
इस्राइल को लंबे समय से मिल रहे अमेरिकी संरक्षण से वैसे तो पूरी दुनिया भली भांति वाकिफ है, परंतु अब इस अमेरिकी संरक्षण के चलते इस्राइल खासतौर से गजा में जिस तरह मानवता की लगातार बर्बर हत्या करता जा रहा है उसे देखकर दुनिया के अधिकांश देश न केवल इस्राइल के खिलाफ होते जा रहे हैं, बल्कि उन्हें इस्राइल को दिया जाने वाला अमेरिकी संरक्षण भी अब रास नहीं आ रहा है। वास्तव में शांतिप्रिय मध्य एशिया में तबाही, बर्बादी व अशांति की इबारत लिखने वाला अमेरिकी संरक्षित इस्राइल ही है।
खबर है कि गजा में गजा ह्यूमनटेरियन फाउंडेशन (जीएचएफ) की ओर से बांटा जा रहा खाना बहुत कम लोगों तक पहुंचने के कारण वहां भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है। कई बार ऐसी अमानवीय घटना भी घटी कि जब जीएचएफ के भोजन वितरण केंद्र पर मदद लेने के लिए भूख से तड़पते बच्चे व महिलाएं भोजन की खातिर आकर लाइन में लगे उसी समय उन पर इस्राइली सुरक्षा बलों ने गोलियां चला दीं जिससे दर्जनों लोग मारे गए। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के अनुसार पिछले दो महीनों में भोजन हासिल करने की कोशिश कर रहे एक हजार से अधिक फिलस्तीनी, इस्राइली हमलों में मारे जा चुके हैं। इनमें से कम से कम 766 लोगों की मौत उन चार वितरण केंद्रों के आसपास हुई है, जिन्हें जीएचएफ संचालित करता है। इसके अलावा 288 लोगों की मौत संयुक्त राष्ट्र और अन्य सहायता केंद्रों के पास हुई है। सौ से अधिक सहायता संगठनों और मानवाधिकार समूहों का कहना है कि गजा में बड़े पैमाने पर मानव जनित भुखमरी फैल रही है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों ने इन हालात के लिए इस्राइल को जिÞम्मेदार ठहराया है क्योंकि वही फिलस्तीनी क्षेत्रों में भेजी जाने वाली सप्लाई को नियंत्रित करता है। आम लोग ही नहीं बल्कि गजा में युद्ध की रिपोर्टिंग करने वाले अनेक स्थानीय व विदेशी पत्रकार व उनका परिवार भी भुखमरी का सामना करने को मजबूर हैं। कुछ पत्रकार तो इस हद तक असहाय हो चुके हैं कि वे अपने मासूम असहाय बच्चों व परिवार के लिए भोजन तक नहीं जुटा पा रहे हैं। गजा में काम करने वाले कुछ पत्रकार तो अपनी जान की बाजी लगाकर लाइनों में लगकर चैरिटी किचन से खाना ले रहे हैं। उनके बच्चे दिन में सिर्फ एक बार दाल, चावल या पास्ता खा कर गुजारा करने को मजबूर हैं। कुछ पत्रकारों ने तो यहाँ तक बताया कि उन्होंने भूख दबाने के लिए नमक मिला पानी पीना शुरू कर दिया है।
जरा सोचिये जिन पत्रकारों की बदौलत दुनिया को इस्राइली सेना के जुल्म और गजा के लोगों की बेबसी व बर्बादी की खबर सुनाई व दिखाई देती थी, अगर वही पत्रकार व उनका परिवार सुरक्षित नहीं रहेगा तो अमेरिकी संरक्षित इस्राइल के काले करतूत दुनिया तक कैसे पहुंचेंगे? इन्हीं हालात में अनेक अंतर्राष्ट्रीय राहत संगठन और मानवाधिकार समूह बड़े पैमाने पर भुखमरी फैलने की चेतावनी दे रहे हैं। अमेरिका को सर्वशक्तिमान मानने वाले व अमेरिकी रहमो करम पर जीने वाले कुछ अमेरिकी पिट्ठू देशों की शासकों व तानाशाहों की बात छोड़ दें तो पूरा विश्व खासकर मध्य एशियाई देश इस बात को समझ चुके हैं कि अब समय आ गया है कि किसी भी तरह इस्राइल को सबक सिखाया जाए और मध्य एशियाई क्षेत्रों को अमेरिकी हस्तक्षेप से मुक्ति दिलाई जाए। ईरान का भय दिखाकर सुन्नी शिया मतभेदों को बढ़ावा देना दरअसल अमेरिका की सुन्नी देशों के प्रति हमदर्दी नहीं बल्कि एक बड़ी चाल है जिसे मुस्लिम जगत अब बखूबी समझ चुका है।
मध्य एशियाई क्षेत्रों को अमेरिका से मुक्त कराने के शुरुआती संकेत मिलने लगे हैं। ईरान ने गत 23 जून को कतर की राजधानी दोहा स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे पर मिसाइलें दाग कर तथा इराक और सीरिया में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना कर यह चेतावनी दे दी है कि अमेरिकी सैन्य अड्डे मध्य एशियाई क्षेत्रों में सुरक्षित नहीं हैं।
साथ ही इराकी प्रतिरोध समूहों, विशेष रूप से कताइब हिजबुल्लाह, ने इराकी सरकार को यह चेतावनी जारी कर दी है कि वह अमेरिकी सेना को दो महीने के भीतर बगदाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और ऐन अल-असद बेस जैसे इराकी सैन्य ठिकानों, से पूरी तरह से हटने के लिए कहे। इराकी प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल-सुदानी को इस संबंध में पहले से सहमति के आधार पर कार्रवाई करने के लिए ‘पर्याप्त समय’ दिया गया था। सितंबर 2025 के अंत तक अमेरिका को इराक छोड़ने की चेतावनी दे दी गयी है। चेतावनी में कहा गया है कि अगर यह कार्रवाई समय सीमा में पूरी नहीं हुई, तो उनकी ‘अलग राय’ होगी, हालांकि उन्होंने ‘अलग राय’ को स्पष्ट नहीं किया। अनेक छोटी बड़ी घटनाओं व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रही गोलबंदी को देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि मध्य एशिया अमेरिकी हस्तक्षेप से मुक्ति के प्रयास की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

