
राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत की आबादी का लगभग आधा हिस्सा (करीब 48 प्रतिशत) होने के बावजूद महिलाएं सकल घरेलू उत्पाद में केवल 18 प्रतिशत का ही योगदान देती हैं। इस अंतर को ग्रामीण महिलाओं के सामने आने वाली विभिन्न चुनौतियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिसमें सांस्कृतिक बाधाएं, सीमित अवसर, शिक्षा की कमी और ऋण तक सीमित पहुंच शामिल है।
एक रिपोर्ट कहती है कि इस लैंगिक अंतर को पाटने से साल 2025 तक भारत की जीडीपी में 18 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। यह एक सक्षम वातावरण बनाने के महत्व को रेखांकित करता है, जो महिलाओं को उनकी पूरी क्षमता तक पहुंचने के लिए सशक्त बनाता है। उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को पहचानते हुए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन जैसी कई पहलों को इस अंतर को पाटने और ग्रामीण महिलाओं के लिए आजीविका के अवसरों का विस्तार करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
हमें इस बात को समझने की जरूरत है कि जलवायु परिवर्तन भी ग्रामीण महिलाओं को प्रभावित कर रहा है। असल में ग्रामीण महिलाएं अक्सर दुनिया के गरीब तबकों में से होती हैं और अपनी रोजी-रोटी के लिए स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर ज्यादा निर्भर रहती हैं। इस प्रकार के परिवर्तन से घरेलू जल, भोजन और ईंधन की सुरक्षा पर असर पड़ता है, जिनके लिए महिलाएं भी जिम्मेदार होती हैं।
सूखे और बारिश में अनियमितता की वजह से महिलाओं को पानी और ईंधन इकट्ठा करने में अधिक समय बिताना पड़ता है। इससे फसलों और पशुओं की सेहत पर भी असर पड़ता है, जिससे महिलाओं को कम भोजन के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। सामाजिक संरचनाओं, भेदभावपूर्ण मानदंडों और संस्थाओं की वजह से महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक घरेलू काम और बच्चों की देखभाल का बोझ उठाना पड़ता है। इससे उनकी नौकरी पाने के अवसर सीमित हो जाते हैं।
जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिए ग्रामीण महिलाओं को नेतृत्वकर्ता बनाया जा सकता है। इसके लिए उन्हें कौशल, क्षमताएं, संपत्तियां और संसाधन दिए जा सकते हैं। इसके साथ ही लिंग-केंद्रित सार्वजनिक नीतियां भी बनाई जा सकती हैं। इन नीतियों से ग्रामीण महिलाओं की क्षमताओं को कम करने वाले अंतर को घटाने में मदद मिल सकती है। पिछले एक दशक से भी अधिक समय से ग्रामीण महिलाओं के लिए आजीविका कार्यक्रमों ने उनके समुदायों में असाधारण योगदान दिया है।
ग्रामीण महिलाओं के अथक प्रयासों को मान्यता देना दूसरों को प्रेरित करता है। यह एक लहर जैसा प्रभाव पैदा करता है, जिससे अधिक टिकाऊ आजीविका वाले भविष्य की दिशा में बहुत जरूरी बदलाव होता है। हालांकि सरकार अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं, लेकिन आम आदमी के सामाजिक सरोकारों के बिना लक्ष्यों को हासिल कर पाना आसान नहीं है।
महिलाओं को अधिक समतापूर्ण समाज के लिए सशक्त बनाने के अलावा हमें उनकी आजीविका पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर भी विचार करना चाहिए। अप्रत्याशित मौसम की घटनाएं, बढ़ता तापमान और बारिश के बदलते पैटर्न तेजी से परिदृश्य को बदल रहे हैं, जो एक बड़े खतरे की ओर संकेत कर रहे हैं। हाल ही में कॉप 28 सम्मेलन में भी जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई है।
इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन लिंग तटस्थ नहीं है। असल में आजीविका पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को देखने के लिए हमें ग्रामीण भारत की ओर रुख करना होगा। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आजीविका कार्यक्रमों पर चर्चा हो रही है और वहां बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। इसी तरह अन्य राज्यों में भी आजीविका कार्यक्रमों के अप्रत्याशित परिणाम देखने को मिल रहे हैं। हालांकि अभी भी प्रयासों में और तेजी लाए जाने की दरकार है, जिसके लिए हमें कदम उठाने होंगे।
इस तरह के कार्यक्रमों से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि हम अब केवल बाधाओं को तोड़कर महिलाओं को सशक्त नहीं बना रहे हैं, बल्कि एक नई लड़ाई का सामना कर रहे हैं। यह लड़ाई है बदलती जलवायु के सामने उनकी आजीविका को बनाए रखना। यह कहीं अधिक कठिन चुनौती भरा काम है। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की एक रिपोर्ट कहती है कि महिला प्रधान ग्रामीण परिवार जलवायु परिवर्तन के झटकों के दौरान असामान्य रूप से प्रभावित होते हैं। एक डिग्री तापमान बढ़ने का अर्थ है पुरुष प्रधान परिवारों की तुलना में उनकी आय में 34 प्रतिशत की भारी गिरावट।
इससे एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि इस वैश्विक परिवर्तन को देखते हुए राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं में अक्सर इन सबसे अधिक जोखिम वाले समुदायों का समर्थन करने के लिए ठोस कार्रवाई की कमी क्यों होती है? जलवायु परिवर्तन नीति निर्माण में महिलाओं का अक्सर कम प्रतिनिधित्व क्यों होता है? जलवायु परिवर्तन केवल असमानता को और बढ़ा रहा है। इन बातों पर अक्सर चर्चा कम होती है, जो कि ज्यादा होनी चाहिए।
एफएओ की रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण लोगों पर जलवायु परिवर्तन के असमान प्रभावों का समाधान करने में विफलता संपन्न और निर्धन लोगों के बीच तथा पुरुषों और महिलाओं के बीच पहले से मौजूद बड़े अंतर को और अधिक बढ़ा देगी। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में ग्रामीण तथा महिला-प्रधान परिवारों को आपदा आने पर पुरुषों की तुलना में पहले से ही अधिक वित्तीय बोझ का सामना करना पड़ता है।
यदि वेतन में इन महत्वपूर्ण मौजूदा अंतरों को दूर नहीं किया गया, तो यह अंतर और भी अधिक बढ़ जाएगा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वर्तमान वैश्विक तापमान 1800 के दशक के अंत की तुलना में कुल मिलाकर लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक है, जिसके कारण बाढ़, तूफान और गर्म लहरों जैसे विनाशकारी मौसम में लगातार वृद्धि हो रही है। एफएओ ने कहा कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील हैं, क्योंकि सामाजिक संरचनाएं तथा भेदभावपूर्ण मानदंड और संस्थाएं बहुत गहरी जड़ें जमा चुके हैं। इनसे लड़ पाना आसान नहीं है।
ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवारों की संसाधनों, सेवाओं और नौकरियों तक पहुंच सीमित है, जिससे उनके लिए जलवायु परिवर्तन का सामना करना कठिन हो सकता है। औसतन गर्मी के कारण वे धनी परिवारों की तुलना में पांच प्रतिशत अधिक आय खो देते हैं तथा बाढ़ के कारण चार प्रतिशत से अधिक आय खो देते हैं। महिलाओं द्वारा संचालित घरों पर तो और भी अधिक बुरा असर पड़ता है।
पुरुषों द्वारा संचालित परिवारों की तुलना में अत्यधिक गर्मी के कारण उनकी आय में लगभग आठ प्रतिशत अधिक की हानि होती है तथा बाढ़ के कारण तीन प्रतिशत अधिक हानि होती है। यह रिपोर्ट हमें इस बात पर सोचने के लिए मजबूर करती है कि आखिर हम जलवायु परिवर्तन से ग्रामीण महिलाओं की सुरक्षा किस तरह से कर सकते हैं? बड़ा सवाल ये भी है कि आखिर क्या हम सुरक्षा कर भी पाएंगे या नहीं? अगर नहीं कर पाए तो इन महिलाओं का भविष्य क्या होगा?


