Friday, March 6, 2026
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वेस्ट में सूखी जड़ों को फिर हरा करने की कांग्रेसी कवायद

सलीम अख्तर सिद्दीकी |

मेरठ: उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को बियाबान में भटकते हुए पूरे 32 साल हो चुके हैं। उसका परंपारगत कहा जाने वाला मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण वोट बैंक ऐसा छिटका कि उसे आज तक वापस नहीं मिल सका है। वोट बैंक छिटकने के पीछे भाजपा का राम मंदिर आंदोलन रहा है।

80 के दशक में जब उत्तर प्रदेश में वीर बहादुर सिंह ने नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी, तब मेरठ समेत वेस्ट यूपी के कई शहरों में राम मंदिर आंदोलन के चलते सांप्रदायिक दंगे हुए। कांग्रेस सरकार इनसे निपटने में नाकाम रही। इससे उसका मुस्लिम वोटर नाराज हुआ।

यही वक्त था, जब पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने कांग्रेस से बगावत करके जनता दल बनाया। मुस्लिम वोटर जनता दल में चला गया। उत्तर प्रदेश में 1989 में जनता दल की सरकार बनी। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव बने। 1990 में जब अयोध्या में राम मंदिर की कार सेवा के लिए लोग जमा हुए तो मुलायम सिंह सरकार ने उन्हें खदेड़ने के लिए गोली चलवाई तो प्रदेश का मुस्लिम मुलायम सिंह के पीछे खड़ा हो गया।

उधर, मायावती के उभार के चलते दलित वोट बसपा में चला गया। ब्राह्मण वोटर भाजपा में चला गया। तब से अब तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का खोया जनाधार वापस नहीं आया है। 2014 के बाद तो सभी राजनीतिक दलों का वोट बैंक भाजपाई हो गया। कांग्रेस ही नहीं, सभी राजनीतिक दल उत्तर प्रदेश में हाशिए पर चल रहे हैं। इसलिए सभी की कोशिश है कि किसानों की नाराजगी को अपने पक्ष में किया जाए।

किसानों के बहाने जनाधार पाने की कोशिश

पिछले साल जब दिसंबर में तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान धरने पर बैठे तो कांग्रेस किसानों के पक्ष में खड़ी हो गई। उसे लगा कि यही वक्त है, जब अपना खोया जनाधार वापस पाया जा सकता है। कांग्रेस भले ही अपनी सभाओं को किसान पंचायत का नाम दे रही हो, लेकिन दरहकीकत ये कांग्रेस की ही रैलियां हैं। ये अलग बात है कि पंचायतों में भारी तादाद में किसान भी शिरकत कर रहे हैं। महिलाओं की भागीदारी भी अच्छी खासी रही।

खेतों की बीच हुई पंचायत

पंचायत स्थल खेतों के बीचोबीच बनाया गया था। कृषि कानूनों का विरोध करने के लिए खेतों के बीच पंचायत करने महत्व इसलिए भी है, क्योंकि मामला जब किसानों से जुड़ा हो तो उनके बीच ही जाकर उनकी बात सुनी जानी चाहिए। जिस जगह पंचायत हुई, वहां पांच-छह हजार की भीड़ जुटना पंचायत की कामयाबी है। शहरों में होने वाली पंचायतों में भीड़ का पहुंचना बड़ी बात नहीं होती। हालांकि अगर संगठन चाहता तो और ज्यादा भीड़ हो सकती थी।

क्या भीड़ बनेगी वोटर ?

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जब भी कोई सभा करते हैं, रैली करते हैं या पंचायत करते हैं तो उनमें भीड़ की कमी नहीं होती, लेकिन चुनाव के वक्त यह भीड़ वोट में नहीं बदलती। क्या लोग सिर्फ प्रियंका या राहुल को देखने आते हैं? इस सवाल के जवाब में बहुत लोगों का कहना था कि अब कांग्रेस के अलावा दूसरा विकल्प नहीं दिख रहा है। रविवार को कैली में हुई प्रियंका गांधी की पांचवीं किसान पंचायत थी। उनकी हर किसान पंचायत में भीड़ उमड़ रही है, लेकिन यक्ष प्रश्न यही है कि क्या ये भीड़ वोट में बदलेगी?

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