
मैं आज जो कुछ भी हूं, केवल और केवल अपने उस पिताजी की वजह से हूं, जिन्होंने अपनी दो सगी बेटियां होने के बावजूद भी, मुझ जैसी अनाथ और बेसहारा फुटपाथ पर पेट भरने के लिए भीख मांगने वाली उस बेटी को सहारा दिया, जिसका न तो जाति का पता था और ना ही मजहब का। ऐसे में उन्होंने मुझे ‘गुड़िया शुक्ला’ नाम देकर अपनी दोनों बेटियों के स्कूल में पढ़ाया-लिखाया। इस देश में शायद ही किसी सगी गुड़िया को भी अपने जन्म देने वाले पिता से इतना प्यार कभी नही मिला होगा जितना कि मुझे अपने इस पालने वाले पिताजी से मिला। धीरे-धीरे कर हम तीनों बहनें जब बड़ी हुर्इं, तो पिताजी ने सभी बहनों की एक-एक कर शादी कर दी। हां! इतना जरूर मैंने महसूस किया कि पिताजी ने अपनी अन्य दोनों बेटियों की शादी से भी कहीं ज्यादा खर्च उन्होंने अपनी इस पालने वाली बिटिया यानी की ‘गुड़िया शुक्ला’ की शादी में किया। बेटियों की सारी जिम्मेदारी से निवृत हो जाने के बाद पिताजी अकेले ही घर में रह गए थे। एक दिन मुझे उनके बीमार होने की सूचना मिली। मैं उन्हें देखने के लिए घर चली गई तो उन्होंने मुझे अपने पास बुला कर कहा, बिटिया! चलो अच्छा हुआ कि तुम आ गर्इं। अब मैं चैन से मर सकूंगा। इसी बीच उन्होंने अपना बीमार और कंपकंपाता हुआ हाथ बड़े ही प्यार से मेरे सर पर रख दिया और मैं अपनी आंखों में आंसू लाकर बोली, नहीं! पिताजी चुप रहिए ऐसा नहीं कहते।
देखो! बिटिया मेरी अब उम्र हो चुकी है, इसलिए तुम मुझे झूठी तसल्ली मत दो। ना जाने किस समय मेरी सांसो की यह डोर टूट जाए। वाकई पिताजी को जैसे अपनी मौत का आभास पहले से ही हो गया था और ठीक उस के दूसरे दिन उनकी सांसों की डोर हमेशा के लिए टूट गई। मुझे ऐसा लगा, जैसे मैं एक बार फिर से अनाथ हो गई हूं। फिर मैंने अपनी दोनो बहनों को सूचना देकर उन्हें यहां आने के लिए कह दिया।
फिर उनके सारे अंतिम क्रिया कर्म करने के बाद हम तीनों बहनें अपने-अपने घर चली गर्इं। लेकिन मैं आज भी अपने उस पालने वाले पिताजी को भूल नहीं पाती, क्योंकि जब भी मैं किसी फुटपाथ से होकर गुजरती हूं तो मुझे हर वह भीख मांगती हुई छोटी सी लड़की ‘गुड़िया शुक्ला’ दिखाई पड़ती है, जिसे कि कभी फुटपाथ से उठाकर पिताजी ने पाला था।


