Monday, April 6, 2026
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मेरठ में किसानों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन

  • किसानों को हाइवे पर जाम लगाने से रोकने के लिए पुलिस-प्रशासन ने किए तमाम प्रयास

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: कृषि बिल के खिलाफ शुक्रवार को किसानों का आक्रोश फूट पड़ा। किसानों को हाइवे पर जाम लगाने से रोकने के लिए पुलिस-प्रशासन ने तमाम प्रयास किये थे, मगर जैसे ही सुबह के 11 बजे, तभी किसानों के ट्रैक्टर ट्रालियों का रैला परतापुर बाइपास पर पहुंचा और एनएच-58 (मेरठ-दिल्ली हाइवे) को जाम कर दिया।

पुलिस और प्रशासनिक अफसर भी इस दौरान मूकदर्शक बने रहे। किसानों ने अधिकारियों की एक नहीं सुनी। आक्रोशित किसानों ने केन्द्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। देखते ही देखते माहौल अचानक गरम हो गया। ऐसे में अधिकारियों ने बैकफुट पर जाना ही उचित समझा। किसानों ने ऐलान किया कि अभी तो ये अंगड़ाई हैं, आगे और लड़ाई है…। ट्रैफिक पुलिस के दर्जन भर पुलिस कर्मी यहां तैनात थे।

उन्होंने ट्रैफिक व्यवस्था को संभालने की कोशिश की, मगर परतापुर चौराहे पर ट्रैफिक व्यवस्था ऐसी ध्वस्त हुई कि हाइवे पर पांच किलोमीटर लंबा जाम लग गया। किसानों ने अंडर पास के नीचे ट्रैक्टर-ट्रॉलियों को सड़क पर कुछ इस तरह से लगा दिया, जिसके बाद बाइक का निकलना भी मुश्किल था।

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इस बीच में कोई एम्बुलेंस आयी तो उसे भी निकलवानें की व्यवस्था की गई। भाकियू कार्यकर्ता पूरी तरह से अनुशासित दिखाई दिये। जो पहले बवाल करने का तरीका था, वह नहीं दिखा। भाकियू कार्यकर्ता बीमार की गाड़ी भी निकलवा रहे थे। भाकियू नेता विजयपाल घोपला का कहना था कि ये आंदोलन केन्द्र सरकार के लिए ट्रेलर है।

इसके बाद भी केन्द्र सरकार ने कृषि बिल वापस नहीं लिया तो आंदोलन व्यापक रूप ले लेगा, जिसका निर्णय भाकियू सुप्रीमो करेंगे। क्योंकि किसान के लिए कृषि बिल गुलामी का प्रतीक है, जिसको सहन नहीं किया जाएगा। भाकियू का आंदोलन इस बार पूरी तरह से अनुशासित रहा।

कहीं भी भाकियू कार्यकर्ताओं ने टकराव की स्थिति नहीं आने दी। वैसे भी पुलिस-प्रशासन भी किसानों से भिड़ने के मूड में नहीं दिखा। पहले ही पुलिस-प्रशासन ने एक तरह से किसानों के सामने सरेंडर कर दिया था। किसान जाम लगा रहे हैं तो लगाए, पुलिस-प्रशासन बैकफुट पर ही दिखाई दिया। जाम से जनता बिल-बिला गई, लेकिन किसानों ने निर्धारित समय से पहले जाम नहीं खोला।

तपिश भरी गर्मी और उड़ती हुई धूल

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जाम से जूझ रही जनता हलकान थी। छोटे-छोटे बच्चे पैदल ही सफर तय कर रहे थे। परतापुर चौराहे पर करीब एक किलोमीटर से ज्यादा की दूरी पर दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे का निर्माण कार्य चल रहा है, जिसके चलते धूल उड़ रही थी। बसों व अन्य वाहनों में बैठे लोग परेशान हाल थे।

तपिश भरी गर्मी में परेशान थे। कुछ लोग बसों से नीचे ऊतरकर धूप में इधर-उधर घूम रहे थे, लेकिन उड़ती धूल से आजिज आ गए। क्योंकि निर्माण के चलते धूल ही धूल उड़ रही थी। पीने को पानी भी नहीं मिल रहा था। प्रशासन ने जनता के लिए पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं की थी। गर्मी से बेहाल जनता पानी लेने के लिए इधर-उधर भटक रही थी।

भाकियू के पीएम से सवाल

  1. कृषि बिल किसानों के लिए या कॉरपोरेट्स के लिए?
  2. नए बिलों के बाद क्या टिक पाएगी एपीसी मंडियां
  3. न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी क्यों नहीं?
  4. कृषि बिलों से क्या होगी किसानों की आमदनी दोगुनी?
  5. इनाम प्लेटफार्म से मंडियों को पीएम घोषणा के बाद भी क्यों नहीं जोड़ा गया?
  6. कृषि बिल यदि किसान हित में है तो फिर पास कराने में इतनी हड़बड़ी क्यों थी?

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आंदोलन में क्या चल रहा, इसकी जानकारी लेते रहे अफसर

आंदोलन के दौरान क्या चल रहा हैं? इसकी पल-पल की खबर आला पुलिस व प्रशासनिक अफसर जानकारी लेते रहे। आंदोलन के बीच मौजूद अफसरों के फोन दिन भर घनघनाते रहे। जाम जल्दी खत्म कराओ..इस तरह का आला अफसर अधीनस्थ अफसरों पर लगातार दबाव बनाते रहे, लेकिन अफसरों के सामने दिक्कत यह थी कि भाकियू के नेता अफसरों की कतई नहीं सुन रही थी।

टिकैत के आने की सूचना कोरी अफवाह

आंदोलनकारियों के बीच मुजफ्फरनगर से मेरठ में भाकियू के राष्टÑीय प्रवक्ता राकेश टिकैत के आने की सूचना से एक बारगी हड़कंप मच गया,लेकिन बाद में भाकियू नेता विजयपाल घोपला ने कहा कि यह कोरी अफवाह है तथा राकेश टिकैत रामपुर तिराहे पर आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं। यह अफवाह किसने चलाई, यह तो पता नहीं चला,मगर भाकियू नेताओं व कार्यकर्ताओं में उनके आने की सूचना पर जोश आ गया था।

कृषि बिल के विरोध में कांग्रेसियों ने भी भरी हुंकार

कृषि बिल के विरोध में कांग्रेसियों ने भी हुंकार भरी। जिला कांग्रेस अध्यक्ष अवनीश काजला के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कांग्रेसी परतापुर पहुंचे। बिल को किसान विरोधी बताते हुए उन्होंने इसका विरोध किया। साथ ही किसानों के साथ बंद कराने में सहयोग किया। उन्होंने कहा कि तीनों ही अध्यादेश कालू कानून के समान है। ये किसानों की जमीन हड़पने की साजिश है। इस मौके पर अवनीश काजला, मोनिंदर सूद वाल्मीकि, रोहित राणा, सेवादल के जिलाध्यक्ष नितिश भारद्वाज, कैंट युवक कांग्रेस के अध्यक्ष अर्चित गुप्ता, सुशांत त्यागी, नितिन शुक्ला, हर्ष ढाका, अंकित कस्तला, शुभम सोम, मोनू धामा, प्रवक्ता हरिकिशन आंबेडकर भी शामिल रहे।

पंजाब, हरियाणा के मुकाबले वेस्ट में फीकी रही किसानों के आंदोलन की धमक

कृषि बिल का विरोध पंजाब व हरियाणा में मजबूती के साथ हो रहा है। जो आक्रोश पंजाब व हरियाणा के किसानों में दिख रहा है, वह वेस्ट यूपी की किसान बेल्ट में नहीं दिखा। वेस्ट यूपी किसान बाहुल्य क्षेत्र है, मगर किसानों में अजीब सी खामोशी पसरी हुई है। इस खामौशी की वजह क्या हो सकती है, यह तो नहीं कह सकते हैं, मगर इतना अवश्य है कि जिस तरह का कृषि बिल के खिलाफ आंदोलन होना चाहिए था, वो दमदार आगाज दिखाई नहीं दिया।

दरअसल, भाकियू के हाथ में किसान आंदोलन की कमान थी। विपक्षी दलों ने भी भाकियू के इस आंदोलन को समर्थन का ऐलान किया था। कुछ विपक्षी दलों के नेता भाकियू के आंदोलन में शरीक भी हुए,मगर कृषि बिल के खिलाफ जो किसानों का सैलाब सड़कों पर दिखना चाहिए था, वो नहीं दिखा। इसकी वजह कई हो सकती है।

एक तो कोरोना का डर तथा दूसरा भाकियू के इस आंदोलन का ज्यादा प्रचार-प्रसार भी नहीं हुआ। पंजाब में किसान सड़क से लेकर ट्रेन की पटरी पर काबिज थे। पूरी तरह से कर्फ्यू जैसे हालात पंजाब में रहे। कमोबेश यहीं स्थिति हरियाणा की भी रही, लेकिन वेस्ट यूपी को किसानों का गढ़ कहा जाता है, मगर यहां आंदोलन की वो धमक नहीं दिखाई दी, जो भाकियू के संस्थापक रहे स्व. चौ. महेन्द्र सिंह टिकैत की अगुवाई में जो किसान आंदोलन की हनक हुआ करता थी, उसकी झलक कहीं-कहीं दिखी।

बाकी कुछ स्थानों पर तो भाकियू के आंदोलन में भी सिर्फ रस्म अदायगी हुई। दौराला कभी भाकियू का गढ़ था, वहां भाकियू के नेताओं ने हाईवे के नीचे बैठकर औपचारिक भर धरना दिया। यह धरना भी ज्यादा देर नहीं चला, जिसके बाद भाकियू नेताओं ने ज्ञापन सौंपा और चले गए। जिटौली के सामने भी कुछ वैसा ही हुआ। भाकियू नेताओं ने पहुंचकर जाम तो लगाया, लेकिन तभी प्रशासनिक अफसर ज्ञापन लेने पहुंच गए।

इसी बीच जाम भी खोल दिया गया। नानू गंगनहर पटरी पर 11 बजे करीब तीन सौ भाकियू कार्यकर्ता ट्रैक्टर ट्रालियों में पहुंचे, लेकिन दोपहर 1 बजे ज्ञापन देने के बाद धरना खत्म कर दिया। परतापुर को छोड़ दे तो बाकी स्थानों पर मजबूती के साथ भाकियू का आंदोलन नहीं चल पाया। आंदोलन को आपस में कॉर्डिनेट नहीं कर पाये या फिर संवादहीनता रही।

वजह कुछ भी हो, मगर भाकियू के आंदोलनों की जो हनक हुआ करती थी, वो कम ही दिखी। कृषि बिल का मुद्दा सीधे किसानों से जुड़ा था, लेकिन फिर भी किसानों की आंदोलन में हिस्सेदारी और संख्या बल को लेकर सवाल तो बनता है। कृषि बिल में ऐसा क्या हैं,जो किसानों के लिए नुकसानदायक हैं ?

शायद इस तथ्य को भाकियू लीडर भी आम किसानों को समझा नहीं पाये। कृषि बिल का ऐसा मुद्दा है, जो भाकियू को भी पुन: जिंदा कर सकता है। पूरी तैयारी के साथ भाकियू को आंदोलन की रणभूमि में उतरना था, लेकिन लगता है बिना किसी तैयारी के ही भाकियू ने भी आंदोलन की हुंकार भर दी।

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