Friday, March 6, 2026
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बच्चों को भी देना चाहिए सम्मान

सिद्धार्थ ताबिश

मेरा बड़ा बेटा इस बात को सुनकर बड़ा हैरान होता है कि मेरे पापा बचपन में हम लोगों को छोटी छोटी बात के लिए पीट दिया करते थे। वो इमेजिन ही नहीं कर पाता कि क्यूं लोग अपने बच्चों को बात बात पर मारते हैं। मुझ से पूछता है अच्छा आपके नए शूज फट गए थे, खेलते टाइम इस बात के लिए आपको मार पड़ी थी? मगर शूज तो फटते ही हैं और इसमें आपकी कोई गलती तो थी नहीं, फिर क्यूं मारा दादा ने?

मेरे बेटे को मध्यम वर्गीय परिवार की कुंठाओं के कारण नहीं पता हैं। उसे ये नहीं पता कि मेरे पिता की ही नहीं, भारत के मध्यम वर्गीय परिवार के लगभग हर पिता और माता की यही दास्तान है.. उनका स्वयं का जीवन कोई जीवन होता ही नहीं है। सिर्फ समझौते होते हैं उम्र भर और फिर उन्हीं समझौतों से वो इतने ज्यादा कुंठित होते हैं कि न तो खुद जी पाए होते हैं और न ही किसी को जीने देते हैं। अब तो फिर भी फिल्मों और सोशल मीडिया से कुछ इनकी सोच में परिवर्तन आ रहा है मगर बीस तीस साल पहले तो हालात बहुत ही बुरे थे।

मां बाप ही नहीं, स्कूल के टीचर भी इस तरह की मार पीट करते थे बच्चों के साथ, जैसे आजकल थाने में भी नहीं होती है। स्कूल, खासकर सरकारी स्कूल बच्चों के लिए पूरा टार्चर कैम्प होते थे और परिवार वाले जो खुद बात बात पर बच्चों को मारना पसंद करते थे, स्कूल में भी टीचरों की मार पर मौन रहते थे। मुझे याद है कि मेरे स्कूल में किस तरह के कुंठित टीचर होते थे जिनका काम ही सिर्फ बच्चों में टेरर फैलाना होता था। एक दो टीचरों को छोड़कर बहुसंख्यक कुंठित और पागलपन की हद तक हिंसक होते थे।

बाद में जब लोग थोड़े संवेदनशील हुए तब सरकार ने इस बात का संज्ञान लिया और ये पाया कि स्कूल में हिंसा का लेवल पागलपन की हद तक है और फिर ये नियम जारी किया गया कि कोई भी बच्चों को मारेगा नहीं, चाहे वो पढ़ें या न पढ़ें.. फेल हों या पास.. आपका काम है बस पढ़ाना.. जो पढ़ता है पढ़े, न पढ़ता हो तो न पढ़े।

भारतीय मध्यम वर्ग के हिसाब से बच्चों का आत्मसम्मान नाम की चीज ही नहीं होती है। ये कुंठित होते हैं तो मनोरंजन के लिए बच्चे पैदा कर लेते हैं। बच्चा पैदा करना इनके लिए सबसे बड़ा अचीवमेंट होता है और इन्हें लगता है कि इन्होंने कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया ही बच्चा पैदा करके। तो जब ये खुद को एकदम भगवान या क्रिएटर समझने लगते हैं बच्चों का तो जाहिर है इनके बच्चे इनके प्रोडक्ट, गुलाम और बंधुवा मजदूर होते हैं। फिर जब ये टीचर बन जाते हैं तो दूसरों के बच्चे भी इनके लिए वही सब होते हैं इसलिए ये अपना हर गुस्सा अपने गुलामों पर निकालते हैं। इनके लिए बच्चा मतलब जिसके पास न तो समझ है, न दिमाग है और न अपनी सोच है। ये उसे कहीं भी पकड़ के कुछ भी करवाने लग जाते हैं।

मेरे छ: साल के चीकू को जब मेरे एक मिलने जुलने वाले की मां ने जबरदस्ती अपने पास गोद में बिठा लिया और गाल नोच के किस किया तो चीकू को इतना ज्यादा गुस्सा आ गया कि वो वहीं पर बिफर पड़ा। खूब जोर से उसने गुस्सा किया और चिल्ला चिल्ला के रोने लगा। वो कहने लगीं कि ‘इसको गुस्सा बहुत है रे बाबा’। मगर हम लोग चुप रहे। उनके हिसाब से बच्चों से वो किसी भी तरह की हरकत करें, गाल नोचें, जबरदस्ती गोद मे बिठा लें तो वो सब सही है। हां, कोई राह चलता लड़का इनसे बिना पूछे ‘इनको’ सीटी भी मार दे तो उसके घर तक पहुंच जाएंगी लड़ने.

मैं अपने बच्चों को उतनी ही रेस्पेक्ट देता हूं जितना बड़ों को देता हूं। मेरी पत्नी और मेरा पूरा घर, मेरे भाई बहन सब मेरे बच्चों को पूरा सम्मान देते हैं.. ये बात कुछ लोगों को खलती है मगर हम इसकी परवाह नहीं करते। मुझे अगर घर, जमीन या गाड़ी भी खरीदनी होती है तो बिना अपने दोनों बच्चों से पूछे नहीं खरीदता। मेरे दोनों बच्चों को सब पता होता है और वो इस तरह के बड़े फैसलों में भी पूरा इंटरेस्ट लेते हैं और हमारे साथ बैठ के उस बारे में बात करते हैं। मारना दो दूर, अगर मैं अपने बच्चों को उनकी गलती पर सिर्फ घूर दूं तो वही उनके लिए बहुत हो जाता है और वो उस काम को दोबारा नहीं करते हैं।

वो बातें समझते हैं और बातों से ही हम उन्हें समझाते हैं.. ऐसा नहीं है कि हम लोग अपने बच्चों पर कभी गुस्सा नहीं होते हैं, होते हैं, मगर किसी कुंठा के तहत नहीं कि हम पति पत्नी की आपस मे लड़ाई हो और हम अपने बच्चों को पीट दें। बच्चों को सम्मान देना सीखिए.. सम्मान दीजियेगा तो आपको धर्म ग्रंथों में ये नहीं लिखना पड़ेगा कि मां के पैर नीचे जन्नत होती है। आप सम्मान देंगे उन्हें बचपन से तो वो बुढ़ापे तक आपको सिर्फ सम्मान और प्यार ही देंगे, इसके सिवा कुछ नहीं। वो धर्म की लालच और भगवान के डर से आपकी सेवा नहीं करेंगे बल्कि वो अपने स्वविवेक से आपकी सेवा करेंगे और आपको सम्मान देंगे क्यूंकि बचपन से वही आपने उनको दिया होगा

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