Friday, February 13, 2026
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अमृतवाणी: दंड का ध्येय

आचार्य विद्याधर अपना गुरुकुल एकांत में चलाते थे। दूर-दूर से अनेक धनाढ्यों और निर्धनों के बच्चे उनके यहां शिक्षा लेने आते थे। राज्य के राजा का पुत्र भी उनसे गुरुकुल में ही रहकर शिक्षा ले रहा था। आचार्य किसी छात्र से गलती या लापरवाही होने पर उनको मारते-पीटते नहीं थे, लेकिन शारीरिक श्रम करने का दंड अवश्य देते थे, जैसे खुरपी से क्यारियां बनवाना, लंबी-लंबी दौड़ लगवाना या आश्रम के लिए भोजन बनवाने और सफाई आदि में सहायता देना। राजा का बेटा भी इस प्रकार के दंड का भागी बनता था। तीन वर्ष के उपरांत राजकुमार यशकीर्ति को कुछ दिनों के लिए राजमहल भेज दिया गया। रानी ने अपने पुत्र से पूछा, ‘तुम गुरुकुल में कैसा जीवन बिता रहे हो बेटा!’ और सब कुछ तो ठीक है मां, लेकिन मुझे दूसरे छात्रों के अनुपात में चार गुना दंड दिया जाता है। मेरी समझ में नहीं आता कि मेरी किसी गलती पर दूसरे छात्रों की अपेक्षा दोगुना, तीन गुना और कभी-कभी चार गुना तक दंड क्यों देते हैं।’ यह सुनकर रानी को क्रोध आ गया और तुरंत आचार्य को गुरुकुल से बुलवाया गया। राजा और रानी एक साथ बैठ कर आचार्य से पूछताछ करने लगे, ‘क्या यह सही है कि आप राजकुमार को दूसरे छात्रों की अपेक्षा अधिक दंड देते हैं?’ ‘जी हां! यह सच है।’ ‘लेकिन ऐसा क्यों?’ ‘इसका कारण यह है कि राजकुमार के अलावा जो दूसरे छात्र हैं, वह सभी पढ़-लिख कर जिन जिम्मेदारियों को निभाएंगे वे सामान्य होंगी। उनके द्वारा हुई भूलों का असर समाज के बहुत छोटे हिस्से पर ही होगा। राजकुमार यशकीर्ति बड़े होकर महाराज की जगह लेंगे। उनसे कोई भूल या लापरवाही होती है, तो उसका असर पूरे राज्य पर पड़ेगा। यही सोचकर मैं राजकुमार की भूलों और लापरवाहियों पर राजकुमार को औरों की अपेक्षा अधिक दंड देता हूं।’
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