- पश्चिमी में बड़े-बड़े लीडर मौजूद, फिर भी किया किनारा
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: वेस्ट यूपी में बसपा का पूरा संगठन है, फिर भी बसपा हाशिये पर क्यों पहुंच गई है ? बड़ा सवाल है। संगठन तो सक्रिय था ही वामसेफ भी कम सक्रिय नहीं हैं। तमाम संगठन काम कर रहे थे, लेकिन फिर भी बसपा हाईकमान स्तर पर पार्टी साइलेंट मोड में चल रही थी। पश्चिमी यूपी में बसपा के पास बड़े-बड़े नेता थे, जो एक-एक कर पार्टी को छोड़कर चले गए या फिर निष्क्रिय हो गए। आखिर वजह क्या थी ?
पश्चिमी यूपी में योगेश वर्मा ने जैसे ही बसपा को छोड़ा, उसके बाद शाहिद अखलाक, विजय यादव, विजयपाल सिंह, अवधैश वर्मा समेत तमाम दिग्गज एक-एक कर बसपा को अलविदा कह गए। इस तरह से बसपा चुनाव से डेढ़ वर्ष पहले ही टूटनी शुरू हो गई थी। बसपा का पश्चिमी यूपी में बड़ा संगठन काम कर रहा था। बड़े-बड़े पदों को पाने के लिए बसपा में होड लगती थी। इसके लिए पार्टी फंड में नेता चंदा भी देते थे, लेकिन अब ऐसा क्या हुआ कि पूरा संगठन काम कर रहा था, फिर भी बसपा हाशिये पर कैसे पहुंच गई? बसपा में नेताओं की अभी भी लंबी चौड़ी फौज हैं, फिर भी पार्टी का प्रदर्शन निराशजनक ही नहीं, बल्कि बेहद खराब रहा।
बसपा का इतना खराब प्रदर्शन इससे पहले कभी नहीं रहा। मुस्लिम बड़े नेताओं को आभास हो गया था कि मुस्लिम वोट एक तरफा सपा पर जा रहा हैं, जिसके चलते पूर्व मंत्री याकूब कुरैशी जैसे नेताओं ने टिकट ही नहीं लिया। कहा गया कि मेरठ दक्षिण सीट से याकूब कुरैशी के पुत्र इमरान कुरैशी ने चुनाव लड़ने के लिए दीवार तक पुतवा दी थी, मगर ऐन वक्त पर टिकट नहीं लिया। चुनाव लड़ने से मना कर दिया।
चर्चा तो यह भी हुई थी कि इमरान सपा से टिकट लेने के लिए लखनऊ पहुंच गए थे। इस तरह से बसपा नेताओं को पता चल गया था कि मुस्लिम वोट नहीं दे रहा हैं, जिसके चलते बसपा की सर्वाधिक दुर्गति हुई। मुस्लिम के बाद बसपा का कैडर वोट दलित भी खिसक गया। भाजपा ने बसपा के दलित कैडर वोट में भी बड़ी ही चुतराई के साथ सेंध लगा ली।
कांग्रेस: धरातल पर नहीं है कोई संगठन, सिर्फ दिखावा
कांग्रेस के पास संगठन ही नहीं हैं, फिर चुनाव कैसे जीता जा सकता हैं? कुछ नेताओं ने तो कांग्रेस को अपनी दुकान समझ लिया हैं। कांग्रेस से मुस्लिम छिटक गया, दलित वोट देता नहीं हैं। ब्राह्मण भाजपा के साथ चला गया। इनके बिना कांग्रेस कैसे आगे बढ़ पाएगी? यह बड़ा सवाल हैं, फिर संगठन स्तर पर काम होता नहीं हैं। ऐसे में कांग्रेस के आगे बढ़ने का ख्वाब ही देखा जा सकता हैं, धरातल पर कांग्रेस बढ़ नहीं सकती।
सिर्फ कुछ कांग्रेस नेता ही चुनाव में लड़ते हुए दिखाई दिये, बाकी नेता कहां थे? कुछ पता नहीं था। नेता कहां गए? वेस्ट यूपी में कांग्रेस कहीं भी चुनाव में दिखाई नहीं दी। चुनाव की खुद कमान प्रियंका गांधी ने संभाल रखी थी, लेकिन कांग्रेस जमीनी स्तर पर खड़ी ही नहीं हो पाई। इसकी वजह यह भी है कि संगठन जमीन पर है ही नहीं है तो फिर कैसे चुनाव जीता जा सकता हैं?
मेरठ कैंट सीट से अवनीश काजला खुद चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन जमानत नहीं बचा पाए। जो संगठन का काम उन्हें करना चाहिए था, वह नहीं कर सके। चुनाव लड़कर इज्जत भी गंवा बैठे। कैंट सीट पर तो कांग्रेस की दुर्गति हुई, वहीं बाकी सीटों पर भी कांग्रेस की हालत खराब ही नहीं, बल्कि दुर्गति के दौर से गुजरी। संगठन चुनाव में भी कहीं दिखाई नहीं दिया। चंद लोगों का ही संगठन जेब में चलता दिखाई दिया।
मेरठ ही नहीं, बागपत, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा, मुरादाबाद समेत कई ऐसे जनपद हैं, जहां पर कांग्रेस का संगठन ही नहीं था और चुनाव जीतने का ख्वाब लगाये बैठे थे। हस्तिनापुर में तो खुद प्रियंका गांधी आई थी। अर्चना गौतम का प्रचार किया, लेकिन 1500 वोट भी हासिल नहीं कर सकी।
कांग्रेस के कुछ नेताओं ने वेस्ट यूपी के प्रभारी बनाये गए धीरज गुर्जर की भी शिकायत पार्टी हाईकमान से कर दी हैं। इनकी भूमिका भी सवालों के घेरे में हैं। टिकट ऐसे लोगों को थमा दिये, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं था। रोहित की भी शिाकयत हाईकमान से की गई हैं, ताकि चुनाव में जो धरातल पर हुआ है, वो हाईकमान तक पहुंचा जा सके।
वेस्ट में भाजपा के सामने सपा-रालोद की रणनीति रही फेल
यूपी में भाजपा ने जबरदस्त जीत हासिल की हैं। सपा ने अपना प्रदर्शन सुधारा हैं, लेकिन इतना नहीं कि भाजपा को मात दे सके। उनकी सीटें बहुमत से बहुत पीछे रह गई। सवाल यह भी है कि भाजपा की जीत का राज आखिर क्या हैं? कानून व्यवस्था के सवाल पर लोग सपा पर भरोसा नहीं कर सके। लोगों का लगा कि सपा की सरकार आई तो कानून व्यवस्था फिर खराब होगी। छुटा पशु का मुद्दा भी खूब उठा, लेकिन यह मुद्दा भी बहुमत नहीं दिला सका।
सपा की रणनीति क्या थी? समाजिक आधार कागज पर बहुत अच्छा बनता दिख रहा था। सपा ने बदलने की कोशिश की, लेकिन फिर भी सपा पीछे रह गई। माहौल तो पश्चिमी यूपी में भाजपा के खिलाफ बना, लेकिन सपा-रालोद गठबंधन कामयाब नहीं हुआ। भाजपा ने सपा-रालोद गठबंधन के खिलाफ तमाम जातियों को एकजुट कर जीत का परचम लहरा दिया। वेस्ट यूपी में भाजपा ने उम्मीद से कहीं ज्यादा शानदार प्रदर्शन किया।
भाजपा नेताओं को भी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि इस तरह का प्रदर्शन पार्टी प्रत्याशियोंं का रहने वाला हैं। वेस्ट यूपी को लेकर भाजपा के नेता ज्यादा चिंतित थे। क्योंकि भाजपा के खिलाफ किसान आंदोलन चला, जिसके बाद भाजपा को नहीं दिख रहा था कि प्रदर्शन अच्छा हो सकता हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पश्चिमी यूपी को ही फोकस कर दिया था। भाजपा ने प्रथम चरण में 46 सीटें जीतकर जता दिया कि भाजपा ने बड़ी रणनीति के साथ सपा-रालोद गठबंधन को रौंद दिया।

