Sunday, April 26, 2026
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गांधी के सामने फिर से सावरकर

Ravivani 33


विवेकानंद माथने |

‘हे राम’ गांधी की अंतिम पुकार थी। कट्टरपंथी हिंदुत्ववादियों ने साजिश रची और सनातनी गांधी की हत्या को अंजाम दिया। आज भी जब गांधी की बात आती है, हिंदू कट्टरपंथी गांधी के सामने सावरकर को खडा करने की कोशिश करते हैं। हमें समझना होगा कि आखिर सावरकर गांधी के विरोधी क्यों थे और उन्होंने गांधी की हत्या क्यों करवाई? दोनों हिंदू थे। दोनों बैरिस्टर थे। जैसे गांधी का उद्देश्य हिंदुस्थान की आजादी था, वैसे ही शुरू में सावरकर का उद्देश्य भी हिंदुस्थान की आजादी ही था। फिर दोनों के बीच किस बात का संघर्ष था?

सन 1888 में 19 साल के गांधी बैरिस्टर बनने के लिए लंदन गये थे। बाद में वकालत के लिए 1893 में दक्षिण अफ्रीका गए। वहां हिंदुस्थानियों पर हो रहे अन्याय के खिलाफ अंग्रेजी सरकार से संघर्ष किया। दक्षिण अफ्रीका के आंदोलन में सत्याग्रह के नये-नये प्रयोग किये और सन 1915 में वे भारत में लौट आए। 1920 से जीवन के अंतिम क्षण तक गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया।

गांधी अंग्रेजी हुकूमत के साथ-साथ उनकी साम्राज्यवादी, भौतिकवादी सोच से मुक्ति चाहते थे। अंग्रेजियत से मुक्ति चाहते थे। गांधी का अंतिम ध्येय शोषणमुक्त, अहिंसक समाज की स्थापना करना था और उसे सत्य और अहिंसा के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, ऐसा उनका अदम्य विश्वास था। अपना पूरा जीवन उन्होंने इसी साधना में लगाया। 1909 तक उनके मन में ‘हिंद स्वराज’ की तस्वीर तैयार हो चुकी थी।

दूसरी तरफ, 1906 में 23 साल के सावरकर बैरिस्टर बनने के लिए भाई के साथ लंदन गए। बैरिस्टर बने। अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए तत्कालीन क्रांतिकारियों की तरह सशस्त्र क्रांति का सपना देखा। हिंदुस्थान और दुनिया में क्रांति का इतिहास पढ़कर सशस्त्र कांति के द्वारा ही आजादी मिल सकती है, ऐसा उनका विश्वास था। लंदन में वे क्रांतिकारी समूह में शामिल हुए। तत्कालीन परिस्थिति में अंग्रेजी हुकूमत का सामना करना साधारण कार्य नहीं था। सावरकर तर्कशील, उत्कृष्ट वक्ता और लेखक थे, लेकिन हिंसा और साम, दाम, दंड, भेद की नीति पर उनका विश्वास था।

अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए हिंसक गतिविधियां करने हेतु सावरकर विदेश से हिंदुस्थान हथियार भेजते थे, लेकिन नासिक कलेक्टर जैक्सन की हत्या में सावरकर के द्वारा भेजा पिस्तौल प्राप्त होने से 1909 में वे पकडे गए। ‘राजद्रोह’ और ‘राजा के विरुद्ध उकसाने’ के आरोप में उन्हें और उनके भाई को 1910 में पहली और 1911 में दूसरी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। ‘कालापानी’ की सजा के लिए उन्हें अंदमान के ‘सेल्यूलर जेल’ भेजा गया। उनकी संपत्ति जब्त की गई। 1921 तक वे ‘सेल्यूलर जेल’ में रहे, 1921 और 1922 में अलीपुर और रत्नागिरी में कारावास में रखा गया। 6 जनवरी 1924 से रत्नागिरी में नजरकैद रहे। 1937 में नजरबंदी से पूर्णत: रिहा हुए और 1937 से 6 साल वे हिंदू-महासभा के अध्यक्ष रहे।

1911 से लेकर 1920 तक जेल से रिहाई के लिए उन्होंने अंग्रेजी सरकार से अनेक माफीनामे लिखे। जनवरी 1920 में उनके भाई डॉ. नारायण सावरकर ने गांधी को पत्र लिखकर सावरकर के स्वास्थ्य के लिए ‘सेल्युलर जेल’ से अन्य जगह भेजने के प्रयास के लिए विनती की। गांधी ने मई 1920 में ‘यंग इंडिया’ में निवेदन जारी किया था। अंग्रेजी हुकूमत की मुखालिफत न करने और किसी भी राजनीतिक आंदोलन में शामिल न होने की शर्त पर सावरकर को 1921 में ‘सेल्यूलर जेल’ से हिंदुस्थान की जेल भेजा गया।

आज भी यह सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर माफी के लिए सावरकर ने प्रयास क्यों किया? क्या वे मौत से डर गए थे? या फिर जेल से रिहाई के लिए यह उनकी योजना का हिस्सा था? अगर वे डर गए थे तो उनके वीरत्व पर प्रश्न उठता है और अगर यह उनकी कूटनीतिक योजना का हिस्सा था, तब भी उन पर सवाल उठता है। जेल से रिहाई के बाद उन्होंने रिहाई की शर्तों का पूरा पालन किया और जीवन भर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया, बल्कि अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति अपनाकर उन्होंने आजीवन हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ खड़ा करने का काम किया।

एक मार्च 1927 को गांधी बीमार सावरकर से रत्नागिरी में मिलने गए और कहा कि आप जानते ही हैं कि सत्यप्रेमी तथा सत्य के लिए प्राण तक न्यौछावर कर सकने वाले व्यक्ति के रूप में आपके लिए मेरे मन में कितना आदर है। हम दोनों का ध्येय भी एक ही है और मैं चाहूंगा कि उन सभी बातों के संबंध में आप मुझसे पत्र व्यवहार करें, जिन पर आपका मुझसे मतभेद है और दूसरी बातों के बारे में भी लिखें। मैं जानता हूं कि आप रत्नागिरी से बाहर नहीं जा सकते, इसलिये यदि जरूरी हो तो इन बातों पर जी भरकर बातचीत करने के लिए मुझे दो-तीन दिन का समय निकालकर आपके पास रहना भी नहीं अखरेगा। सावरकर ने इसके लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि आप स्वतंत्र हैं और मैं बंधन में हूं। मैं आपको भी अपनी जैसी हालत में नहीं डालना चाहता, फिर भी मैं आपसे पत्र व्यवहार अवश्य करुंगा।

शंकरराव देव को 20 जुलाई 1937 में लिखे पत्र में गांधी कहते हैं कि सावरकर बंधु कम-से-कम यह तो जानते हैं कि हममें चाहे कुछ सिद्धांतों को लेकर जो भी मतभेद रहे हों, लेकिन मेरी कभी यह इच्छा नहीं हो सकती कि वे जेल में ही पड़े रहें। जब मैं यह कहूंगा कि मेरी ताकत में जो कुछ भी था, वह सब मैंने उनकी रिहाई के लिए अपने ढंग से किया तो शायद डॉ. सावरकर भी मेरी बात का अनुमोदन करेंगे। बैरिस्टर को शायद याद होगा कि जब पहली बार हम लंदन में मिले थे, तब हमारे संबंध कितने मधुर थे और कैसे जब कोई आगे नहीं आ रहा था तब मैंने उस सभा की अध्यक्षता की थी, जो उनके सम्मान में लंदन में हुई थी। हरिभाऊ फाटक को 12 अक्टूबर 1939 को लिखे पत्र में गांधी कहते हैं कि सावरकर का मन जीतने का मैंने विशेष रुप से प्रयास किया, किंतु असफल रहा। सावरकर पर आरोप था कि गांधी हत्या में वे शामिल थे और उनके उकसाने पर ही गोडसे ने गांधी की हत्या की। भले ही सबूतों के अभाव में उनका हत्या में शामिल होना साबित नहीं हुआ हो, लेकिन उनके द्वारा जीवन भर गांधीजी का विरोध और तत्कालीन घटनाक्रम के आधार पर उन्हें आरोपमुक्त नहीं किया जा सकता।

गांधी और सावरकर, दोनों ने हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन किया था। धर्मग्रंथों को दोनों ने अपने-अपने नजरिये से देखा, समझा और उन पर अमल किया। गांधी ने उसमें सत्यवचनी राम, हरिश्चंद्र पाया। गीता में अहिंसा का संदेश पाया, आत्मा का अमरत्व पाया। सावरकर ने उनमें उद्देश्य प्राप्ति के लिए हिंसा देखी, असत्य देखा, छल-कपट देखा, साम, दाम, दंड, भेद देखा। हिंदू धर्मियों को यह समझना होगा की वे राम, कृष्ण, पांडवों के पक्ष में खडे हैं कि रावण, कंस, दुर्योधन के पक्ष में। गांधी ने सत्य, अहिंसा, निर्भयता अपनाकर सिद्ध किया कि वे राम के प्रतिनिधि थे।


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