंदी के इस दौर में इसका जतन करना बड़ी चुनौती है।
बढ़ते विदेश व्यापार घाटे की चुनौती
विदेश व्यापार की दृष्टि से भारत निर्यात में वृद्धि के लिए आक्रमक रुख अपनाए हुए है, लेकिन उसके बाद भी विदेश व्यापार का बढ़ता घाटा भारत को गंभीर चेतावनी दे रहा है। वर्ष 2014-15 में जहां हमारा विदेश व्यापार घाटा 137 अरब डॉलर था, 2021-22 में लगभग 40 प्रतिशत बढ़कर 192अरब डॉलर हो गया। रुपये की कमजोरी के कारण मई और जून 2022 के माह में व्यापार घाटे में बेतहाशा वृद्धि देखी गई है। मई में जहां यह 23 अरब डॉलर घाटा था, जून में 26 अरब डॉलर हो गया है। इस प्रकार वर्ष 2022-23 विदेश व्यापार घाटा 250 अरब डॉलर के रिकॉर्ड तक पहुंचने का अनुमान है। विदेश व्यापार के असंतुलन का यह दबाव विदेशी मुद्रा भंडार के समक्ष एक बड़ी चुनौती पेश करने वाला है।
चुनिंदा उद्योगपतियों का संकट
भारत के विदेशी कर्ज में कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों का बड़ा योगदान है। 2020-21 में भारतीय कंपनियों पर 38 बिलियन डॉलर का कर्ज था, जिनमें से लगभग 20 प्रतिशत, 8.25 बिलियन डॉलर का विदेशी कर्ज अकेले अंबानी एवं अडानी समूह पर है। इसी प्रकार देश के 7 उद्योग समूहों पर 13 लाख करोड़ का आंतरिक कर्ज है। इसमें से भी लगभग 5 लाख करोड़ का कर्ज इन दो व्यापारिक घरानों के ऊपर है। हालांकि आंतरिक कर्ज में टाटा 2.9 लाख करोड़ लार्सन एंड टर्बो 1.63 लाख करोड़ के बड़े कर्ज दाता हैं। इन उद्योगपतियों के समय पर ऋण अदायगी भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा देगी।
सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश में हताशा
वर्तमान में अर्थव्यवस्था पर बन रहे दबाव का समाधान हम सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बिक्री से ढूंढ रहे हैं । लेकिन यहां भी लगातार लक्ष्य के विपरीत निराशा हाथ लग रही है। भारत में वर्ष 1991 तक सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार किया। देश में 359 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हैं, जिनमें से 18 उपकर्मों को नवरत्न कंपनी की संज्ञा से नवाजा गया है। इन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की बिक्री से भारत एक बड़ी धनराशि की उम्मीद लगा रहा है। वर्ष 1991 से 2014 तक सार्वजनिक क्षेत्र की बिक्री से 1 लाख 52 हजार 781 करोड़ रुपये जुटाए गए। वहीं 14 से 2021 की अवधि में दूने से अधिक 3 लाख 61 करोड़ रुपये जुटाए गए।
यहां भी लक्ष्य के विपरीत बहुत कम राशि के प्राप्त होने से विनिवेश क्षेत्र में भी संकट उत्पन्न हो रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र की बिक्री से वर्ष 2019-20 में 1 लाख 5 हजार करोड़ का लक्ष्य था, जिसके विपरीत मात्र 65 हजार करोड रुपये जुटाए गए। वर्ष 2020-21 में 2 लाख 10 हजार करोड़ रुपए का लक्ष्य था, उसके विपरीत 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपये जुटाए गए , वर्ष 2021-22 में 1 लाख 75 हजार करोड़ के विपरीत मात्र 13 हजार करोड़ रुपये जुटाए गए हैं, जिसने विनिवेश के क्षेत्र में हताशा उत्पन्न की है। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों से 2025 तक 6 लाख करोड रुपए विनिवेश से जुटाने का लक्ष्य है, जिसकी प्राप्ति के आसार अब नहीं दिखते। अर्थव्यवस्था के लिए यह भी एक बड़ा संकट है।
घटता रोजगार, बढती निराशा
आज भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा संकट तेजी से कम होता रोजगार है। जिन सरकारी नौकरियों का हम सबसे ज्यादा भरोसा करतें हैं, वह तेजी से घट रही हैं। 2014 में जो 13 लाख 50 हजार केंद्र सरकार की नौकरियां थी, घटकर अब 9 लाख रह गर्इं हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में 50 प्रतिशत से अधिक ठेका कर्मी नौकरी में लग गए हैं। असंगठित क्षेत्र में निर्माण और उत्पाद रोजगार उपलब्ध कराने वाले बड़े क्षेत्र हैं, इसमें निर्माण क्षेत्र में 8 करोड़ रोजगार की बजाय मात्र 5.5 करोड़, उत्पाद क्षेत्र में 5 करोड़ से मात्र 2 करोड़ 70 लाख लोग रोजगार में रह गए हैं।
जीएसटी के बाद 6 करोड़ इकाइयां जो कुटीर उद्योग के अंतर्गत आती थीं, कहीं पंजीकृत नहीं हुर्इं, जबकि 6 लाख लघु उद्यम इकाइयां अपना रोजगार कर पाई हैं अथवा नहीं इसका कोई विवरण नहीं है। इन सब कारणों ने बेरोजगारी का स्तर ऐतिहासिक स्तर तक पहुंचा दिया है। काम योग्य युवाओं में रोजगार के प्रत्याशा 55 से घटकर मात्र 40 प्रतिशत रह गई है।
इस प्रकार ठीक मंदी से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ बड़े होल्स दिखाई दे रहे हैं, जिनका मनोवैज्ञानिक जतन किया जाना आवश्यक है, अन्यथा मंदी की समस्या भारत पर और अधिक भारी पड़ सकती है।


