
स दौर में जबकि हिंदी में जासूसी उपन्यासों की कमी खल रही है, वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारद्वाज ने इस श्रृंखला में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई है। हाल ही में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘मेरे बाद’ इस कमी को पूरा तो करता ही है, यह भी सिद्ध करता है कि अपराध और रहस्य पर भी बेहतर लिखा जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं है कि एक समय में जासूरी उपन्यासों ने हिंदी का एक विशाल पाठक वर्ग तैयार किया था। लेखकों ने अपराध और अपराध के रहस्य को यथार्थ न मानते हुए इस तरह के लेखन से दूरी बनाए रखी।
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मुकेश भारद्वाज ने इस दूरी को खत्म कर एक नई राह दिखाई है। उपन्यास की सबसे बड़ी सफलता इसकी रोचकता है। शायद यही कारण है कि शुरू से लेकर आखिर तक 272 पृष्ठों के इस उपन्यास की पठनीयता बनी रहती है। लंबे उपन्यास में पात्रों को साधना और तारतम्यता स्थापित रखना चुनौतीपूर्ण होता है। मुकेश भारद्वाज ने कहीं भी उपन्यास को बोझिल नहीं होने दिया है। पाठक एक बार इसे पढ़ना शुरू करता है तो अंत तक उत्सुकता के साथ पढ़ता चला जाता है। इस उपन्यास में कई रहस्य छिपे हैं। उपन्यास की शुरूआत किशोर चंद्र वशिष्ठ द्वारा फांसी लगाने की कोशिश से हाती है। फांसी लगाने से पहले वह बार-बार पिछली यादों के सागर में गोते लगाता रहता है और अंत में फांसी लगा लेता है। हालांकि फांसी लगाने के दौरान संदिग्ध हालात कुछ और इशारा करते हैं। इस उपन्यास का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि किशोर चंद्र वशिष्ठ ने फांसी लगाई है या फिर उनकी हत्या की गई है। रंगीन मिजाज के प्राइवेट जासूस अभिमन्यु को शक है कि यह आत्महत्या का मामला नहीं है बल्कि किशोर की हत्या की गई है। दरअसल किशोर की पत्नी पहले ही स्वर्ग सिधार गई थी। किशोर के अपने बच्चों से ठीक संबन्ध न होने के कारण बच्चे अपने-अपने परिवार सहित अलग जगह रह रहे थे। किशोर के साथ केवल उनकी नर्स रागिनी रहेजा ही रहती थी। किशोर के बच्चे यह नहीं चाहते थे कि इस केस की जांच हो। बहरहाल विभिन्न उतार-चढ़ावों और रहस्यों के साथ यह कथा आगे बढ़ती है।
पुस्तक : मेरे बाद…,
लेखक : मुकेश भारद्वाज, प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, नई दिल्ली, मूल्य : 299 रुपये
रोहित कौशिक


