Wednesday, March 4, 2026
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नमाज की दिशा

किसी व्यक्ति के यहां मेहमान आया हुआ था। सुबह दोनों नमाज पढ़ने खड़े हुए। वह आदमी नया-नया था, परदेशी था, उस गांव में। वह गलत दिशा में मुंह करके नमाज पढ़ने खड़ा हो गया।। काबा की तरफ मुंह होना चाहिए, मक्का की तरफ मुंह होना चाहिए, वह गलत दिशा में मुंह करके बैठ गया। और जब उस आदमी ने आंखें खोलीं तो फकीर को दूसरी दिशा में मुंह किये नमाज पढ़ते देखा तो वह बहुत घबड़ाया कि बड़ी भूल हो गई। वह फकीर से पहले नमाज करने खड़ा हो गया था तो देख नहीं पाया कि ठीक दिशा कहां है। जब फकीर नमाज से उठा तो उसने कहा महानुभाव, आप तो मेरे बाद नमाज पढ़ने खड़े हुए थे, आपने तो देख लिया होगा कि मैं गलत दिशा में ध्यान कर रहा हूं। मुझे कहा क्यों नहीं? मुझसे यह गलती क्यों हो जाने दी? वह फकीर हंसने लगा उसने कहा, हमने गलती देखना ही छोड़ दी। अब जो होता है ठीक होता है। हम अपनी गलती नहीं देखते तो तेरी गलती हम क्या देखें! गलती देखना छोड़ दी। जब से गलती देखना छोड़ी तबसे हम बड़े सुखी हैं। जो न तो किस्मत से नाराज है न भाग्य से रुष्ट है। जो जीवन में देखता ही नहीं कोई भूल। जो है वैसा ही होना चाहिए। जैसा हुआ वैसा ही होना चाहिए था। जैसा होगा वैसा ही होगा। ऐसा जिसने जान लिया, ऐसा परम स्वीकार जिसके भीतर पैदा हुआ, फिर सुख ही सुख है। फिर रस बहता। फिर तो मगन ही मगन। फिर तो मस्ती ही मस्ती है। फिर तो सब उपद्रव गये। फिर काटे कहां बचे? फिर तो फूल ही फूल हैं, कमल ही कमल हैं।

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