
यह परम्परा भी है और संस्कार भी, जयपुर के परकोटे में स्थित ताड़केश्वर मंदिर की खासियत है कि यहां शिवलिंग पर चढ़ने वाले पानी को नाली में बहाने के बनिस्पत, एक चूने के बने कुंड, जिसे परवंडी कहते हैं, के जरिये धरती के भीतर एकत्र किया जाता है। यह प्रक्रिया उस इलाके के भूजल के संतुलन को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाती है। हो सकता है कि प्राचीन परम्परा में शिवलिंग पर जल चढ़ाने का असली मकसद इसी तरह भविष्य के प्रकृति-प्रकोप के हालात में जल को सहेज कर रखना हुआ करता हो। उस काल में मंदिरों में नाली तो होती नहीं थी, यह एक सहज प्रयोग है और बहुत कम व्यय में शुरू किया जा सकता है। यदि दस हजार मंदिर इसे अपनाते हैं और हर मंदिर में औसतन एक हजार लीटर पानी प्रति दिन शिवलिंग पर आता है तो गणित लगा लें हर महीने कितने अधिक जल से धरती तर रहेगी।