
देश का राष्ट्रीय खेल क्या है- हॉकी। वही हॉकी जिसने देश को ओलिम्पिक्स में 8 गोल्ड, 1 सिल्वर और 3 ब्रॉन्ज मेडल दिलाए हैं। अब दूसरा सवाल- देश में राष्ट्रीय खेल दिवस कब मनाया जाता है- 29 अगस्त यानि हॉकी के महानतम खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद (दद्दा) के जन्मदिवस पर। तीसरा सवाल- देश के सबसे बड़े खेल पुरस्कार का नाम क्या है- मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार। कागज पर ये सब पढ़ने में बेशक बहुत अच्छा लगता हो लेकिन हॉकी को लेकर देश की हकीकत बिल्कुल उलटी है। देश में क्रिकेट की चकाचौंध जैसे हावी है उसमें बाकी सभी खेल धुंध में खोए नजर आते हैं। हॉकी स्टिक अब कार में मौजूद तो होती है लेकिन खेलने के लिए नहीं सड़क पर झगड़े में स्कोर सैटल करने के लिए।
क्रिकेटर्स का नाम पूछा जाए तो राष्ट्रीय टीम तो छोड़ो आईपीएल की हर टीम के खिलाड़ियों के नाम भी लोगों को कंठस्थ होंगे। अब यही बात देश के तथाकथित राष्ट्रीय खेल हॉकी पर लागू कीजिए। राष्ट्रीय हॉकी टीम के हर खिलाड़ी का नाम तो छोड़िए कप्तान हरमनप्रीत सिंह का नाम भी कम ही लोगों को पता होगा। देश में ऐसी स्थिति क्यों है? क्रिकेट अब पूरे साल ही चलता रहता है। देश के क्रिकेटर्स आईसीसी अंतर्राष्ट्रीय टूनार्मेंट्स, द्विदेशीय सीरीज के अलावा आईपीएल में भी खेलते नजर आते हैं। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड दुनिया का सबसे धनी बोर्ड है। जाहिर है अब क्रिकेटर्स पर पैसा भी खूब बरसता है। क्या यही बात देश में किसी और खेल के लिए कही जा सकती है।
देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ 1954 से अब तक 48 विभूतियों को दिया जा चुका है। खेल जगत से जुड़ी एक ही हस्ती को अब तक भारत रत्न से नवाजा गया है- 2014 में मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को। सचिन क्रिकेट में दिए गए योगदान के लिए निश्चित तौर पर इस सम्मान के सच्चे हकदार हैं। लेकिन क्या दद्दा मेजर ध्यानचंद का हॉकी के लिए योगदान किसी तरह से कम है? ध्यानचंद गाथा 1928 एम्सटर्डम ओलिम्पिक्स से शुरू हुई। उस वक्त ध्यानचंद महज 23 साल के थे। तब भारत ने फाइनल में नीदरलैंड्स को 3-0 से हरा कर हॉकी का पहला गोल्ड अपने नाम किया।
1932 में लॉस एंजिल्स ओलिम्पिक्स में फाइनल में अमेरिका को 24-1 से रौंद डाला था। फिर 1936 बर्लिन ओलिम्पिक्स के फाइनल में भारत ने जर्मनी की 8-1 से दुर्गति की। इन तीनों ओलिम्पिक्स में ध्यानचंद दद्दा ने 12 मैच खेले और 33 बार विरोधी टीमों के गोलपोस्ट को खड़काया। आखिर कब भारत के इस असली रत्न को मिलेगा देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान?
नवीन को नमन
ओडिशा के राउरकेला और भुवनेश्वर में 13 से 29 जनवरी 2023 तक 15वें पुरुष हॉकी विश्व कप का आयोजन हो रहा है। इस टूनार्मेंट में दुनिया के 16 देश हिस्सा ले रहे हैं। 1971 से पुरुष हॉकी विश्व कप का दुनिया में आयोजन हो रहा है। भुवनेश्वर दुनिया का ऐसा इकलौता शहर है जिसे लगातार दो बार पुरुष हॉकी विश्व कप की मेजबानी का मौका मिला है। देश में दम तोड़ती हॉकी को संजीवनी देने का काम किसी शख्स ने किया है तो वो हैं ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक।
टोक्यो में 2020 में हुए ओलिम्पिक्स में भारत की पुरुष हॉकी टीम ने ब्रॉन्ज मेडल जीता, वहीं महिला हॉकी टीम ने चौथा स्थान हासिल किया। अगर पुरुष हॉकी टीम की बात की जाए तो इससे पहले 1972 म्यूनिख ओलम्पिक्स में भारत ने ब्रॉन्ज मेडल जीता था। 1980 में मॉस्को ओलम्पिक्स में भारत ने बेशक गोल्ड जीता था लेकिन तब पश्चिमी देशों ने उस ओलिम्पिक्स का बॉयकॉट किया था।
इसलिए ये कहना सही होगा कि 1972 के बाद पहली बार ओलिम्पिक्स में 2020 में भारत ने हॉकी में खोई अपनी प्रतिष्ठा को कुछ हद तक वापस पाया। अब यहां बताना जरूरी है कि टोक्यो ओलिम्पिक्स 2020 की तैयारियों के लिए भारत की पुरुष और महिला हॉकी टीमों को स्पॉन्सर करने के लिए कोई सामने नहीं आया था तब नवीन पटनायक आगे आकर भारतीय हॉकी के सरपरस्त बने। उन्होंने भारतीय हॉकी के सुनहरे दिन लौटाने का बीड़ा उठाया और हॉकी प्लेयर्स को हर सुविधा देने का एलान किया।
देश में कम से कम एक नेता तो ऐसा है जिसने क्रिकेट से इतर राष्ट्रीय खेल हॉकी की सुध ली। क्रिकेट की तुलना में हॉकी और अन्य खेलों की ओर देश के नौनिहालों के कम झुकाव के लिए मीडिया भी कम जिÞम्मेदार नहीं जो दिन रात क्रिकेट के जाप में लगा रहता है। ये अन्य खेल-खिलाड़ियों के लिए अनदेखी के श्राप जैसा है।
कभी इसी देश में देखा गया था कि 1975 में कुआलालम्पुर, मलेशिया में भारत ने पहली बार हॉकी विश्व कप जीता था तो कैसे अजीत पाल सिंह, सुरजीत सिंह, गोविंदा, असलम शेर खान और अशोक कुमार (दद्दा ध्यानचंद के पुत्र) जैसे हॉकी खिलाड़ी राष्ट्रीय हीरो बन गए थे। कोई लौटा दे हॉकी के वो बीते हुए दिन।
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