- घटते चले गए दर्शक और बिकते चले गए शहर के सिनेमा हाल
- कंबल और रजाइयों के साथ आया करते थे सिनेमा हाल में फिल्म देखने
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: 80 के दशक और उसके कुछ बाद तक मेरठ और यहां के फिल्म प्रेमियों का नाम मुंबई फिल्मी नगरी में बेहद सम्मान से लिया जाता था। एक वो भी दौर था जब मेला नौचंदी के दौरान मेरठ के कई सिनेमा हालों में छह-छह शो चलती थे और सभी हाउसफुल जाते थे। तब के सिनेमाघरों ने कई फिल्मों की जुबली, सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली करायी थीं। इन सिनेमाघरों में मेनका, अप्सरा, निगार और फिल्मिस्तान का नाम शुमार किया जाता था। हालांकि कई सिनेमा हाल इनसे भी काफी पुराने थे, लेकिन वो वक्त के साथ बंद होते चले गए।
घटते गए दर्शक, बंद होते गए सिनेमा हाल
इसकी वजह दर्शकों की संख्या में कमी की वजह और विकसित होते मल्टीप्लेक्स के कारण पुराने सनेमाघर खंडहर बनते चले गए। उनका स्वरूप ही बदल दियाग या। जैसा कि निगार के साथ हुआ और फिर बाद में अप्सरा तो पूरी तरह से कॉम्प्लेक्स बना दिया गया। दर्शकों की कमी के कारण ही अप्सरा सिनेमा को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया था। बाद में इसकी बिल्डिंग को तोड़ दी गयी और यहां अब एक कॉम्प्लेक्स है जो कुछ साल पहले ही शुरू हुआ है। अप्सरा शहर के पुराने सिनेमाहाल में था। अप्सरा नाम से इसकी शुरुआत 1964 में हुई। अप्सरा से पहले इसे नावल्टी, आनंद और रामनिवास हाल के नाम से जाना जाता था।
आनंद हाल के नाम से मशहूर रहे अप्सरा सिनेमा में बड़े-बडेÞ फिल्म कलाकार थिएटर किया करते थे। एक जमाने में सिने जगत के स्तंभ माने जाने वाले पृथ्वीराज कपूर अपनी टीम के साथ इसी आनंद हाल में थिएटर करने आया करते थे। अप्सरा सिनेमाहाल का इतिहास 100 साल से भी पुराना है। इसकी शुरुआत वर्ष 1898 में रामनिवास हाल के नाम से हुई थी। इसके सुनहरे पन्नों पर न जाने कितने ही बालीवुड कलाकारों के नाम दर्ज हैं। इन कलाकारों ने यहां आकर न सिर्फ अभिनय किया, बल्कि फिल्में भी देखीं। सुनील दत्त, राजेश खन्ना और चेतन आनंद फिल्म आखिरी खत की रिलीज के समय यहां आए थे।
खो गए वक्त की गर्द में
शहर के कई रूपहले पर्दे वक्त की गर्द में खो गए। हालांकि इनका इतिहास गोल्डन रहा है। मेनका जैसा सिनेमा हाल शोले जैसी गोल्डन जुबली फिल्म का गवाह बना। केवल मेनका ही नहीं तमाम पुराने सिनेमा हाल ऐसे हैं, जिनकी जब बात की जाती है तो पुराने लोगों के चेहरे आज भी चमक जाते हैं। वो इनसे जुड़ी यादे साझा करते हैं। मेरठ के सिनेमाहालों का इतिहास सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। एक जमाने में सिंगल स्क्रीन सिनेमाहाल की चकाचौंध ऐसी थी कि वर्तमान के मल्टीप्लेक्स सिनेमा में उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ये सिनेमाहाल आज भले ही खंडहर या शापिंग कॉम्प्लेक्स और बरातघर बन चुके हैं।
बेहद रोचक है शहर का मुंबइया फिल्म नगरी से रिश्ता
- फिल्म मधुमति की कुछ शूटिंग नौचंदी स्थित नादिर महल में हुई। इसी महल का नक्शा बना और फिल्म पूरी हुई।
- 1970 के दशक में 21 सिनेमाघर थे। इनमें अजंतास (माधुरी), अनुराग, मधुबन, रमेश, प्लाजा (बंसल), निशात, रिवोली, रीगल (फोनिक्स), मैफेयर, नटराज, मेघदूत, नंदन, आम्रपाली, ओडियन, पैलेस, फिल्मिस्तान, निगार (सत्यम), मेहताब, मेनका, अप्सरा (नॉवल्टी) व गुलमर्ग।
- निशात में चलती थीं वी. शांताराम राजकपूर, महबूब, बीआर चोपड़ा, यश चोपड़ा की फिल्में।
- प्रख्यात अभिनेता शेखर, भारत भूषण के साथ ही दारा सिंह, जितेंद्र के कॅरियर को संवारने वाले पं. देवी शर्मा, विशाल भारद्वाज, देवेंद्र शर्मा का नाता मेरठ से ही है।
- निगार में चली मुगल-ए-आजम और मदर इंडिया के लिए एक दिन पहले रात में ही लगती थी दर्शकों की कतार।
- नंदन में हम आपके हैं कौन 60 हफ्ते चली, मेनका में लगातार एक साल (52 हफ्ते) शोले चली, निशात में 39 हफ्ते तक दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे को पसंद किया गया।
- जादूगर पीसी सरकार का 1954-55 में निशात में स्टेज शो सातों दिन हाउस फुल रहा। अप्सरा, जगत में पृथ्वीराज कपूर का पठान नाटक खूब चला।
- 1940 में जगत में हातिमताई फिल्म लगी। 7 घंटे की फिल्म को देखने के लिए लोग रजाई-गद्दे, कंबल घर से लाते थे।
- फिल्मिस्तान में नौचंदी के दौरान 1964 में जौहर महमूद इन गोवा फिल्म के एक सप्ताह तक रोजाना चले आठों शो हाउसफुल रहे। पूरे भारत में पहली बार 8 शो चले थे।
- निशात में बुधवार का मैटिनी शो (दोपहर 3 से 6) केवल महिलाओं के लिए ही होता था। इसकी मुनादी करायी जाती थी।
कितने साल पहले बंद हुआ कौन-सा सिनेमाहाल
- रिवोली – 38 साल
- ईव्ज- 33 साल
- प्लाजा सिनेमा- 28 साल
- मधुबन- 18 साल
- मैफेयर- 18 साल
- पैलेस सिनेमा- 28 साल
- नटराज- 13 साल
- आम्रपाली- 13 साल
- फिल्मिस्तान-12 साल
- मेघदूत- 18 साल
- मेनका- 20 साल
- रमेश थियेटर- 20 साल

