Friday, March 20, 2026
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ईश्वतरत्व का रूप

Amritvani 21


प्रकृति में उपस्थिति प्रत्येक कण जिस बंधन में बंधे हुए हैं वह ईश्वरत्व का रूप है, जिसे प्रेम कहते हैं। प्रेम के विराट स्वरूप और उसके अनंत छोर तक फैले उसकी असीमित विस्तार मानव जीवन के लिए उसकी अनिवार्यता का अंदाजा महज इसी बात से लगाया जा सकता है कि मनुष्य जीवन में जिन व्यक्तित्वों ने विशेष विकास एवं विस्तार पाया है, उसका मूल आधार प्रेम है। बिना प्रेम के किसी भी क्षेत्र में विकास होना संभव नहीं है, चाहे लौकिक हो या अलौकिक। प्रेम शुद्ध भगवत्प्रेम जो स्वत: उत्पन्न हो जिस पर किसी राजसत्ता का कोई जोर दबाव न होकर पूर्णता: दिव्य प्रकृति स्वतंत्र चेतन से उप्तन्न हो। मानव जीवन का संचालन जिस प्रेरणा द्वारा होता है, वह एक मात्र प्रेम है। प्रेम में एक अलौकिक शक्ति निहित है। ऐसी शक्ति जिसकी तुलना बाहुबल अथवा बुद्धिबल से नहीं की जा सकती है, जिस कार्य को कोई वीर साहसी योद्धा अपनी संपूर्ण शक्ति लगाकर नहीं कर सकता है। उस कार्य को प्रेम परिप्लावित मनुष्य बड़ी सहज भाव से कर सकता है। मनुष्य की समस्त दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करने वाली अमोघ वस्तु प्रेम है। जो परमात्मा की सबसे बड़ी देन है। प्रेम मृत्यु से अधिक शक्तिशाली है और मृत्यु जीवन से अधिक बलशाली। जिस प्रकार सूर्य एक स्थान पर स्थिर रहकर ब्रह्मांड को आलोकित करता है, उसी प्रकार से प्रेम आत्मा रूपी सूक्ष्म कण शरीर के ह्रदय में स्थिर रहकर चेतना द्वारा सारे शरीर को आलोकित करता है, इस प्रकार प्रेम ही आत्मा का प्रमाण है।
प्रस्तुति: अजय प्रताप तिवारी


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