Tuesday, February 3, 2026
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कॉरपोरेट के हाथों मजबूर बजट

लंदन में वित्त मंत्री बजट भाषण देने जा रहे थे। सामने विपक्षी सांसद सिगरेट पीते दिखे, उन्होंने कहा – आज जितना पीना है पी लो कल से मुश्किल होगी। वित्त मंत्री पर बजट प्रस्ताव को लीक करने का आरोप लगा और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। हमारे यहां लीक होने पर तो क्या, पूरा तला फट जाए तो भी इस्तीफा नहीं होता। इस्तीफा न जाने कब हुआ था, अब तो यह भी याद नहीं। वैसे इस्तीफा ऐरा गेरा नहीं देता। इस्तीफा देने वाली पीढ़ी अब खत्म हो चुकी है।
वर्ष 2026 के बजट से मैं नाउम्मीद नहीं हुआ क्योंकि मैं जानता था कि चुनावी वर्ष न हो तो बजट से कोई उम्मीद भी नहीं रखना चाहिए। आयकर में छूट के लिए हमें सबसे बड़े सूबे के चुनाव या आम चुनाव का इंतजार करना होगा। यह शायद देश का पहला बजट है जिसमें किसान, सिंचाई, खाद, खेती और खेतिहर मजदूर का जिक्र भी नहीं है। ऐसा लगा कि यह मजबूत नहीं कॉरपोरेट के हाथों मजबूर बजट है। इस बजट से हमें ज्ञान मिला कि देश में कोई गरीब नहीं है क्योंकि ये गरीब लोग सोना चांदी खरीद रहे हैं। यही गरीब लोग पांच किलो अनाज भी मुफ्त ले रहे हैं। बजट के बाद सेंसेक्स और रुपए का गिरना एक शुभ संकेत है, ऐसा भूतपूर्व विपक्षी नेताओं का विचार हो सकता है। आज के तमाम बड़े नेता सचमुच बड़े अर्थशास्त्री हैं यकीन न हो तो उनके 2014 के पहले के बयानों पर गौर फरमाइए।

जो भी सरकार भूतकाल की गलतियां बताए और भविष्य के सपने दिखाए तो जान लीजिए कि वह सरकार वर्तमान में कुछ नहीं कर पा रही है। यह बजट हमें भविष्य के सुनहरे सपने दिखा रही है। यह रियल नहीं रील बजट है। इसमें युवाओं को रील बनाने की ट्रेनिंग देने का भी दावा किया गया है। सत्ता पक्ष के लिए बजट हमेशा ही दूरगामी व प्रगतिशील होता है वहीं विपक्ष के लिए प्रतिगामी व गरीब विरोधी होता है। नेता की प्रतिक्रिया सुनकर आप जान सकते हैं कि वह किधर खड़ा है।

सबको समान समझने व मानने वाले को समाजवादी कहा जाता है। गुड्स एवं सर्विस टैक्स यानी जीएसटी भी राजा और रंक सभी को समान रूप से देना पड़ता है। यानी जीएसटी एक समाजवादी कर है। जब से बजट से इस समाजवादी कर का निर्धारण हटा है, तब से बजट का मजा ही खत्म हो गया है। किसी वस्तु पर उत्पाद शुल्क यानी एक्साइज ड्यूटी या किसी सर्विस पर सर्विस टैक्स बढ़ रहा है या कम हो रहा है, इसका सबको इंतजार रहता था। सायकिल पर चलने वाला भी कार व एसी पर टैक्स कम होने की खुशी मना लेता था। अब तो सरकार थोड़ा बहुत जीएसटी कम करके महीनों अपनी पीठ ठोकती है। मीडिया भी वाह वाह करता है।

पहले लोग जानते नहीं थे कि टैरिफ क्या बला है लेकिन अब लोग जान गए हैं कि टैरिफ एक बला ही है खासकर ट्रंप टैरिफ। क्या ट्रंप टैरिफ का जवाब निर्मल टैरिफ हो सकता है शायद नहीं , कम से कम इस बजट को देखकर तो यही लगता है।

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