जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: आज सोमवार को तमिलनाडु और (BJP) केंद्र सरकार के बीच नई शिक्षा नीति में हिंदी थोपने के लेकर छिड़े विवाद के बीच कांग्रेस नेता सोनिया गांधी (Sonia Gandhi)ने केंद्र सरकार बीजेपी पर तंज कसा है। सोनिया गांधी ने कहा कि, सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का नरसंहार समाप्त होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि, नई शिक्षा नीति का मुख्य एजेंडा सत्ता का केंद्रीकरण, व्यावसायीकरण, निवेश को निजी क्षेत्र को सौंपना तथा पाठ्यपुस्तकों का सांप्रदायिकरण करना है। यह भारतीय शिक्षा को बिगाड़ रहे हैं।
हिंदी को अनिवार्य बनाने का विरोध किया जा रहा
दरअसल,सोनिया गांधी का बयान वास्तव में उस विवाद पर प्रतिक्रिया है जो तमिलनाडु और केंद्र सरकार के बीच नई शिक्षा नीति में हिंदी को लेकर उठ खड़ा हुआ है। तमिलनाडु में विशेष रूप से हिंदी को अनिवार्य बनाने का विरोध किया जा रहा है, और वहां के लोग इसे अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के लिए खतरे के रूप में देख रहे हैं।
क्या बोली सोनिया गांधी?
सोनिया गांधी ने अपनी टिप्पणी में केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का “नरसंहार” समाप्त होना चाहिए। उनका तात्पर्य इस बात से है कि शिक्षा की गुणवत्ता और समावेशिता के लिए जो नीतियां बनाई जानी चाहिए, वे देश के विभिन्न राज्यों की जरूरतों और उनके सांस्कृतिक संवेदनाओं को ध्यान में रखकर होनी चाहिए।
आगे कांग्रेस नेता ने कहा कि शिक्षा को एक समान रूप से और बिना किसी भेदभाव के सभी बच्चों के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए, न कि किसी एक भाषा को दूसरों पर थोपने के रूप में। यह बयान उस तर्क को मजबूती से प्रस्तुत करता है कि शिक्षा नीति को राज्यों की विविधता और स्थानीय भाषाओं के प्रति सम्मान दिखाने वाला होना चाहिए।
यूजीसी को लेकर क्या बोली कांग्रेस नेता?
सोनिया गांधी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2025 के दिशानिर्देशों के मसौदे को भी कठिन बताया। उन्होंने दावा किया कि इसमें राज्य सरकारों को उनके द्वारा स्थापित, वित्तपोषित और संचालित विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति से पूरी तरह बाहर रखा गया है। कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने स्वयं को राज्यपालों के माध्यम से राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों के चयन में लगभग एकाधिकार शक्ति दे दी है। यह समवर्ती सूची के विषय को केंद्र सरकार के एकमात्र अधिकार में बदलने का प्रयास है और आज के समय में संघवाद के लिए सबसे गंभीर खतरों में से एक है।
उन्होंने कहा कि मोदी सरकार में शिक्षा प्रणाली का व्यावसायीकरण खुलेआम हो रहा है। देश के गरीबों को सार्वजनिक शिक्षा से बाहर कर दिया गया है। उन्हें अत्यधिक महंगी तथा अनियमित निजी स्कूल प्रणाली के हाथों में धकेल दिया गया है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की पूर्ववर्ती ब्लॉक अनुदान प्रणाली के स्थान पर उच्च शिक्षा वित्तपोषण एजेंसी (HEFA) की शुरुआत की है।
शिक्षा प्रणाली के माध्यम से नफरत फैला रही केंद्र सरकार: सोनिया गांधी
सोनिया गांधी ने कहा कि केंद्र सरकार का तीसरा जोर सांप्रदायिकरण पर है। वह शिक्षा प्रणाली के माध्यम से नफरत फैलाने और उसे बढ़ावा दे रहे हैं। स्कूली पाठ्यक्रम की रीढ़ राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की पाठ्यपुस्तकों में भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ करने के इरादे से बदलाव किए गए हैं।
महात्मा गांधी की हत्या और मुगल भारत से संबंधित खंडों को पाठ्यक्रम से हटा दिया
उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी की हत्या और मुगल भारत से संबंधित खंडों को पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना को भी पाठ्यपुस्तकों से हटा दिया गया, जब तक कि जनता के विरोध के कारण सरकार को एक बार फिर इसे अनिवार्य रूप से शामिल करने के लिए बाध्य नहीं होना पड़ा।
हमने विवि में बड़े पैमाने पर शासन-अनुकूल विचारधारा वाले प्रोफेसरों की नियुक्ति देखी है, भले ही उनके शिक्षण और छात्रवृत्ति की गुणवत्ता खराब हो। उन्होंने दावा किया कि आईआईटी और आईआईएम जैसे प्रमुख संस्थानों में नेतृत्व के पदों को दृढ़ विचारधारा वाले लोगों के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि पिछले दशक में शिक्षा प्रणालियों को व्यवस्थित रूप से सार्वजनिक सेवा की भावना से मुक्त कर दिया गया है तथा शिक्षा नीति को शिक्षा तक पहुंच और उसकी गुणवत्ता के बारे में किसी भी चिंता से मुक्त कर दिया गया है। केंद्रीकरण, व्यावसायीकरण और सांप्रदायिकरण के इस एकतरफा प्रयास का असर छात्रों पर पड़ा है। भारत की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का यह नरसंहार समाप्त होना चाहिए।